दिन विशेष प्रवासी रचना : कविता – डॉ. इंदु बारौठ (चारण)
प्रस्तुत है कवयित्री डॉ. इंदु बारौठ की दो ग़ज़लें. दोनों ग़ज़लें स्वानुभूतिजन्य यथार्थपरक हैं जिनमें कवयित्री ने ग़ज़लों के मानक स्वरूप से इतर अपनी भावनाओं को स्वर दिया है. मैं कवयित्री के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ! – डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र
परिचय :
शिक्षा: संस्कृत में पी-एच. डी.
*हिंदी और संस्कृत की शिक्षिका एवं भारतीय भाषाओं की साधक; लंबे समय से ब्रिटेन में भारतीय भाषाओं के शिक्षण और प्रचार में दत्तचित्त
*सक्रियता: भाषा और संस्कृति के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी भारतीय जड़ों से जोड़ना तथा भारत की समृद्ध विरासत से विश्व को परिचित कराना
१.
शाम होने का हमें तब कहीं एहसास हुआ,
जब ठहरकर परिंदों को घर लौटते देखा हमने।
चाय प्याली में न जाने कितनी बार ठंडी हुई,
दो घड़ी मिल न सकी अपनों संग बिताने को।
धूप आँगन में उतरती रही हर रोज़ मगर,
वक़्त मिलता ही कहाँ था ज़रा सुस्ताने को।
रोज़ तारीख़ें बदलती रहीं दीवारों पर,
हम भी बेचैन रहे अगला दिन सजाने को।
जिनकी किलकारियों से घर में बहारें थीं कभी,
कब वे निकले अपनी दुनिया नई बसाने को।
जिस भँवर से निकलने में लगे बरसों हमें,
बच्चे भी चल पड़े उसी राह को अपनाने को।
आज जो ठहरे तो ये एहसास हुआ जाने क्यों….
कौन कहता था हमें इस क़दर दौड़ जाने को?
घड़ी की टिक-टिक आज बहुत साफ़ सुनी,
जैसे बरसों से खड़ी थी यही समझाने को।
खिड़की खोली तो वही धूप खड़ी थी बाहर,
जैसे बरसों से रुकी थी हमें बुलाने को।
और जब शाम ने चुपके से छुआ माथा तो,
जाने क्यों एक पुराना-सा ख़याल आया हमें।
जिसे कल के लिए हर रोज़ टालते ही रहे,
वही इक आज मिला था हमें जी जाने को।
ज़िंदगी सामने बैठी थी बड़ी देर से चुप,
हम ही निकले थे कहीं ज़िंदगी कमाने को।
२.
धीरे-धीरे धूप ढली, अब घटने लगी तपन,
शीतल-शीतल साँझ चली, महक उठा उपवन।
ग्रीष्म समेटे जा रहा, किरणों का संसार,
शरद सुंदरी आ रही, लेकर नव-श्रृंगार॥
थकी दोपहरी ले रही, अलसाई अंगड़ाई,
बादल बाँधे गठरियाँ, लेने लगे विदाई।
पत्तों ने धारण किए, स्वर्णिम नए परिधान,
डाली-डाली बज उठी, ऋतु की मधुरिम तान॥
भोर सजा रही दूब पर, ओस-मोतियों की माल,
चाँदनी नहला रही, धरती का मुख लाल।
कल तक तपती थी धरा, तीखी धूप अपार,
आज पवन सहला रही, गाकर मधुर मल्हार॥
ग्रीष्म विदा होने लगा, छोड़ सुनहरी याद,
शरद उतरने लगी धरा, लेकर नव-आह्लाद।
प्रकृति बदलती जा रही, अपना रूप अपार,
एक ऋतु लेती है विदा, दूजी करे श्रृंगार॥

