तेज़ी बच्चन, प्रकाशवती पाल और स्वतंत्र भारत की व्यावहारिक बुद्धि

Hitendr patel

प्रभात रंजन ने हाल ही में हरिवंशराय बच्चन से जुड़ा एक दिलचस्प प्रसंग साझा किया। इस तरह की छोटी-छोटी ऐतिहासिक सूचनाएँ कई बार बड़े प्रश्नों की ओर ले जाती हैं। बच्चन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। कैंब्रिज से शोध करके लौटे थे और उस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी का प्रोफ़ेसर होना अपने आप में बड़ी बौद्धिक प्रतिष्ठा की बात थी। आज के समय को सामने रखकर उस दौर की कल्पना करना कुछ कठिन है। दिल्ली तब राजधानी अवश्य थी, लेकिन भारतीय बौद्धिक जीवन का निर्विवाद केंद्र अभी नहीं बनी थी। कलकत्ता और इलाहाबाद जैसे नगरों की स्वतंत्र बौद्धिक प्रतिष्ठा थी। इलाहाबाद तो साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और विश्वविद्यालयी जीवन—सभी का बड़ा केंद्र था।

ऐसे समय में बच्चन का विदेश मंत्रालय में हिंदी से जुड़े पद पर जाना पहली नज़र में कुछ विचित्र लगता है। कैंब्रिज से शोध करके लौटा अंग्रेज़ी का अध्यापक आखिर हिंदी अधिकारी क्यों बना? इस प्रश्न का उत्तर खोजा जा सकता है, लेकिन फिलहाल उसमें मेरी विशेष दिलचस्पी नहीं है। मुझे अधिक दिलचस्प उस संसार में है जिसमें स्वतंत्रता के बाद के पढ़े-लिखे भारतीय परिवार अपने भविष्य और अपने बच्चों के भविष्य के बारे में निर्णय ले रहे थे।

यहाँ मुझे हिंदी संसार की दो स्त्रियाँ बार-बार याद आती हैं—प्रकाशवती पाल और तेज़ी बच्चन। दोनों को केवल यशपाल और हरिवंशराय बच्चन की पत्नियों के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को बहुत छोटा कर देना होगा। दोनों में जबरदस्त व्यावहारिक बुद्धि थी। दोनों जानती थीं कि प्रतिभा अपने आप सार्वजनिक प्रतिष्ठा में नहीं बदलती; उसके लिए सामाजिक संबंध, आर्थिक व्यवस्था, संस्थागत पहुँच और बदलते समय को पहचानने की क्षमता भी होनी चाहिए।

यशपाल के साहित्यिक जीवन में प्रकाशवती की भूमिका इसी अर्थ में महत्वपूर्ण थी। क्रांतिकारी जीवन से लेकर प्रकाशन और साहित्यिक प्रतिष्ठा की दुनिया तक उन्होंने केवल साथ नहीं दिया, बल्कि अनेक व्यावहारिक जिम्मेदारियों को अपने हाथों में लिया। लेखक लिखता है, लेकिन उस लेखन को जीवनभर संभव बनाए रखने वाली व्यवस्था अक्सर किसी और के श्रम से बनती है और प्रकाशवती के भीतर यह क्षमता असाधारण रूप से मौजूद थी।

तेज़ी बच्चन भी इसी अर्थ में अत्यंत व्यावहारिक थीं, यद्यपि उनका सामाजिक संसार बिल्कुल अलग था। वे आधुनिक शहरी सामाजिकता को समझती थीं, संबंध बनाने और निभाने की क्षमता रखती थीं और आने वाले समय की दिशा पहचानती थीं। बच्चन परिवार की नेहरू परिवार से निकटता में उनकी भूमिका सर्वविदित रही है। विशेषकर इंदिरा गांधी से उनका निजी संबंध केवल राजनीतिक परिचय का मामला नहीं था; वह उस समय के उच्च मध्यवर्गीय सामाजिक संसार का भी हिस्सा था।

यहीं प्रकाशवती पाल और तेज़ी बच्चन के संबंधों को लेकर मुझे एक और बात दिलचस्प लगती है। दोनों के बीच बहुत आत्मीय संबंध रहे हों, ऐसा नहीं लगता। उलटे कहीं-कहीं एक तरह की दूरी और प्रतिस्पर्धा का आभास होता है। इसे प्रमाणित राजनीतिक प्रतिद्वंदिता कहना शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन उस समय के इलाहाबाद और बाद के दिल्ली-लखनऊ के साहित्यिक-सामाजिक संसार को देखते हुए इसे पूरी तरह अप्रासंगिक भी नहीं माना जा सकता है।

दोनों अपने-अपने ढंग से यह समझती थीं कि स्वतंत्र भारत में केवल लेखक होना पर्याप्त नहीं है। सत्ता, प्रतिष्ठा और संस्कृति के नए केंद्र बन रहे थे। नेहरू परिवार से निकटता अपने आप में सामाजिक पूंजी थी। मुझे दोनों स्त्रियों को पढ़ते हुए कभी-कभी ऐसा लगता है कि उस सामाजिक पूंजी के संसार में भी एक सूक्ष्म प्रतिस्पर्धा थी। शायद इसी कारण दोनों के बीच सहजता नहीं बन पाई। इसे फिलहाल एक संकेत की तरह ही रखा जाना चाहिए, किसी अंतिम निष्कर्ष की तरह नहीं।

लेकिन इस प्रसंग का महत्व गपशप में नहीं है। महत्व इस बात में है कि इन दोनों महिलाओं में अपने समय की संरचना को पढ़ने की असाधारण क्षमता थी। वे समझ रही थीं कि स्वतंत्र भारत में प्रतिष्ठा और सफलता के रास्ते किस दिशा में जा रहे हैं।

तेज़ी बच्चन की यह व्यावहारिक दृष्टि बच्चों की शिक्षा के मामले में और स्पष्ट दिखाई देती है। बच्चन स्वयं आधुनिक शिक्षित व्यक्ति थे। अंग्रेज़ी साहित्य के अध्यापक थे, पश्चिमी साहित्य से परिचित थे और कैंब्रिज से शोध करके आए थे। इसके बावजूद बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाने के प्रश्न पर तेज़ी का आग्रह अधिक निर्णायक था। उन्हें मालूम था कि राष्ट्रभाषा पर बहस अपनी जगह है, लेकिन बच्चों का भविष्य एक दूसरी सामाजिक वास्तविकता में बनने वाला है।

यह प्रसंग अपने आप में बहुत कुछ कहता है। एक प्रसिद्ध हिंदी कवि का परिवार अपने बच्चों के लिए अंग्रेज़ी माध्यम चुन रहा था। इसे हिंदी से विश्वासघात कहना बिल्कुल गलत होगा। बल्कि इसे नए भारत की संरचना को पहचान लेने की व्यावहारिक बुद्धि के रूप में पढ़ना चाहिए।

इसी संदर्भ में कैफ़ी आज़मी और शौकत आज़मी के परिवार की घटना और भी अर्थपूर्ण हो जाती है। शबाना आज़मी को अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल में दाखिल करवाना था। समस्या यह थी कि स्कूल बच्चे के साथ माता-पिता की अंग्रेज़ी भी देखता था। कैफ़ी अंग्रेज़ी की उस दुनिया के आदमी नहीं थे। अंततः परिचित लोगों की सहायता लेकर प्रवेश की बाधा पार करनी पड़ी।

इसे केवल एक मनोरंजक पारिवारिक किस्सा मान लेना इसके सामाजिक अर्थ को खो देना होगा। कैफ़ी आज़मी उस भाषा के बड़े कवि थे जिसने आधुनिक भारत की सांस्कृतिक चेतना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन उनकी बेटी के भविष्य का रास्ता एक ऐसे स्कूल से होकर जा रहा था जहां अंग्रेज़ी सामाजिक योग्यता का प्रमाण थी।

यहीं स्वतंत्र भारत की एक बड़ी विडंबना सामने आती है।

थोड़ा अतिरंजित ढंग से कहें तो १९४७ तक अंग्रेज़ों का शासन था; उसके बाद अंग्रेज़ी का शासन अपने वास्तविक रूप में आया।

इस वाक्य को राजनीतिक नारे की तरह नहीं पढ़ना चाहिए। अंग्रेज़ी किसी सेना या विदेशी सरकार के बल पर शासन नहीं कर रही थी। उसका प्रभुत्व कहीं अधिक सूक्ष्म था। वह अवसर की भाषा बन गई थी। उच्च शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, विज्ञान, बड़ी नौकरियों और सामाजिक प्रतिष्ठा तक पहुंच का सबसे सुरक्षित रास्ता अंग्रेज़ी से होकर जाता था।

औपनिवेशिक काल में अंग्रेज़ी शासक की भाषा थी। स्वतंत्र भारत में वह आकांक्षा की भाषा बन गई।

यह परिवर्तन कहीं अधिक गहरा था।

और शायद इसे सबसे पहले उन परिवारों ने पहचाना जिनके पास भविष्य को पढ़ने की व्यावहारिक क्षमता थी। हिंदी का बड़ा कवि अपने पुत्र को अंग्रेज़ी स्कूल भेज रहा था। उर्दू का बड़ा शायर अपनी बेटी के लिए अंग्रेज़ी स्कूल का दरवाज़ा खटखटा रहा था। इसमें कोई पाखंड नहीं था। वे सामाजिक वास्तविकता को पहचान रहे थे।

घर की भाषा प्रेम की भाषा हो सकती थी, साहित्य की भाषा हो सकती थी, स्मृति की भाषा हो सकती थी; लेकिन सफलता की भाषा धीरे-धीरे अंग्रेज़ी होती जा रही थी।

स्वतंत्र भारत का मध्यवर्ग इसी दोहरेपन के भीतर विकसित हुआ। बच्चे घर में हिंदी, उर्दू, बंगला, पंजाबी या दूसरी भारतीय भाषाओं में संसार को महसूस करते थे और अंग्रेज़ी में अपने भविष्य की तैयारी करते थे। धीरे-धीरे अंग्रेज़ी भाषा से आगे बढ़कर एक प्रकार की सांस्कृतिक पूंजी बन गई।

इसका असर केवल स्कूलों पर नहीं पड़ा। विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, नौकरशाही, न्यायपालिका, पत्रकारिता और बाद में कॉरपोरेट जगत में एक ऐसा अभिजन विकसित हुआ जिसकी सार्वजनिक भाषा अंग्रेज़ी थी। भारतीय भाषाओं में लिखने वाला बहुत बड़ा विद्वान भी कई बार उस राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से वंचित रह सकता था जो अंग्रेज़ी में लिखने वाले अपेक्षाकृत सामान्य विद्वान को सहज प्राप्त हो जाती थी।

यहां अंग्रेज़ी भाषा और अंग्रेज़ी-आधारित अभिजन के बीच फर्क करना चाहिए। अंग्रेज़ी एक भाषा है और उसका ज्ञान अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब बनती है जब किसी भाषा का ज्ञान संस्थागत शक्ति और सामाजिक श्रेष्ठता का लगभग स्थाई प्रमाणपत्र बन जाए।

स्वतंत्र भारत में लंबे समय तक अंग्रेज़ी जानने वाले एक विशेष बौद्धिक वर्ग ने राज्य, ज्ञान और समाज के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। विश्वविद्यालयों, अंग्रेज़ी प्रेस, प्रकाशन संस्थानों, सांस्कृतिक संगठनों और नीति-निर्माण की दुनिया में इस वर्ग का बड़ा प्रभाव था।

इस वर्ग में असाधारण विद्वान भी थे और सामान्य प्रतिभा के लोग भी। उसने संस्थाएं बनाईं, किताबें लिखीं और आधुनिक भारतीय बौद्धिक जीवन को समृद्ध किया। इसलिए उसके पूरे योगदान को नकारना बौद्धिक आलस्य होगा। लेकिन हर अभिजन की तरह उसने भी अपने नेटवर्क बनाए। कुछ विश्वविद्यालय, कुछ परिवार, कुछ प्रकाशन संस्थान और कुछ सामाजिक मंडल राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के द्वारपाल बन गए।

यहीं सत्ता और बौद्धिक वर्ग का रिश्ता महत्वपूर्ण हो जाता है। सत्ता को ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जो उसके लिए समाज की व्याख्या कर सकें, नीति को भाषा दे सकें और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय संसार के बीच मध्यस्थता कर सकें। लंबे समय तक अंग्रेज़ी-शिक्षित भारतीय बौद्धिक वर्ग ने यह भूमिका निभाई।

उसके पास भाषा थी, विश्वविद्यालय था, प्रेस था, अंतरराष्ट्रीय संपर्क थे और सत्ता के गलियारों तक पहुंच थी।

समस्या तब शुरू होती है जब कोई बौद्धिक वर्ग अपनी ऐतिहासिक उपयोगिता को स्थाई अधिकार समझने लगे।

सत्ता स्थिर नहीं रहती। उसकी आवश्यकताएं बदलती हैं। उसके सहयोगी बदलते हैं। उसकी भाषा बदलती है और समाज तक पहुंचने के रास्ते भी बदलते हैं।

आज शायद हम उसी परिवर्तन के बीच हैं।

दिल्ली अब भी शक्तिशाली है। अंग्रेज़ी भी अभी कहीं नहीं जा रही। आर्थिक रूप से अंग्रेज़ी-शिक्षित वर्ग आज भी बहुत मजबूत है। उसके भाई-बंद अभी भी विश्वविद्यालयों, मीडिया, कॉरपोरेट संस्थानों और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्कों में प्रभावशाली हैं।

लेकिन पुराना जलवा कुछ कम हुआ है।

इसका एक कारण राजनीति है, लेकिन केवल राजनीति नहीं। संचार की दुनिया बदल गई है। छोटे शहरों और कस्बों से आने वाला व्यक्ति अब अपनी बात कहने के लिए दिल्ली के किसी संपादक की अनुमति पर पूरी तरह निर्भर नहीं है। भारतीय भाषाओं की सार्वजनिक उपस्थिति बढ़ी है। सामाजिक माध्यमों ने प्रतिष्ठा के पुराने दरवाजों को कम से कम आंशिक रूप से तोड़ा है।

सत्ता को भी अब पुराने बौद्धिक मध्यस्थों की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कभी थी।

और यहीं कुछ बेचैनी दिखाई देती है।

जिस वर्ग को लंबे समय तक यह विश्वास था कि सरकार किसी की भी बने, आधुनिक भारत की व्याख्या अंततः उसी से करवानी पड़ेगी, उसे पहली बार अनुभव हो रहा है कि राजनीतिक सत्ता उसके बिना भी अपनी भाषा बना सकती है।

इस परिवर्तन पर प्रसन्न होना आवश्यक नहीं है। पुराने अभिजन के स्थान पर आने वाला नया अभिजन अधिक लोकतांत्रिक ही होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। नई सत्ता अपने नए दरबारी पैदा कर सकती है। इतिहास में ऐसा लगातार होता रहा है।

इसलिए प्रश्न अंग्रेज़ी बनाम हिंदी का नहीं है। प्रश्न ज्ञान और सत्ता के संबंध का है।

इसी संदर्भ में तेज़ी बच्चन, प्रकाशवती पाल और शौकत आज़मी जैसी स्त्रियाँ मुझे महत्वपूर्ण लगती हैं। उन्होंने कोई भाषानीति नहीं लिखी। उन्होंने आधुनिक भारत के वर्गीय चरित्र पर कोई ग्रंथ नहीं लिखा। लेकिन वे जीवन की जमीन पर खड़ी थीं और बदलते समय के संकेत पहचान रही थीं।

प्रकाशवती समझ रही थीं कि क्रांतिकारी आदर्श को भी संगठन, पैसा, प्रकाशन और सामाजिक संबंध चाहिए। तेज़ी समझ रही थीं कि महान हिंदी कवि का पुत्र होना भविष्य की पर्याप्त गारंटी नहीं है; उसे उस अंग्रेज़ी संसार में भी प्रवेश चाहिए जहां नए भारत के अवसर केंद्रित हो रहे हैं। शौकत और कैफ़ी अपने वैचारिक संसार से समझौता किए बिना बेटी के लिए वही रास्ता खोज रहे थे।

इन छोटे निर्णयों में बड़े इतिहास की आहट सुनाई देती है।

शायद इसीलिए साहित्यिक इतिहास को केवल लेखकों और उनकी पुस्तकों से नहीं लिखा जाना चाहिए। लेखक के घर को भी देखना चाहिए। कई बार वहां बैठी स्त्री समाज के परिवर्तन को लेखक से पहले पढ़ रही होती है।

हमने भारतीय भाषाओं में राष्ट्र की कल्पना की और अंग्रेज़ी में सफलता की सीढ़ियां बनाईं। लंबे समय तक भारतीय मध्यवर्ग इसी व्यवस्था के भीतर ऊपर चढ़ता रहा।

अब सीढ़ियां कुछ बदल रही हैं।

पुराने द्वारपालों को यह परिवर्तन स्वाभाविक रूप से अच्छा नहीं लग रहा।

आर्थिक स्थिति अभी भी अच्छी है। संबंध भी हैं। दिल्ली भी है।

बस वह पुराना जलवा कुछ कम हो गया है।

आह, बेचारे!

उनके लिए शायद सचमुच घोर कलयुग आ गया है।

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