दिन विशेष युवा लेखन : घर की घड़ी – आरुष सेखू
आरुष सेखू की इस कविता को पढ़ते हुए कहा जा सकता है कि कवि में बड़ी संभावनाएं हैं। ‘घर की घड़ी’ एक मार्मिक कविता है। जिसमें कवि अपनी व्यक्तिगत कुंठा को स्वर देना चाहता है। – डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र, संपादक
परिचय:-
प्रवासी युवा लेखक : आरुष सेखूजी
“अभी सफर नया है, और रास्ते भी अनजान हैं,
शब्दों के इस मेले में, मेरी भी एक पहचान है।”
शिक्षा: ऑक्सफोर्ड, यू.के.
कवि का उद्गार :
शब्दों की इस खूबसूरत दुनिया में एक नया मुसाफ़िर हूँ। मेरे लिए कविता सिर्फ मेरी अपनी अनुभूतियों को बयां करने का माध्यम है। एक नए रचनाकार के रूप में, मैं अभी जीवन और समाज के विभिन्न रंगों को सीख और समझ रहा हूँ और उन्हें अपनी सरल भाषा, नए बिंबों और प्रतीकों के माध्यम से आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ।”
घर की घड़ी
आज ये दीवारें कुछ
कह रही हैं,
कुछ सिकुड़ रही हैं।
शायद
कुछ मुरझा गया है,
कुछ चला गया है।
हाँ, चला गया है
वो पल, जो कहता था—
मत तौलो प्यार को
घंटों में,
खुशियों को मिनटों में,
और दुःख…
उस दुःख को देखो
हर पल में।
मेरी घड़ी ने मुझसे पूछा—
“कुछ सुनाई दे रहा है?”
मैंने कहा—
कुछ भीगा-सा है मन का, सूखा मेरा,
रह गया है ज़िंदगी का
एक अधूरा फेरा।
लगता था चल रहा हूँ-
समतल ज़मीन पर कहीं,
ना जाने कहाँ से आ गया
ये गड्ढा गहरा।
याद नहीं आता मुझे कि कोई याद भी थी,
थामी उँगली जो कभी,
वो पास भी थी।
कोहरा छाया लगता है ज़्यादा-सा मुझे,
शायद तभी है यादों में
चेहरा धुँधला तेरा।
खोटे बोल, खोटे दौर,
खोटी बातें हैं,
तुम खींचो नाउम्मीदी की दीवारें,
हम इन्हें फिर भी लाँघ जाते हैं।
और आज फिर हम नए सवेरे में
यही गुनगुनाते हैं—
कि भर के जो दम हर ग़म-
याद आए तुम,
झुका के पलकें हमने,
और वक़्त बीत जाता है।

