
“किताबें बोलती हैं – सौ लेखक, सौ रचना” : समृद्ध हो रहा है कस्तूरी का आंगन…
कस्तूरी द्वारा आयोजित साहित्यिक श्रृंखला “किताबें बोलती हैं : सौ लेखक, सौ रचना”के अंतर्गत 6 दिसंबर 2025 को साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली में सुप्रसिद्ध कथाकार दिव्या माथुर के कहानी–संग्रह “मायाजाल” पर पुस्तक–परिचर्चा का आयोजन किया गया। यह संग्रह प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।
दिव्या माथुर ब्रिटेन में बसी भारतीय मूल की हिंदी लेखिका हैं, जिनकी कहानियाँ संवेदनशील, यथार्थवादी और सामाजिक सरोकारों से भरी होती हैं। उनकी रचनाओं में जीवन के जटिल यथार्थ—विशेषतः महिला संघर्ष और प्रवासी जीवन की चुनौतियों का सजीव और मार्मिक चित्रण मिलता है। उनकी कहानियाँ रिश्तों की जटिलताओं, मानवीय मन की गहराइयों, विवाह, प्रेम, विरह, अकेलेपन और पारिवारिक संबंधों की नाज़ुक डोरियों को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त करती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार उदय प्रकाश जी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में कवि एवं आलोचक अनामिका जी उपस्थित रहीं। वक्ताओं में शिक्षाविद किरण नंदा जी कथाकार अंजू वेद जी तथा शिक्षाविद गीता पाण्डेय जी सम्मिलित हुई ।कार्यक्रम का संचालन साहित्य एवं कला–अध्येता विशाल पाण्डेय जी ने कुशलता से किया।
वक्ता गीता पाण्डेय जी ने कहा कि विदेशी परिवेश में रची गई लेखिका की सत्रह कहानियों में भारतीय जीवन–मूल्यों का सशक्त प्रारूप उभरकर आता है। इन कथाओं में बाल–मन की मनोवैज्ञानिक जटिलताएँ, संबंधों के बंधन–विच्छेद, व्यक्तिगत व्यस्तता, शंका–संदेह, स्त्री–बिखराव तथा एकनिष्ठ प्रेम जैसी विविध मानवीय अनुभूतियाँ संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शीर्षकों में किया गया नवीन प्रयोग उनकी संवेदना को प्रभावी रूप में उकेरता है और पाठकों को आकर्षित करता है।
वक्ता अंजू वेद जी ने कहा कि ये कहानियाँ पाठक के मन में सहज ही जगह बना लेती हैं और उन्हें अंत तक जोड़े रखती हैं। ब्रिटेन की पृष्ठभूमि पर आधारित इन कथाओं में बुजुर्गों की स्थितियाँ, लड़कियों और लड़कों के बीच अंतर, सांस्कृतिक भिन्नताएँ, पंजाबी संस्कृति की छवियाँ, सामाजिक दबाव तथा भय के विभिन्न आयाम प्रभावशाली रूप में उभरते हैं।
वक्ता किरण नंदा जी ने कहा कि इन कहानियों में भारतीय परिवेश प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष रूप से उपस्थित है और प्रवासी जीवन का nostalgia गहराई से झलकता है। ये कथाएँ मानवता को सर्वोपरि मानते हुए जीवन की भागदौड़, चिकित्सीय षड्यंत्र, नर–नारी संबंध, समझौते, बुजुर्गों का अकेलापन और अवसाद जैसे यथार्थों को प्रभावी ढंग से उभारती हैं।
मुख्य अतिथि अनामिका जी ने कथाओं की मार्मिक प्रकृति पर बात करते हुए अज्ञेय और राहुल सांकृत्यायन के संदर्भों का उल्लेख किया। उन्होंने मृत्युबोध की सूक्ष्म अनुभूति पर चर्चा करते हुए कहा कि ये कहानियाँ जीवन की सीधी, स्पष्ट और अनावृत्त धारा की तरह प्रवाहित होती हैं। उनके अनुसार, स्त्री–मुक्ति का मार्ग उसे पुरुष–प्रधान अवधारणाओं से परे एक स्वतंत्र चेतना प्रदान करता है, जहाँ पूर्वाग्रहों के विरुद्ध संघर्ष ही उसके अस्तित्व की वास्तविक पहचान रचता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में उदय प्रकाश जी ने कहा कि दिव्या माथुर की कहानियाँ अपनी सीधी और सहज भाषा के कारण विशेष रूप से प्रभावशाली बनती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इन कथाओं में पितृसत्ता का प्रश्न बिना किसी पक्ष–पक्षधरता के सादगी से प्रस्तुत हुआ है। साथ ही, कथाओं में पूर्वानुमान की उपस्थिति इन्हें और अधिक अर्थपूर्ण बनाती है। उनके अनुसार, लेखिका किसी एक दृष्टिकोण का समर्थन नहीं करतीं, बल्कि कहानी को निष्पक्षता से सामने लाती हैं।
समापन में उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों, विद्वानों, श्रोताओं तथा आयोजनकर्ता कस्तूरी और उनकी समर्पित टीम के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार, आलोचक, संपादक, वक्ता, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
यह आयोजन न केवल साहित्यिक विमर्श का मंच बना, बल्कि कहानी और जीवन के पारस्परिक संबंधों को समझने का एक सुंदर अवसर भी सिद्ध हुआ।

रिपोर्ट : सृष्टि असवाल
