जीवन की मूल धारा (कविता)
जन्म लेने पर रोना
दुनिया से जाते हुए दुखी होना
इस लम्बे अंतराल में होती है
एक लम्बी यात्रा
यात्रीगण रहते हैं क़तार में
उधेड़ते -बुनते हुए अपने आप को
क्षणिक सुख और ढेर सारा आनंद
लम्बे स्याह रास्तों से बीहड़ दुख
और पीड़ा का गहन अंधकार
हँसते -मुस्कुराते, कभी खीझते-झींकते
कभी सहज सरल मन से
तो कभी नितांत निज स्वार्थ में
विगत में उलझे हुए , आगत से आतुर होकर
करते रहते हैं जीवन भर यात्रा
पगडण्डियों के बीच, लम्बे अनचीन्हे स्वर
साथ चलते हुए, कभी छूटते हुए
यूँ हीं बस चलते रहना
यात्राएँ कभी सरल नहीं होती
चलते रहने का सुख करता है आश्वस्त
राहगीर पूछते हैं हाल एक दूसरे का
अलग होते ही चल पड़ते हैं गंतव्य को
सुख से जीने के लिए, सुख को तलाशने में
अपने भीतर की यात्रा से इतर
यात्रीगण लगे रहते हैं क़तार में
और एक दिन ख़त्म होती है प्रतीक्षा
तो फिर रोते हुए
प्रवेश करते हैं नई यात्रा में
– अनीता वर्मा
