तुम्हारे लिए मुस्कराए हुए हूँ (कविता)
हृदय में बहुत कुछ छुपाये हुए हूँ
तुम्हारे लिए मुस्कराए हुए हूँ .
क्या क्या नही दुःख उठाया है मैंने
दुपहरी को सिर पर गुजरा है मैंने
बहुत भीगता मैं रहा शीत में भी
मगर फिर भी मैं मुस्कराए हुए हूँ।
बहुत तारे टूटे हैं आँखों के आगे
कई अंधड़ों ने बसे घर उजाड़े
बिखरे हैं तिनकों से सपने हमारे
वही उजड़े सपने उठाये हुए हूँ।
सागर की लहरों ने लूटे किनारे
नदी के रहे होंठ प्यासे के प्यासे
यह प्यास जीवन में प्यासी रही है
वही प्यास दिल में छुपाये हुए हूँ।
घनी घोर काली अमावस की रातें
जिन में चलीं सांय सांय हवाएँ
उन्हीं में उजाले की ठानी है मैंने
हृदय को मैं दीपक बनाए हुए हूँ।
रुके क्यों कदम जो बढ़े धीरे धीरे
बहुत कंटकों ने कलेजे हैं चीरे
अनजान बाधा बहुत पथ में आईं
मैं बाधाओं में मुस्कराये हुए हूँ।
आँखों ने देखी है जीवन की पीड़ा
पता कब चला कब ये बचपन ही बीता
जवानी नही अपने रंग में खिली है
जख्मों को साथी बनाये हुए हूँ।
–डॉ वेद व्यथित
