धीरज आखिर टूट गया (कविता)
और छुपाता दर्द हृदय में अब कितना
दर्द हृदय की सब सीमायें लांघ गया
कितने ज्वार उठे और कितने लौट गये
कितने मोती तट बंधों पर बिखर गये
गहराई सागर की फिर भी गहरी थी
बेशक कितने झंझा आ कर चले गये
पर धरती की पीर न सागर समझ सका
बिन समझे तूफ़ान मचा कर लौट गया
बहुत रोकता रहा गर्जना कर कर के
आखिर तो वो हृदय ही था टूट गया
कितना रोका कहाँ रूका वो रोके से
तट बंधों का धीरज आखिर टूट गया
और धरा भी कहाँ रोकती अंतर को
इतने ज्वार उठे कि अंतर भीग गया
रूपहला आकर्षण कितना मोहक था
उस के बाद अमा भी देखी भूल गया
फिर फिर भूख जगी किरणें जब जब आईं
किरणों का आकर्षण तम को भूल गया
पर पूर्णिमा बाद अमावश आती ही
पूर्णिमा को देख अमा को भूल गया |
–डॉ वेद व्यथित
