“प्रवासी मजदूर”- डॉ. वंदना मुकेश
छत होती तो देखती,
गली से निकलते
प्रवासी मजदूरों की टोलियाँ।
देखती कुछ औरतें,
कुछ बच्चे लटकाए,
कंधों पर झोले अटकाए।
कुछ औरतें,
खाली पेटवाली,
कुछ पेटवाली, खाली।
मुझे छत चाहिये
कि देख सकूँ मैं
खुला आसमान।
और वह,
जिसका पेट पीठ से लगा है,
छाती से मरियल सा बच्चा चिपका है
खुला आसमान देख सकती है
पर देखती नहीं है
उसे भी छत चाहिये।
