दिव्या माथुर का कलाइडोस्कोप : धूप, छाँव और अनवरत यात्राएँ ( समीक्षा ) : मनीषा कुलश्रेष्ठ


बीते दिनों हुई तमाम यात्रा में यकीन मानिए खिड़की के बाहर नहीं देखा, एक कलाइडोस्कोप देखती/ पढ़ती रही। कोई आत्मकथा इस तरह भी संस्मरणों के कोलाज में भी क्राफ्ट की जा सकती है कि पल पल दृश्य बदलते रहें, जीवन आगे चलता रहे धूप-छांव लिए। उस पर सूर्यबाला जी की भूमिका की इन पंक्तियों ने मुझे उत्सुक कर दिया।
“इन संस्मरणों से गुज़रते हुए इतने नगर, प्रदेश, देश-विदेश, समय, इतिहास और परम्पराएँ अपनी-अपनी यवनिका इस तरह उठाती-गिराती रहती हैं कि कभी दिव्या के जीवन के घटित हमें रोमांचित करते हैं, कभी अवाक् तथा कभी उनके प्रति रश्क और फ़ख़ से भर देते हैं।”
मेरी बड़ी बहन समान दिव्या माथुर जी की यह किताब जिसका शीर्षक ही कलाइडोस्कोप है और यह उनके जीवन का सुंदर, कटु, कठिन, रोचक, आनंदी, अनूठे रिश्तों की मिठास और अनचाहे रिश्तों की खठास, अनवरत यायावरी से भरा और एक मकाम पर आकर कुछ ठहर सा गया, सुंदर देशों की अट्टालिकाओं से लेकर देसी मोहल्लों के बोसीदा गलियों के दृश्यों भावों – घावों से भरे जीवन का कलाइडोस्कोप ही है। उस पर उनकी रोचक, व्यंजना भरी तटस्थ लेखनी मानो वे अपनी नहीं किसी और की कथा कह रही हों। कोई बेचारगी या आत्मदया नहीं, न ही संघर्ष गाथा को लेकर कोई हीरोइज्म यह एक ईमानदार, विचारोत्तेजक और ग़ज़ब किस्सागोई से भरी आंशिक-आत्मकथा और संस्मरणों की किताब है।
ढेर से भाई बहनों के साथ बीता बचपन, महीन सुनहरी केलीग्राफी करने वाले चित्रकार और शायर दादा जी, ठसके दार दादी। टिपिकल कायस्थों के घर की रवायतें कि पैसा हो न हो दस्तरख्वान पूरा सजा रहे। मेहमान आकर खाते पीते रहें। शायराना माहौल रहे और यारबाशी और दयानतदारी ज़िंदा रहे। ऐसे में अभाव और समृद्धि दोनों के बीच झूलती किशोरावस्था। स्कूल, जगजीत और दिव्या जी की दोस्ती। कॉलेज और फिर प्रसिद्ध अस्पताल में नौकरी। बेमेल और कटु अनुभवों वाला दांपत्य।
दिव्या जी दृश्य क्या कमाल खींचती हैं। ससुराल के रिश्ते के मामा के घर ‘पुष्कर’ के पास किसी गांव जंगल में बनी हवेली में नितांत मुफ़लिसी में जी रहे रिश्तेदार परिवार वाला चैप्टर जादुई यथार्थ की कथा सा लगता है। जर्जर हवेली, अभाव के बीच भी अथाह प्रेम के साथ रूखा सूखा भोजन भी स्वादिष्ट बना कर परोसने वाली मामी और भाई बहन और एक दृष्टिबाधित बहन। कैसे वे दिव्या जी के सहारे वहां से उबरते हैं और दिल्ली में अपना ठिकाना बनाते हैं, मुकाम बनाते हैं और सारा श्रेय दिव्या जी को देते हैं।
इस किताब का क्राफ्ट ऐसा है ही यह एकसार नहीं चलती…..इसमें जीवन के टुकड़े एक टेपेस्ट्री की तरह गुंथे हैं। बचपन के एकदम बाद लंदन पहुंचने की कवायद आ सकती है। लंदन के बाद दादा जी संग बिताया समय….. यह क्राफ्ट बहुत रोचक और अनूठा प्रतीत होता है।
कलाइडोस्कोप में दिव्या जी ने दु:ख और बुरे लोगों को उतनी ही तवज्जोह दी है जितनी जीवनकथा के लिए आवश्यक। दु:ख आया, लड़ाई लड़ी, प्रयास किये जूझीं और निकल पड़ीं आगे के मनाज़िल की ओर। बचपन की मित्र जगजीत मानो इस प्रक्रिया में सबसे बड़ा उत्प्रेरक रही। पहले डेनमार्क और फिर लंदन। दोनों जगह नौकरी का भीषण संघर्ष मगर जिस दिन लगा खाली हाथ लौटना होगा बेटे को लेकर भारत तो कमर कस ली, हर पत्थर पलट कर देखा। सामान पैक्ड था बस उसी हफ्ते लौटना था कि ‘भारत भवन’ से कॉल आ गयी अस्थायी नौकरी की। फिर अस्थायी को स्थायी बनाने का जीवट तो हमारी प्रिय लेखिका जानती ही हैं। फिर तो बेटी को भी ले आईं और लंदन को घर बना लिया। तरह तरह के अस्थाई घर..बदल बदल कर। नेहरू सेंटर के शानदार दिन, वहीं सहकर्मियों की जलन और षडयंत्र, वातायन का उदय और दिव्या जी की लेखनी के मुकाम।
दिव्या जी के इन आत्मकथात्मक संस्मरणों का सबसे मार्मिक भाग जो है कमाल की बात है वही सबसे अधिक कलात्मक और अनूठा भी है। वे ग़ज़ब लेखकीय तटस्थता से इसे लिखती हैं और इसमें व्यंजना डालने से भी गुरेज़ नहीं करतीं। मानो वह तलुवे के कैंसर के ऑपरेशन की भीषण यंत्रणा से गुज़रता मरीज़ वह खुद नहीं कोई और हो।
वे तमाम सैडेटिव के बीच भी तार्किकता नहीं छोड़तीं। वे होश में आने को छटपटाती भी हैं और उसी बेहोशी में नर्स की चिंता कर रही हैं, औषधि उंडेलती नर्स को टोकना चाहती हैं कि एक दवा से दूसरी के बीच गैप रखे।
वे जबड़ों के ऑपरेशन के बाद चेहरे पर लगे क्लिप्स और स्टेपल्स को आभूषण लिखती हैं। वे उन अबूझ पीड़ादायक पलों का ऐसा महीन विवरण देती हैं कि पाठक चौंक जाए कि ले आत्मकथा लिख रही हैं या किसी और को देख लिखा गया विवरण। खुद को यूं कैसे कोई देख सकता है? यही बेहतरीन लेखक होने का मापदंड है।
“मेरे दांये नथुने में एक छोटा सा पहिया फिट किया गया था, जो मेरे ख्याल में सबसे भद्दा आभूषण था। एक मूविंग स्टैंड से मेरी पट्टी की गयी बांह लटकी थी। यकायक फ्रैंकेस्टाइन की याद आ गयी। कहीं मेरी पोती न डर जाए।”
मैंने दिव्या जी को पास से देखा है मैं उनके साथ लगभग महीना भर रही हूं। मैं ज़रा भी अतिशयोक्ति नहीं कर रही हूं यह सच है कि जीजिविषा उनसे लैसन्स लेने आती है। कैंसर उनके मायके की तरफ़ मानो आनुवांशिकी से चला आया है। पहले मां, फिर छोटी बहन नीता ने कम उम्र में कैंसर से यह संसार छोड़ा, फिर दिव्या जी को तालू का कैंसर हुआ जिसे उन्होंने मात दी, अब उनकी एक और बहन इससे जूझ रही हैं। मगर मजाल कि दिव्या जी के चेहरे पर मैंने दुख की शिकन देखी हो। हरदम कोई न कोई प्रोजेक्ट, हरदम कोई नया प्लान, यात्राएं, मेहमान नवाज़ियां। कभी उनको कोई मुचड़े कपड़ों में नहीं देख सकता, एक कायस्थाना सलीका, कुछ ब्रिटिश सोफेस्टिकेशन और उनका अपना सौंदर्यबोध उनको बेहद आकर्षक बनाता है। श्रमशीलता के चलते मैं उन्हें मन ही मन मेहनती चींटी कहती हूं। हर वक्त वे सक्रिय रहती हैं। वे बताती हैं जब वे कार चलाती थीं तो और अधिक सक्रिय थीं।
उन्हें यात्राएं बेहद प्रिय हैं सो इस किताबमें आपको यात्राओं का आनंद भी मिलेगा नार्वे, स्वीडन, इटली…. इसी तरह इसमें कुछ विद्वानों के साथ के संस्मरण भी हैं, गोयनका जी, नरेश कोहली, रामदरश मिश्र, चित्रा मुद्गल। विविध साहित्य और सांस्कृतिक महोत्सवों मसलन स्पेन में भारत महोत्सव, शिमला में हुए साहित्य अकादमी के महोत्सव उन्मेष सहित विश्वरंग सहित जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल, भारोपीय हिंदी महोत्सव के संस्मरण भी। बतौर पाठक मुझे लगा कि बीच में और भी अध्याय इसमें होने चाहिए थे क्योंकि लंदन आने के बाद नेहरू सेंटर में स्थापित होने के बाद भी उनके जीवन के पड़ावों में बहुत कुछ छूटता हुआ दिखा जो इस आत्मकथात्मक कलाइडोस्कोप को अधिक मुकम्मल करता। दिव्या जी के लेखन की शुरुआत, सफलताओं के सिलसिले, अनूठी दोस्तियां….हो सकता है शायद दिव्या जी ने अगला भाग लिखने का सोचा होगा, जिसकी मुझे प्रतीक्षा रहेगी।
बेहद रोचक संस्मरणों की यह किताब कलाइडोस्कोप सबको पढ़नी ही चाहिए, एक कोमल गुड़िया सी दिव्या जी के भीतर का इस्पात अगर समझना हो, बीती सदी के कुछ अनूठी भूली-बिसरे अतीत और उस समय की दिल्ली को देखना हो। और भी अनूठे संस्मरण इसे मुकम्मल बनाते हैं। दिव्या जी की लेखनी का अनूठापन यहां खूब खुल कर उभरा है, पारदर्शी और बहुस्तरीय, मार्मिक मगर तटस्थ। यह किताब आद्विक प्रकाशन से आई है और अमेज़ॉन पर उपलब्ध है।
सबसे मज़ेदार बात यह कि मुझ पर दिव्या जी का बड़ी बहन की तरह अधिकार है और उन्होंने मुझे न इसे पढ़ने को कहा न लिखने को….और मैं आलसी जीव इसे आराम से लिए बैठी रही….. जब पहला पन्ना पढ़ा तो मैं इसे छोड़ ही न सकी… काठमांडू यात्रा में इसे पूरा पढ़ लिया। तीन चार रोचक अध्याय दुबारा पढ़े जो अपने आप में सर्रियल कहानियां थे।
