“समत्वं योग उच्यते : योग का शाश्वत संदेश”

समत्वं योग उच्यते:

भारत की प्राचीन ऋषि-परंपरा ने विश्व को जो अमूल्य ज्ञान-संपदा प्रदान की है, उसमें योग का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की विधि नहीं, योग जीवन को संतुलित, अनुशासित और सार्थक बनाने वाली एक समग्र जीवन-दृष्टि है। यह मनुष्य को बाह्य जगत की चंचलताओं से ऊपर उठाकर आत्मबोध, आत्मसंयम और आंतरिक शांति की ओर अग्रसर करता है। आज का युग अभूतपूर्व प्रगति का युग है, किंतु इसके साथ ही तनाव, मानसिक अशांति, प्रतिस्पर्धा और जीवन-मूल्यों के क्षरण जैसी चुनौतियाँ भी हमारे सामने हैं। ऐसे समय में योग केवल स्वास्थ्य का साधन नहीं, यह मानवीय चेतना को जागृत करने वाला सांस्कृतिक और आध्यात्मिक माध्यम बनकर उभरता है। योग हमें स्वयं से संवाद करना सिखाता है और जीवन में संतुलन, धैर्य तथा सकारात्मकता का संचार करता है। भगवद्गीता में कहा गया है- ‘योगः कर्मसु कौशलम्’, अर्थात् कर्मों में उत्कृष्टता और दक्षता ही योग है। यह सूत्र हमें बताता है कि योग केवल आसनों और प्राणायाम तक सीमित नहीं है, यह अपने प्रत्येक कर्तव्य को पूर्ण समर्पण, सजगता और संतुलन के साथ करना भी योग है। जब मन, बुद्धि और कर्म में सामंजस्य स्थापित होता है, तब जीवन स्वयं योगमय बन जाता है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि भारत की इस सनातन साधना को आज सम्पूर्ण विश्व ने स्वीकार किया है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा की वैश्विक स्वीकृति और मानव कल्याण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का प्रतीक है। योग विश्व को यह संदेश देता है कि स्थायी शांति और समृद्धि का मार्ग बाहरी संघर्षों में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन और आत्मानुशासन में निहित है। आइए, इस योग दिवस पर हम सभी यह संकल्प लें कि योग को केवल एक दिवस की गतिविधि न मानकर अपने दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बनाएँगे।
योग हमें स्वयं और अपनी संस्कृति से जोड़ता है और सम्पूर्ण मानवता के साथ एकात्म भाव स्थापित करता है। यही योग का वास्तविक संदेश है और यही भारत की विश्व को अनुपम देन है।

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