बेंगलूरु में आयोजित 50वाँ नागरी लिपि राष्ट्रीय अधिवेशन

50वाँ नागरी लिपि राष्ट्रीय अधिवेशन दिनांक 21 जून 2026 को बेंगलूरु में नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली एवं बेंगलूरु हिंदी अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया। यह सम्मेलन अत्यंत सार्थक विषय देवनागरी लिपि सहित दक्षिण भारतीय लिपियाँ और भारतीय ज्ञान परंपरा पर हुआ। जैन (अभिमत पात्र विश्वविद्यालय), जे.सी. रोड, बेंगलूरु में संपन्न हुआ। इस राष्ट्रीय अधिवेशन में देश के विभिन्न राज्यों से पधारे वि‌द्वानों, साहित्यकारों, शोधकर्ताओं तथा हिंदी-सेवियों ने सहभागिता कर हिंदी भाषा एवं देवनागरी लिपि के संरक्षण, संवर्धन तथा वैश्विक प्रतिष्ठा पर गंभीर विमर्श किया। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 10 बजे दीप प्रज्ज्वलन एवं प्रार्थना गीत के साथ हुआ। कार्यक्रम का प्रारंभ भारतीय संस्कृति की एकता प्रदर्शित करते हुए एक भरतनाट्यम नृत्य से हुआ। दिल्ली से पधारे नागरी लिपि परिषद् के महामंत्री डॉ. हरिसिंह पाल के साथ मुख्य अतिथि प्रोफेसर डॉ. बी. के. रवि, वाइस चांसलर, बेंगलूरु नार्थ यूनिवर्सिटी, डॉ. इस्पाक अली, चैन्नई की विदुषी डॉ. राजलक्ष्मी कृष्णन, सेंट पॉल्स कॉलेज, बेंगलूरु के प्रधानाचार्य फादर एम.जे. थॉमस, डॉ. पृथ्वीराज सरा एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री गौतम चंद कटारिया (जैन) की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा बढ़ाकर युवावर्ग का मार्गदर्शन किया। कार्यक्रम का शुभांरभ नागरी लिपि के सुंदर गीत द्वारा किया गया। कार्यक्रम के आरंभ में अतिथियों का सम्मान पारंपरिक शॉल एवं स्मृति चिह्न से किया गया।
स्वागत भाषण के पश्चात् पूर्व राष्ट्रपति माननीय रामनाथ कोविंद से प्राप्त संदेश को पढ़ने के पश्चात् देश-विदेश से प्राप्त विभिन्न संदेशों को पढ़कर दर्शकगणों को नागरी लिपि के प्रचार-प्रसार एवं सभी की शुभकामनाओं से अवगत कराया गया। कार्यक्रम में बीज व्यक्तव्य देते हुए डॉ. इस्पाक अली ने लिपि की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए बताया कि 12 जून 1936 को कर्नाटक में पहला अधिवेशन एवं 1948 के नागरी लिपि पर हुए विचार-विमर्श से देवनागरी लिपि के प्रचार हेतु भारत में ठोस कदम उठाए गए थे। उन्होंने देश-विदेश की शिक्षा व्यवस्था को भी उजागर किया जहाँ उनके देश का इतिहास, ज्ञान परंपरा एवं संस्कृति को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाता है और उसी से वे देश विकास भी कर रहे हैं। डॉ. हरिसिंह पाल ने एक महत्वपूर्ण बिंदु पर बल देते हुए कहा कि 1950 के कर्नाटक के सिद्धनाथ पंत ने भारतीय देवनागरी परिषद् की स्थापना की अतः नागरी लिपि परिषद् के 1975 में बनने से पहले कर्नाटक में ही देवनागरी का बीजारोपण हुआ है। उन्होंने विलुप्त हो रही भाषाओं पर चिंता व्यक्त की। इसके साथ ही उन्होंने लोककथा एवं लोकगीतों के संग्रह हेतु प्रयासरत रहने पर भी बल दिया। इसके साथ ही, भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत तथा उसके संरक्षण में देवनागरी लिपि की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने युवा पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने तथा हिंदी साहित्य को वैश्विक मंच पर स्थापित करने के लिए सतत प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया। बेंगलूरु नार्थ यूनिर्सिटी के वाइस चांसलर मुख्य अतिथि प्रोफेसर डॉ. बी के रवि ने अपने व्यक्तव्य में कहा कि कन्नड़ हमारी क्षेत्रीय भाषा हो सकती है परंतु राष्ट्र को जोड़ने के लिए हिंदी एवं देवनागरी लिपि आवश्यक है। उन्होंने इस बात पर भी विशेष जोर दिया कि वर्तमान समय में लिपि संरक्षण हेतु लिपियों का डिजिटलीकरण आवश्यक है। प्रौ‌द्योगिकी का प्रयोग भी भाषा सशक्तिकरण हेतु अति आवश्यक है। उन्होंने कहा कि देवनागरी केवल एक लिपि नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, दर्शन, साहित्य और ज्ञान-संपदा की संवाहक है जिसने सदियों से ज्ञान के संरक्षण और प्रसार का दायित्व निभाया है।
कार्यक्रम के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिष्ठित साहित्यकारों एवं विद्वानों डॉ. राजलक्ष्मी कृष्णन (चेन्नई), डॉ. अर्चना गायतोण्डे (गोवा), डॉ. सी. जे. प्रसन्नकुमारी (तिरुवनंतपुरम्), डॉ. विजया भारती (विशाखापट्टनम्) तथा प्रो. धन्यकुमार जिनपाल बिराजदार (सोलापुर) का सम्मान किया गया। अधिवेशन का एक विशेष आकर्षण विभिन्न शोध पत्रिकाओं, साहित्यिक कृतियों एवं पुस्तकों का लोकार्पण समारोह रहा। इस अवसर पर ‘मीमांसा’ रिसर्च जर्नल, ‘सौरभ’ पत्रिका (न्यूयॉर्क, अमेरिका) तथा ‘नागरी संगम’ शोध पत्रिका (नई दिल्ली) का विमोचन किया गया। साथ ही श्रीमती अनीता तोमर के काव्य-संग्रह ‘संवेदना के पार’, डॉ. अनुश्री पी. एस. की पुस्तक ‘दृश्य-श्रव्य माध्यम में अनुवाद के संप्रेषणात्मक पहलू’, डॉ. मंजू गुप्ता ‘लता’ की पुस्तक ‘भोर का प्रणाम – भाग-दो’, डॉ. सी. जे. प्रसन्नकुमारी की पुस्तक ‘प्रणयदूत’, श्री कमल किशोर राजपूत ‘कमल’ के काव्य-संग्रह ‘मेरे पास आ’, श्रीमती भगवती सवर्सेन गौड़ की पुस्तक ‘वाणी की गूंज’, श्रीमती पुष्पा त्रिपाठी ‘पुष्प’ की कृति ‘वह झुकी नहींः मेरा आर्या’ तथा श्री कमल अग्रवाल की पत्रिका ‘उपल’ का लोकार्पण भी संपन्न हुआ। यह लोकार्पण सत्र हिंदी नसाहित्य की सृजनशीलता और समकालीन बौ‌द्धिक विमर्श का उत्कृष्ट परिचायक रहा। कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीमती अनीता तोमर ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से किया और रिपोर्टिंग का दायित्व श्रीमती नर्मदा कुमारी ने सफलतापूर्वक निभाया। कार्यक्रम के अगले सत्र में, ‘देवनागरी लिपि के विभिन्न आयाम और भारतीय ज्ञान परंपरा’ रहा जिसमें भाषा और संस्कृति के अंतर्संबंधों पर विषय विशेषज्ञ संबंधित अतिथि वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। डॉ. इंदु झुंझुनवाला असि. प्रो.कोयल विश्वास,हिंदी विभागाध्यक्ष, डॉ. तृप्ति शर्मा ने अपने व्याख्यान में देवनागरी लिपि की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, महत्ता और प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। वहीं दूसरी ओर, डॉ. मैथिली पी. राव, डॉ. मालतेश मैलार सहायक निदेशक, राजभाषा, डॉ. अनुश्री पी. एस., श्रीमती नर्मदा कुमारी,वरिष्ठ अनुवाद अधिकारी, राजभाषा ने पीपीटी के माध्यम से ब्राह्मी लिपि, प्रौद्योगिकी, अनुवाद में लिपि महत्ता और लिपि संरक्षण जैसे मुख्य विषयों की ओर ध्यान आकृष्ट किया। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान एवं कन्नड़ राज्य गीत “नाडे गीते” के सामूहिक गायन के साथ समारोह का सफलतापूर्वक समापन हुआ। अतः 50वाँ नागरी लिपि राष्ट्रीय अधिवेशन हिंदी भाषा, देवनागरी लिपि तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं प्रेरणास्पद आयोजन सिद्ध हुआ। इस अधिवेशन ने न केवल साहित्यकारों और विद्वानों को संवाद का सशक्त मंच प्रदान किया, अपितु पुनर्जागरण की दिशा में हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रति नई पीढ़ी में जागरुकता तथा गौरव-बोध को भी सुदृढ़ किया है।

रिपोर्ट :— नर्मदा कुमारी

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