दिन विशेष विमर्श में दीपा ‘दिनेशनील’: स्त्री-पुरुष के कर्तव्यों में समानता — क्या यह अब भी स्वप्नमात्र है?
दीपा ‘दिनेशनील’: रचनाकार, संपादक, अध्येता। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (स्वर्ण पदक से सम्मानित)! प्रिंट और टी.वी. पत्रकारिता के साथ-साथ ऑडियो-वीडियो प्रोडक्शन का अनुभव। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ फैशन टेक्नॉलोजी (वस्त्र मंत्रालय, भारत सरकार, मुंबई) में दस वर्ष के अध्यापन का अनुभव। फ़ैशन व लाइफ स्टाइल पत्रिकाओं का संपादन। नागरी लिपि परिषद् में जर्मनी के संयोजक की भूमिका। वैश्विक हिंदी परिवार में सक्रिय भागीदारी। समसामयिक विषयों एवं फ़िल्म समीक्षाओं का नियमित प्रकाशन। सृजनात्मक लेखन एवं रचनात्मक कार्यों में सक्रियता। सम्पर्क – deepalabh@gmail.com

दीपा ‘दिनेशनील’: स्त्री-पुरुष के कर्तव्यों में समानता —
क्या यह अब भी स्वप्नमात्र है?
आज हम उस दहलीज़ पर खड़े हैं, जहाँ स्त्री-पुरुष के अधिकारों की खाई धीरे-धीरे पटती जा रही है। कदम भले ही धीमे हों, पर दिशा साफ़ है – समाज अब स्त्रियों को पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चलने देने लगा है, उनकी उड़ान पर तालियाँ भी बजाने लगा है। फिर सवाल यह उठता है कि जिस सहजता से स्त्रियों ने दहलीज़ लाँघकर बाहर की दुनिया अपनाई, उसी सहजता से पुरुष घर की देहरी के भीतर क्यों नहीं उतर सके? बराबरी का दर्जा कागज़ों और नारों में तो मिल गया, पर रसोई की आँच, कपड़ों की तह और बर्तनों की खनक आज भी स्त्री के ही हिस्से में है। खाना बनाना, घर सँवारना, कपड़े धोना-इस्त्री करना, बच्चों का होमवर्क कराना, पेरेंट-टीचर मीटिंग में हाज़िरी लगाना — यह सूची लंबी है, और लगभग पूरी सूची स्त्रियों के नाम है। पुरुषों को यह कार्य सिखाए ही नहीं गए, तो करने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। यही कारण है कि “सारा दिन करती क्या हो?” और “काम तो हम भी करते हैं, फिर तुम इतना थक कैसे जाती हो?” जैसे संवाद रील्स और मीम्स बनकर वायरल तो होते हैं, हँसी भी बटोरते हैं – पर उनके भीतर छिपे दर्द को समझने की फ़ुर्सत न पुरुषों ने निकाली, न स्त्रियों ने कभी माँगना ज़रूरी समझा।
सदियों से यह धारणा हमारी रगों में उतार दी गई है कि कुछ काम पुरुषों को “शोभा नहीं देते” और कुछ काम करती स्त्रीयाँ “अच्छी नहीं लगती।” घर के कामों को भी इसी लकीर से बाँट दिया गया, मानो यह विभाजन कोई प्राकृतिक नियम हो, कोई ध्रुव सत्य। पर समय बदलता है, और उसके साथ हर मान्यता को फिर से तौलने की ज़रूरत भी पड़ती है — इस पर विचार करने की फ़ुर्सत ही किसी ने नहीं निकाली। स्त्रियों ने वे सारे किले फ़तह कर लिए, जिन पर कभी सिर्फ़ पुरुषों का झंडा लहराता था — बैंकिंग हो या सेना, पुलिस हो या इंजीनियरिंग, चिकित्सा हो या विज्ञान, खेल का मैदान हो या अंतरिक्ष की सीमाहीन ऊँचाई। किन्तु बाहर की दुनिया में यह उड़ान भरते-भरते स्त्रियाँ यह माँगना ही भूल गईं कि घर की ज़िम्मेदारियों में भी पुरुष बराबर के भागीदार बनें। नतीजा यह हुआ कि पुरुषों ने घर चलाना सीखा ही नहीं, और स्त्रियों के कंधों पर अनजाने ही दोहरी ज़िम्मेदारी का बोझ लदता चला गया – एक बोझ जो समय के साथ हल्का होने के बजाय भारी होता गया। इसका असर सिर्फ़ स्त्रियों के शरीर और मन तक सीमित नहीं रहा; परिवार टूटने लगे, रिश्तों में दरारें आने लगीं, और इस उथल-पुथल का सबसे मासूम शिकार बने घर के बच्चे।
पुरुषों के भीतर अब तक यह भाव जड़ नहीं पकड़ सका कि जैसे स्त्रियों ने बाहर की दुनिया में उनकी बराबरी की, वैसे ही उन्हें भी घर की चौखट के भीतर अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी। एक संतुलित, स्वस्थ समाज की नींव तभी मज़बूत होगी जब पुरुष घर के प्रति अपनी बराबर की भागीदारी को कर्तव्य नहीं, स्वाभाविक अधिकार और दायित्व दोनों मानेंगे।
पर यह भी सच नहीं कि इस स्थिति के लिए अकेले पुरुष कठघरे में खड़े किए जाएँ। घर के कामों को तुच्छ और हेय दृष्टि से देखने की जो सोच पनपी है, उसने पढ़ी-लिखी, नौकरीशुदा स्त्रियों को भी इन ज़िम्मेदारियों से कतराने पर मजबूर कर दिया है। ऐसे घर आज या तो काम वाली बाई के भरोसे चल रहे हैं, या भगवान भरोसे। सुनने में हास्यास्पद लगे, पर हाल के दिनों में तलाक़ के ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनकी जड़ में पत्नी का खाना बनाने से इनकार करना या पति का घर के काम में हाथ न बँटाना बताया गया। स्पष्ट है – स्त्री और पुरुष, दोनों अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियों को समझने में कहीं न कहीं चूक रहे हैं, और बाहर सफल होने की अंधी दौड़ में घर की बुनियादी ज़रूरतें बोझ बनकर उभर आई हैं।
तो प्रश्न यह है – वर्तमान संदर्भ में घर के कामों को लिंग की कसौटी पर बाँटे रखना कितना उचित है? यदि खाना बनाना केवल स्त्री की नहीं, बल्कि पूरे घर की ज़िम्मेदारी बन जाए, तो यही समस्या समाधान की पहली सीढ़ी बन सकती है। पति-पत्नी मिलकर, अपनी-अपनी दक्षता, समय और सुविधा के अनुसार काम बाँटें – यही सबसे स्वस्थ रास्ता है। भोजन हर किसी की ज़रूरत है, तो उसे पकाने की कला भी हर किसी को आनी चाहिए; इसे लिंग के आधार पर बाँटना अन्याय ही कहलाएगा। यही बात कपड़ों, साफ़-सफ़ाई और बच्चों की देखभाल पर भी लागू होती है – ये हर परिवार की साझा आवश्यकताएँ हैं, इन्हें केवल स्त्रियों की देहरी तक सीमित कर देना सर्वथा अनुचित है। बदलाव ही किसी भी समाज की प्रगति की नींव होता है – समय के साथ चलना हमारी ज़रूरत भी है और हमारा दायित्व भी।
कितना सुंदर होता अगर घर के कामों का बँटवारा लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि रुचि और ज़रूरत की प्राथमिकता के आधार पर होता। जिस पुरुष को खाना बनाना अच्छा लगता, उसका रसोई में खड़े होकर हाथ चलाना उतना ही सामान्य दृश्य होता, जितना किसी महिला अधिकारी का बोर्डरूम में प्रेज़ेंटेशन देना। जिसे खाना बनाना पसंद न हो, वह घर के अन्य कामों की बागडोर सहजता से थाम लेता — और इसे ‘एहसान’ या ‘मदद’ नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक ज़िम्मेदारी माना जाता। बच्चों की परवरिश भी माता-पिता की साझी यात्रा बनती, न कि ‘केवल माँ का कर्तव्य।’
राहत की बात यह है कि आज की नई पीढ़ी इस सच्चाई को काफ़ी हद तक समझने लगी है, और सहर्ष अपनी साथी का हाथ बँटाने लगी है। पर यह बदलाव मुट्ठी भर घरों तक सिमटा नहीं रहना चाहिए – इसे समूचे समाज की सोच में उतरना होगा। जिस समाज ने स्त्री के अस्तित्व को स्वीकार कर उसे बराबरी का दर्जा दिया, उसी समाज का यह भी उत्तरदायित्व है कि वह पुरुषों को परिवार के प्रति उतना ही संवेदनशील और उत्तरदायी बनाए। सच्चे अर्थों में सफल समाज तभी जन्म लेगा जब स्त्री-पुरुष का यह भेद मिट जाएगा, जब दोनों कंधे से कंधा मिलाकर स्वस्थ परिवार और उन्नत समाज की नींव रखेंगे – जहाँ शाम की चाय सिर्फ़ बहू की ज़िम्मेदारी नहीं होगी; जहाँ खाने के बाद प्लेटें समेटना सिर्फ़ बहन का काम नहीं होगा; और जहाँ “आज खाने में क्या बनेगा” — यह केवल माँ का टेंशन नहीं, पिता के मन में भी सहज रूप से पनपेगा।
