तुम्हारा मौन (कविता) : रमाशंकर भारती
डॉ० रामशंकर भारती : एक परिचय – 1960 के दशक में सुरीलों के गाँव कैलाशनगर, क्योलारी-जालौन (उत्तर प्रदेश) के कृषक परिवार में जन्मे रामशंकर भारती, लोकसंस्कृति अध्येता के रूप में विश्रुत हैं। आपने कविता, कहानी, उपन्यास, अस्मितामूलक विमर्श, आत्मकथा एवं ललित निबंध जैसी विधाओं में मौलिक लेखन किया है।
आपकी प्रमुख गद्यात्मक रचनाओं में ‘फागुन देहरी पर’, ‘महुआ चुये आधी रात’, ‘हरे बाँस मण्डप छाए’, (ललित निबंध),’देवास्वामिन’ (लघु उपन्यास) ‘रमरतिया’ (यौन विकलांग केंद्रित कहानी), ‘डॉ० विनय कुमार पाठक और इक्कीसवीं सदी के विमर्श’ (संदर्भ ग्रंथ), के अतिरिक्त ‘तुम हो तो’, तथा ‘आखिर कब तक’….? कविता संग्रह प्रकाशित हैं।

तुम्हारा मौन
अनेक रूपों में मुखरित है
तुम्हारा मौन
जैसे धरती के इस छोर से उस छोर तक
व्याप्त है अमर जीवन-राग
दूर्वादल पर बिखरी शबनमी बूंदों में
रंगबिरंगी तितलियों के पंखों पर
ठूँठ हुए आम के पेड़ के अँखुआ पर
कभी जिसकी छाँव में
गुरुजी पढ़ाते थे
कबीर के ढाई आखर का प्रेम
जिंदगी का दुर्गम पहाड़ा
सदानीरा नदी के उस घाट पर
जहाँ असन-वसन-निर्वसन
निष्छल-निष्काम देहें
मलमलकर नहातीं थीं
कालेज की उस दीवार पर
जहाँ आसानी से नहीं पड़ती थी किसीकी नजर चोरीछिपे सुंदर अक्षरों में लिखा था
एक अदद तुम्हारा नाम
नोकदार पेंसिल से डरते-डरते
उन दिनों के कशमकश में-कनखियों में
उच्छ्वासों-विश्वासों-अंतःआकाशों में
गली-गाँव-बीथियों में
मोती सिरजतीं सीपियों में
जीवन की सघन अनुभूतियों में
यहाँ-वहाँ-सर्वत्र बिखरी
दु:खती पीडा़ओं- अभावों में
सतत करता है -सृजन-संवाद
विषपायी होने की देता है प्रेरणा
बनाता है अभिराम
अविराम
तुम्हारा मौन
मुझे आज भी करता है
निःशब्द।
