‘अपनों को पाती’ अभियान से जुड़ी दो वृहद पुस्तकों पर सार्थक चर्चा

पत्र लेखन संस्कृति और संवेदनाएं बचाने का सशक्त माध्यम: डॉ. नेगी
जयपुर, 24 अगस्त। स्वयं सिद्धा साहित्यिक संस्थान, जयपुर के तत्वावधान में डॉ. राधाकृष्णन पुस्तकालय,जयपुर में सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. कृष्णा रावत द्वारा संपादित पुस्तक ‘स्मृति में रचे-बसे अद्भुत पत्र’ और ‘चयनित पत्र पुष्प’ पर सार्थक परिचर्चा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सूरज सिंह नेगी, मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार. टीकम चन्द बोहरा ‘अनजाना’ और साहित्यकार फारूक आफरीदी नें पुस्तकों का लोकार्पण किया । मंच संचालन साहित्यकार डॉ. आशा शर्मा ने किया।
मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि टीकम चन्द बोहरा ‘अनजाना’ ने अपने काव्यात्मक उद्बोधन में बदलते समय और रिश्तों की संवेदनहीनता पर चिंता व्यक्त की। अध्यक्ष डॉ. सूरज सिंह नेगी ने कहा कि पत्रों के माध्यम से अतीत की स्मृतियों को पुस्तक रूप में संकलित कर युवा पीढ़ी तक पहुँचाना इस मुहिम का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि पत्रों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की ऊष्मा को पुनः जागृत किया जा सकेगा।उनहोंने कहा कि ‘पाती अपनों की’ मुहिम ने ना केवल देश बल्कि विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय परिवारों में आत्मीयता, मैत्री, संस्कारों और समवेदनाओं को जगाने का काम किया। यह नन्हा सा अभियान आज वटवृक्ष का रूप ले चुका है। पत्रों के माध्यम से रिश्तों और संवेदनाओं को सहेजने का यह प्रयास निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों के लिए मूल्यवान साहित्यिक धरोहर सिद्ध होगा। पुष्पा माथुर एवं सलोनी क्षितिज ने लेखकों का परिचय प्रस्तुत किया।
पुस्तक की संपादक डॉ. कृष्णा रावत और साकार श्रीवास्तव ने बताया कि ‘पाती अपनों की’ मुहिम के अंतर्गत प्रकाशित ग्यारह पुस्तकों में संकलित 1103 पत्रों में से 363 पत्रों का चयन कर इन दो पुस्तकों में समाहित किया गया है। ‘लिख दी पाती बाबुल को’, ‘स्मृतियों के झरोखे से’, ‘पाती डाकिये को’, ‘बच्चों के पत्र’, ‘पाती शिक्षक को’, ‘एक पाती मीत को’ तथा ‘पत्र पिता के’ जैसे संग्रहों के माध्यम से परिवार, मित्रता, गुरु-शिष्य संबंध और समाज के विविध भावनात्मक पक्ष सामने आते हैं। परिचर्चा में डॉ. सुषमा शर्मा, कविता मुखर, इन्द्र कुमार भंसाली एवं ज्योत्सना सक्सेना ने दोनों पुस्तकों पर अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि ये पत्र अतीत की स्मृतियों, रिश्तों की आत्मीयता, प्रेम, वात्सल्य, मित्रता, सम्मान और मानवीय संवेदनाओं को जीवंत करते हैं। आज जब पत्रों का स्थान त्वरित संदेशों ने ले लिया है, ऐसे में यह पत्र-साहित्य हमारी भावनात्मक एवं सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। समीक्षकों ने विशेष रूप से ‘एक पाती मीत को’ के पत्रों में निहित पवित्र मित्रता, आत्मीयता और निःस्वार्थ भावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ये पुस्तकें केवल पत्रों का संकलन नहीं, बल्कि मानवीय रिश्तों और संवेदनाओं का दस्तावेज हैं।
इस अवसर पर संस्था संरक्षक प्रो. कुसुम शर्मा, संस्थापक अध्यक्ष डॉ ज्ञानवती सक्सेना’, महासचिव डॉ. रेखा गुप्ता, पूजा उपाध्याय,रजनी मिश्रा, मीनू अग्निहोत्री, मंजू कपूर, डॉ. रेखा गुप्ता, साधिके साकार, जीनस कंवर, डॉ. मंजुलता भट्ट, सलोनी क्षितिज, ब्रज वल्लभ असरे, एसके शर्मा, महावीर सिंह पटवाल, शिशुपाल सिंह रावत, पूरण चन्द्र भट्ट, अतिशा माथुर, डॉ. रत्ना शर्मा, ‘डॉ. सुषमा शर्मा, ज्योत्सना सक्सेना, कुमकुम माथुर, आरसी माथुर, डॉ. कंचना सक्सेना, अर्चना सिंह, हिमाद्रि समर्थ, नीता टहलयानी, नवल पाण्डे की गरिमामय उपस्थिति रही।
रिपोर्ट : फारूक आफरीदी , साहित्यकार पत्रकार
