पौराणिक अवधारणाएँ और यंत्र बुद्धि : प्राचीन मेधा और आधुनिक विज्ञान का वैचारिक सेतु – विजय नगरकर

मानव सभ्यता की प्रगति सदा से उसकी असीम कल्पनाओं और जिज्ञासा के पहियों पर आगे बढ़ी है। जो विचार कभी मिथक और फंतासी माने जाते थे, वे आज आधुनिक विज्ञान की प्रयोगशालाओं में यथार्थ बनकर उभर रहे हैं। इसी वैचारिक विमर्श को धरातल देने के उद्देश्य से ‘वैश्विक हिंदी परिवार’ द्वारा ‘पौराणिक अवधारणाएँ और यंत्र बुद्धि: एक वैज्ञानिक दृष्टि’ विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। डॉ. मोहन बहुगुणा के कुशल संचालन में संपन्न इस संगोष्ठी में तकनीकी विशेषज्ञों और भाषाविदों ने भारतीय ज्ञान परंपरा, प्राचीन आख्यानों और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के परस्पर संबंधों का गहन वैज्ञानिक व दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया।
मानवीय आकांक्षाओं का स्थायी अभिलेख
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता एवं वरिष्ठ तकनीकी विशेषज्ञ बालेंदु शर्मा दाधीच ने इस भ्रांति को दूर किया कि पौराणिक कथाएँ केवल कोरी भावुकता या अंधविश्वास हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि हमारे प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित ‘आकाशवाणी’ (Broadcasting/Wireless Communication), ‘दिव्य दृष्टि’ (Satellite Surveillance/Video Streaming) और ‘पुष्पक विमान’ (Aviation) जैसी अवधारणाएँ वास्तव में मानव मन की उन्नत तकनीकी आकांक्षाओं का प्रमाण हैं।
ये आख्यान दर्शाते हैं कि हमारे पूर्वजों की सोचने और भविष्य को देखने की क्षमता आधुनिक वैज्ञानिकों के समकक्ष थी। आज जब हम ध्वनि तरंगों के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में संवाद कर रहे हैं या उपग्रहों से पृथ्वी का दृश्य देख रहे हैं, तो यह उस प्राचीन बौद्धिक जिज्ञासा का ही व्यावहारिक विस्तार है।
प्राचीन साहित्य में रोबोटिक्स और ‘यंत्र मानव’
चर्चा को ऐतिहासिक और वैश्विक परिप्रेक्ष्य देते हुए बालेंदु जी ने शोधकर्ता एड्रियन मेयर की पुस्तक के संदर्भ से स्पष्ट किया कि प्राचीन सभ्यताओं में ‘स्वचालित यंत्रों’ की संकल्पना बहुत गहरी थी। प्राचीन भारतीय इतिहास में मगध नरेश अजातशत्रु द्वारा भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के उपरांत उनके पावन अवशेषों की सुरक्षा के लिए ‘यंत्र मानवों’ (Mechanical Automations/Robots) को तैनात किए जाने का उल्लेख मिलता है।
यह दृष्टांत प्रमाणित करता है कि मानव सदियों से अपनी शारीरिक सीमाओं को लांघने और श्रम को स्वचालित करने के लिए कृत्रिम बुद्धि व यंत्रों की रचना पर विचार करता रहा है।
परिणाम और प्रक्रिया के मध्य ‘मिसिंग लिंक’
बालेंदु शर्मा दाधीच ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी अंतर की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारे पौराणिक आख्यानों में चमत्कारी अस्त्रों और यंत्रों के ‘परिणाम’ (Functionality) का विस्तृत वर्णन तो मिलता है, किंतु उनके निर्माण की ‘प्रक्रिया’ (Engineering & Mechanism) का विवरण उपलब्ध नहीं है।
इसे एक ‘मिसिंग लिंक’ बताते हुए उन्होंने जोर दिया कि नई पीढ़ी को इन संदर्भों को न तो अंधभक्ति में चमत्कार मानना चाहिए और न ही आधुनिकता के दंभ में सिरे से खारिज करना चाहिए। आवश्यकता इस बात की है कि प्राचीन संकल्पनाओं को वैज्ञानिक शोध का विषय बनाया जाए और आधुनिक इंजीनियरिंग के माध्यम से उनके तार्किक सूत्रों को तलाशा जाए।
दिव्यास्त्रों की पात्रता और नैतिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Responsible AI)
वर्तमान में जब समूचा विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बेलगाम विस्तार और उसके खतरों को लेकर ‘Responsible AI’ और नैतिक दिशा-निर्देशों पर विमर्श कर रहा है, तब भारतीय दर्शन एक स्पष्ट मार्ग दिखाता है।
वक्ता ने उदाहरण दिया कि प्राचीन काल में ‘ब्रह्मास्त्र’ या अन्य दिव्यास्त्र किसी को भी यूँ ही उपलब्ध नहीं हो जाते थे; वे केवल नैतिक रूप से सुदृढ़ और आत्म-नियंत्रित ‘पात्र’ व्यक्ति को ही सौंपे जाते थे। विनाशकारी शक्तियों का अनियंत्रित प्रसार रोकने के लिए पात्रता का यह नियम आज के एआई दौर में सबसे प्रासंगिक है। तकनीक तभी मानवता के लिए वरदान बन सकती है जब वह मानवीय मूल्यों और उत्तरदायित्व से बंधी हो।
भारतीय ज्ञान परंपरा, संगणन और पाणिनीय व्याकरण
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रोफ़ेसर गिरीशनाथ झा (अध्यक्ष, सीसीएस, जेएनयू) ने भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान के लिए सबसे मजबूत वैचारिक आधार बताया।
बीज वाक्य और वैज्ञानिक आधार: हमारे दृष्टाओं ने जिन ‘बीज वाक्यों’ की रचना की, वे आगे चलकर ज्ञान-विज्ञान की विशाल शाखाओं में पल्लवित हुए।
पाणिनीय व्याकरण: आचार्य पाणिनी का संस्कृत व्याकरण नियमों और एल्गोरिदम पर आधारित एक अत्यंत परिष्कृत ढांचा है, जो आधुनिक ‘नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग’ (NLP) और कंप्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स के लिए सर्वोत्तम मॉडल प्रस्तुत करता है।
एआई मॉडल्स से पौराणिक तुलना:
प्रोफेसर झा ने एक रोचक रूपक प्रस्तुत करते हुए ‘शिव के गणों’ की तुलना आधुनिक ‘प्री-ट्रेन्ड एआई मॉडल्स’ (Pre-trained Models) से की, जिन्हें विशिष्ट कार्यों के लिए आवश्यकतानुसार ‘फाइन-ट्यून’ या पुनः प्रशिक्षित (Retrain) किया जा सकता है।
उन्होंने रेखांकित किया कि औपनिवेशिक काल में भारतीय ज्ञान परंपरा की जो निरंतरता टूटी थी, उसे आज के वैज्ञानिक युग में पुनः जोड़ने और अपनी भाषा व दर्शन को आधुनिक तकनीक के साथ समन्वयित करने की महती आवश्यकता है।
समन्वय और भविष्य की दृष्टि
विमर्शकार डॉ. राजीव कुमार रावत और सुश्री नर्मदा कुमारी के सारगर्भित हस्तक्षेपों ने परिचर्चा को और अधिक विस्तार दिया। कार्यक्रम के समापन पर डॉ. शिवम शर्मा ने सभी विद्वानों, तकनीकी दल और वैश्विक दर्शकों का धन्यवाद ज्ञापित किया।
यह संगोष्ठी इस स्पष्ट संदेश के साथ संपन्न हुई कि भारत की प्राचीन मेधा और समकालीन विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं। जब प्राचीन दृष्टि की दार्शनिक गहराई और आधुनिक विज्ञान की प्रायोगिक सटीकता एक साथ मिलेंगे, तभी हम एक ऐसी तकनीक का निर्माण कर सकेंगे जो बुद्धिमान भी हो और नैतिक रूप से संवेदनशील भी।
कार्यक्रम का प्रभावी और व्यवस्थित संचालन डॉ. मोहन बहुगुणा (पूर्व सहायक निदेशक, गृह मंत्रालय) द्वारा किया गया। उन्होंने कार्यक्रम की रूपरेखा को एक सूत्र में पिरोकर विद्वानों की चर्चा को आगे बढ़ाया।
इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य पौराणिक ग्रंथों में वर्णित तकनीकी कल्पनाओं—जैसे आकाशवाणी, दिव्य दृष्टि, पुष्पक विमान और यंत्र मानव—को आधुनिक विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के परिप्रेक्ष्य में परखना था। वक्ता बालेंदु शर्मा दाधीच ने यह स्पष्ट किया कि ये कथाएँ केवल मिथक नहीं, बल्कि मानव मन की जिज्ञासा और नवाचार का स्थायी अभिलेख हैं, जिन्हें आधुनिक इंजीनियरिंग और वैज्ञानिक दृष्टि से शोध का विषय बनाया जाना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शिवम शर्मा द्वारा किया गया । उन्होंने अध्यक्ष प्रोफेसर गिरीशनाथ झा, मुख्य वक्ता बालेंदु शर्मा दाधीच, विमर्शकार डॉ. राजीव कुमार रावत और सुश्री नर्मदा कुमारी के प्रति आभार व्यक्त किया। साथ ही, उन्होंने कार्यक्रम के संयोजक, तकनीकी टीम और देश-विदेश से जुड़े सभी दर्शकों का भी धन्यवाद किया, जिन्होंने इस चर्चा को सफल बनाया ।
