कविता – शिक्षक-कर्म : प्रखर शर्मा

Prakhar sharma

जैसे एक कुंभकार
एक कुंभ की रचना के दौरान
सर्वप्रथम भूमि पर पड़ी मिट्टी को परखकर
बहुत ही संजीदगी से उठाता है।
फिर कंकड़ बिन
पानी आदि से सानकर
पटककर-पीटकर
(तरह-तरह की चोट देकर)
उसे चिकना करता है।
इस तरह वह कुंभकार
गुथे हुए मिट्टी के आटे में
इक स्वतः दीप्ति उत्पन्न करने की कोशिश में रहता है
और फिर उसे सुडौल आकार देकर
परीक्षा के लिए
प्राकृतिक दीपपुंज के सम्मुख छोड़ देता है।
और एक मुकम्मल कुंभ का निर्माण करता है।
उसी तरह मूर्तिकार, चित्रकार, गायक, लेखक, कवि या अन्य कोई कलाकार
हर बार, अपनी नवीन रचना करते हुए
उत्तरोत्तर एकाग्र, चौकन्ना और समर्पित होता जाता है।
वही उसका जीवन-मरण, सुख-दुख सबकुछ होता है।
वही उसकी वास्तविक कमाई होती है।

उसी तरह एक सच्चा शिक्षक
अपने शिक्षार्थियों का स्रष्टा होता है।
शिक्षक के लिए शिक्षार्थी एक मिट्टी के सदृश है
और शिक्षार्थी के लिए शिक्षक कुंभकार।
जो भरता है सर्वप्रथम उसमें मनुष्यता का पाठ।
उसे सहेजता है, तपाता है, तरासता है, गढ़ता है।
उसके भीतर सृजित करता है
संवेदनाएं, भावनाएं और नीर-क्षीर विवेक।
एक सच्चे शिक्षक की कुल पूंजी उसका शिक्षार्थी है।
उसके सफल और सहृदय शिक्षार्थीगण ही
उसकी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »