दिन विशेष कथेतर में “राधाकृष्णन : एक दार्शनिक राष्ट्रपति एवं शिक्षक”- डॉ. अनुज प्रभात
“समाज में शिक्षकों के महत्व को पहचानने के लिए 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाइये। यह कथन 11 मई 1962 को, भारत के द्वितीय राष्ट्रपति के पद पर आसीन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का था, जब 5 सितम्बर 1962 को उनका जन्मदिन मनाने की अनुमति मांगने उनके शिष्य उनके पास आये।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपने जीवन का आरंभ एक शिक्षक के रूप में किया था। दर्शनशास्त्र में एम.ए. करने के उपरांत सर्वप्रथम सन् 1916 में वे मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज में सहायक प्राध्यापक नियुक्त हुए। वहां अध्यापन कार्य करते हुए अनेक लेख और भाषणों के द्वारा विश्व को भारतीय दर्शन से परिचित कराया। वे अन्य कई विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक होने के साथ-साथ चांसलर एवं वाइस-चांसलर रहे। वे 1931 से 1936 तक आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर रहे। 1937 में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के जार्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर पद पर नियुक्त हुए और 1941 तक अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहे। अपने इसी अध्यापन काल में वे सन् 1936 से 1952 तक ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के तौर पर भी जाते रहे। वे विविध शैक्षणिक संस्थानों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय के चांसलर भी रहे। इसलिए, उन्होंने शिक्षक सम्मान को लेकर तीन नारा दिया था-
- हर शिक्षक का सम्मान करें, अच्छे काम करके उनका नाम करें,
- शिक्षक दिवस जब भी आता, हर बच्चे का दिल खुश हो जाता तथा
- 5 सितम्बर हर वर्ष मनायें, टीचर्स का सम्मान बढ़ाएँ।
डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन अपनी योग्यता से ऐसी पहचान बना ली थी कि भारतीय राजनीतिज्ञ भी उनका सम्मान करने लगे थे। फलस्वरूप 1947 में जब संविधान सभा का निर्माण हुआ तो उन्हें भी उसका सदस्य बनाया गया और 1949 तक उसके सदस्य रहे। इसके पूर्व 1946 में संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) में भारतीय प्रतिनिधि मंडल के नेतृत्व का दायित्व मिला और 1952 तक उस दायित्व का निर्वहण किया। वे 1948 से 1949 तक यूनेस्को के कर्मचारी बोर्ड के अध्यक्ष भी रहे।
आजादी के बाद जब सोवियत संघ के विशिष्ट राजदूत के लिए चयन की बात आयी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने डॉ.राधाकृष्णन को चयनित कर सबको चकित कर दिया। उनके इस चयन पर अनेक लोगों को आश्चर्य हुआ कि एक दर्शनशास्त्री को राजनयिक सेवा के लिए क्यों चुना गया; लेकिन उन्होंने साबित कर दिया कि भारतीय राजनयिकों में वे सबसे बेहतर थे। इसके बाद सोवियत संघ से वापस आने पर 1952 में उन्हें भारत का प्रथम उपराष्ट्रपति बनाया गया। फिर राष्ट्रपति भी बने।
डॉ. राधाकृष्णन एक दर्शनशास्त्री होने के कारण उन्होंने भारतीय दर्शन और पाश्चात्य दर्शन का काफी अध्ययन किया था। भारतीय दर्शन में वे प्रत्ययवादी और शंकर अद्वैतवाद से अत्यधिक प्रभावित थे। अद्वैत वेदान्त की उनकी व्याख्या को ‘नव वेदान्त ‘ की संज्ञा दी जाती है। उनके इस दर्शन पर प्रोफेसर सी.ई.एम.जोड ने “काउंटर अटैक फ्रॉम द ईस्ट” शीर्षक नाम से एक ग्रंथ लिखा जिसे काफी ख्याति प्राप्त हुई।
एलबर्ट स्वाइजर ने राधाकृष्णन के दर्शन में नव हिंदू धर्म का प्रवर्तन देखा और उसको जीवन तथा जगत की सत्ता का प्रतिपादन करने वाला दर्शन माना। डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन को प्रायः धर्म मीमांसा के रूप में स्वीकार किया जाता है तथा पश्चिम में धर्म मीमांसक राधाकृष्णन को अपना सजातीय मानते हैं। डॉ. राधाकृष्णन ने अपने दर्शन में ‘स्पिरिट ‘के अर्थ की व्याख्या करते हुए कहा है कि मात्र जीव, पुरुष या आत्मा नहीं, बल्कि समष्टि है जिसको वेदान्त में ब्रह्म कहा गया है और पश्चिमी दर्शन में “एब्सोल्यूट”। इसी चैतन्य का साक्षात्कार मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य है।
डॉ. राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 में तमिलनाडु के तिरूतनी ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरा स्वामी था। इनकी माता का नाम सीताम्मा था। इनकी शिक्षा क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लूथने मिशन स्कूल तिरूपति में 1896 से आरंभ होकर 1906 में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज मद्रास से दर्शन शास्त्र में एम. ए. कर समाप्त हुई। इन्होंने अपने अध्ययन काल में ही बाइबिल के कुछ अंशों को याद करने के साथ-साथ वीर सावरकर और स्वामी विवेकानंद का भी अध्ययन किया था। अर्थात वे निरंतर विविध विषयों का अध्ययन करते रहते थे। फलस्वरूप उन्होंने अनेक रचनाएँ की। उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ निम्न हैं-
1.भारतीय दर्शन, खंड-1(1923)
2.भारतीय दर्शन, खंड-2(1927)
3.उपनिषदों का दर्शन (1924)- इंडियन फिलॉसफी आॉफ रवीन्द्रनाथ टैगोर (1825)
- गौतम बुद्ध जीवन और दर्शन 1925)
- जीवन का एक आदर्शवादी दृष्टिकोण (1932)
7.पूर्वी धर्म और पश्चिमी विचार (1939) - पूर्व और पश्चिम: कुछ प्रतिबिंब (1955)
ग़ौरतलब है कि पूर्व और पश्चिम: कुछ प्रतिबिंब में पश्चिमी लोगों के लिए भारतीय विचारों की व्याख्या करने का प्रयास किया गया है और इस लेख को हाल ही में मैरेन गोल्डबर्ग द्वारा संशोधित और अद्यतन किया गया है। डॉ. राधाकृष्णन को उनकी योग्यता से प्रभावित होकर ब्रिटिश साम्राज्य ने 1931 में ‘सर’ की उपाधि से नवाजा तो भारत सरकार द्वारा 1954 में देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न ‘ से अलंकृत किया गया। यह अलंकरण भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं एक दार्शनिक शिक्षाविद को पहली बार प्राप्त हुआ था। इसके बाद जब वे राष्ट्रपति बने तो 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर सदा के लिए राजनीति से संन्यास ले लिया और फिर 17 अप्रैल 1975 को अपने निवास स्थल चेन्नई में रहते हुए संसार को अलविदा कह गये। किन्तु, जब-जब 5 सितम्बर आता है और बच्चों के चेहरे पर शिक्षक सम्मान को लेकर मुस्कान आती है तो डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ‘दर्पण’ बन जाते हैं।
