दिन विशेष पुस्तक समीक्षा : ‘शहर दर शहर’ (उपन्यास) — लेखक राजेंद्र राजन – समीक्षा : निर्देश निधि द्वारा

निर्देश निधि इतिहास में एम.फिल. हैं और कहानी, कविता, संस्मरण, यात्रा-संस्मरण, उपन्यास तथा समसामयिक एवं पर्यावरण संबंधी लेखन में सक्रिय हैं। उनकी रचनाएँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं तथा अनेक ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। उनके प्रमुख प्रकाशन हैं—कहानी संग्रह ‘झाँनवाद्दन’ (2017, पुनः ‘शेष विहार’ शीर्षक से 2023), ‘सरोगेट मदर’ (2021), काव्य संग्रह ‘नदी नीलकंठ नहीं होती’ (2023) तथा संस्मरण संग्रह ‘मोती से दिन’ (2025)।

‘नदी नीलकंठ नहीं होती’ को जयपुर साहित्य संगीति सम्मान प्राप्त हुआ है और यह ‘साहित्य तक’ की 2023 की टॉप-10 पुस्तकों में शामिल रहा। उनकी कहानी ‘मैं ही आई हूँ बाबा’ को रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार (2019) एवं कथारंग पुरस्कार (2024), तथा ‘जीकाजि’ को ‘विटामिन जिंदगी’ प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। उन्हें जनपद गौरव, हिंदीश्री, सृजन सम्मान सहित अनेक सम्मान मिले हैं।

निर्देश निधि ने ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन, मॉरीशस में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भाग लिया। वे संपादन, सामाजिक सरोकारों, बाल शिक्षा-स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। उनकी अनेक रचनाओं का पंजाबी, बांग्ला, मराठी, भोजपुरी और अंग्रेजी में अनुवाद हुआ है।

‘शहर दर शहर (उपन्यास)’

‘शहर दर शहर’ राजेन्द्र राजन जी का लिखा हुआ एक रोचक उपन्यास है। हालाँकि मुझे इसे पढ़कर लगता है कि यह उनके जीवन की घटनाओं का लेखा-जोखा है। यह उनके जीवन की कथा है जिसे उन्होंने एक उपन्यास का नाम दिया है, संभवतः। ऐसा उन्होंने अपने प्राक्कथन में उल्लेख किया भी है कि यह पाठक के ऊपर है कि वह उसे उपन्यास या आत्मकथा जो भी समझे। उपन्यास में एक फौजी पिता का बेटा है जो अपने तमाम संघर्षों के विषय में बता रहा है। जिसने छोटी महत्वहीन सी नौकरी से लगाकर एक अच्छी नौकरी तक की है।

कथानायक ने एक लड़की से प्रेम किया है और उससे विवाह के लिए उसने तमाम लड़ाई-झगड़े घर-परिवार वालों से मोल लिए हैं। कभी उसने टाइपिंग में कैरियर की तलाश की है, कभी सेनेटरी शॉप में सेल्समैन का काम किया है। कहीं वह आढ़ती की मुनीमगिरी करते हुए दिखाई देता है। कहीं वह दिलबर से दिल्लगी करता दिखाई देता है। जहाँ वह अपने किसी एक दोस्त के विषय में बात कर रहा है।

नायक कई तरह की नौकरियां करता है और छोड़ता है। उसके तमाम किस्से राजन जी द्वारा यहाँ उद्दृत किए गए हैं। लेखक ऐसी बातों को बहुत ही रोचक तरीके से रखते हैं जैसे नायक किसी लड़की के बारे में कहता है कि मैं भी उस पर लट्टू सा होने लगा था बाजार में मैं बेमतलब सा घूमता हुआ उसे मिल जाता तो मेरा रास्ता रोक कर पूछती, कैसे हो राजू? दरअसल उसने मुझसे बिना पूछे या मेरी सहमति लिए बगैर ही मेरा नाम राजू रख दिया था। उसका नाम मुझे याद नहीं रहा लेकिन उसका हंसता हुआ नूरानी चेहरा, काली जुल्फें रंग सुनहरा आज भी मेरा पीछा करते हैं। उस लड़की के भाई की शहर में ही करियाने की दुकान थी जो आज भी अमृतसर में है।

नया शहर नए जख्म, इस शीर्षक के अंतर्गत बड़ा सुंदर वर्णन है। नायक यह बताता है कि उसकी प्रेमिका उम्र में उससे 3 साल बड़ी थी लेकिन इसकी नायक को जरा भी परवाह नहीं थी। नायक कहता है कि अक्सर हम अंबाला छावनी के बाजार में अपनी-अपनी साइकिल पर घूमते तो लोग हमें देखकर शक करते। कानों में कभी-कभार कोई जुमले भी बोलते यह जोड़ी बढ़िया है मगर मैं अपनी प्रेयसी के नाम से असहज था। कभी वह अपना नाम हरबंस बताती तो कभी हरीश। नायक कहता यह भी कोई नाम है? तुम लड़की हो या लड़का मैं? लड़की कहती क्या करूँ माँ – बाप ने जो ठीक समझा रख दिया। नायक कहता बदलो इसे। तुम्हारा नाम ज्योत्सना होना चाहिए सारे विश्व को रोशनी देने वाली, आलोकित करने वाली। वह कहती यह नाम मुश्किल है ना, किसी को भी समझ नहीं आएगा। इस पर नायक कहता है कि यार मैं लेखक हूँ तेरे लिए साहित्य से चुनकर लाया हूँ एक नया सा नाम।

नायक ज्योत्सना नाम से उस लड़की को पुकारता है, ज़ाहिर है वह उससे प्रेम करता है। फ़ौजी पिता उसके साथ ही विवाह करने के लिए बिलकुल राज़ी नहीं हैं परंतु नायक अपने घरवालों से कितना कुछ लड़ाई – झगड़ा करता है और आत्महत्या करने की धमकी तक दे देता है फिर अंत में उनके पिता को मानना पड़ता है और दोनों की शादी हो जाती है। पर शादी में पिता का दहेज लेना और नायक का मना करना रोचक है। बैंड वालों को पूरे पैसे ना देना। कोई क्यों देगा जब बैंड वाले ना तो यूनिफ़ोर्म में थे, उनके कपड़े बहुत गंदे थे सबसे खराब बात तो यह कि वे ठीक – ठीक धुन ही नहीं निकाल पा रहे थे। इस तरह हरीश अंत में ज्योत्सना बना ही दी जाती है। यह 1978 की बात है, फिर लेखक कहता है कि जून 1978 में संपन्न विवाह की दिसंबर 2021 आते-आते क्या गत हुई होगी इस राज को पोशीदा रखना ही बेहतर है। लेखक तमाम लेखकों से मिलने के अपने किस्से बताता है। वह जिस – जिससे, जहाँ – जहाँ, जब-जब मिले और जिस तरह उन्होंने लेखन आरंभ किया वह सब इस पुस्तक में बताते हैं।

विनोद सहगल का किस्सा हो या फिर दैनिक हिंदी ट्रिब्यून में नौकरी करने का किस्सा लेखक ने बड़े रोचक तरीके से सारी घटनाओं को अंकित किया। नायक जनसत्ता में अपनी पत्रकारिता का इतिहास भी बताता है और अपनी रिपोर्टिंग के बारे में बताता है, उसके खतरे बताता है। किस तरह वह एक खोजी पत्रकार बनकर फीचर लिखता है, किस तरह वह जनसत्ता में छपी कुछ खबरों के आधार पर हीरो सदृश बन जाता है। आरम्भ में बड़े लेखकों से मिलना , लेखन का आरम्भ, सब बड़ा रोचक शैली में लिखा है। यह सब है और इसके अलावा भी तमाम प्रकरण हैं जिन्हें लेखक ने बहुत ही रोचक ढंग से उपन्यास में जगह दी है। कुल मिलाकर कहें तो उपन्यास प्रवाहपूर्ण शैली में लिखा गया है, रोचक है, पठनीय है।
राजेन्द्र राजन जी हिमाचल से हैं, वे एक जाने – माने लेखक हैं। “इरावती” पत्रिका के सम्पादक और सर्वेसर्वा रहे हैं।
यह उपन्यास विजया बुक्स दिल्ली से २०२२ में प्रकाशित है। इसका मूल्य २९५ रुपए है।

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