दिन विशेष युवा लेखन में डॉ. राम प्रवेश रजक की कविता

वह तो मैं था
किसी ने ऊपर वाले
से कहा
मैं आपको देखना
चाहता हूँ
आपको महसूस करना
चाहता हूँ
ऊपर वाले ने
जवाब दिया
जब तुम अपने गर्म
बिस्तर में चैन की
नींद सो रहे थे और
सर्दियों की उस रात में
एक भीगते हुए शख्स ने
तुम्हारे दरवाजे पर
दस्तक दी थी
वह तो मैं था
जब तक तुम सड़क पर
से गुजरते थे
और एक शख्स से चला
नहीं जा रहा था
तुम तेजी से गुजर गए
तुम दफ्तर के लिए
देर हो रहे थे
वह तो मैं ही था
सड़क पार नहीं कर पा रहा था
तुमने उसको कभी
देखने की कोशिश नहीं की।
यकीन
मैंने नैनीताल की
प्राकृतिक छटा को देखा
बहुत खुश हुआ, ऊपर वाले की कुवत पर।
दूसरी बार ताजमहल
देखा तो और खुश हुआ
लोगों के हुनर पर।
तीसरी बार तब खुश हुआ जब एक बच्ची
को देखा सड़क पर फेंके
फूल से एक गुलदस्ता बनाकर
बेचते हुए।
जो बोल रही थी
इसे मैंने बनाया है
खरीद लीजिए साहब
भगवान आपका भला करेगा।
जिस मुल्क का बच्चा
मेहनत करना जानता है
वह सब कुछ कर सकता है
जिंदगी का यकीन पुख्ता
हो गया।
रुख़
जो दूर से खड़ा
होकर समुंदर को
देखता है तो उसका
रंग कुछ और
नजर आता है
कि बिल्कुल उसके
पास खड़ा होगा
उसे समुंदर का
वास्तविक रंग, नीला
नजर आएगा
इसमें समुंदर का
कोई कसूर नहीं
मेरे और आपके
नजर के रुख़ का फ़र्क हैं
अपना रुख़ बदल लूँ
तो क्या हर्ज है
रुख़ बदल तो लूँ
क्या गुरेज़ है
हो सकता है हमें
समुंदर एक जैसा
नजर आने लगे।
डॉ. राम प्रवेश रजक
सहायक प्राध्यापक
हिंदी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय
