दिन विशेष युवा लेखन में संक्षेप बरनवाल ‘अक्षत’ की कविताएँ

( शोधार्थी, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं अतिथि सहायक आचार्य, श्री गुरु तेग बहादुर खालसा महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय)
मो. 7785857299
ईमेल : sankshepbaranwal@gmail.com
क्या दोषी राम अकेले हैं ?
सकल सृष्टि के नायक को भी क्रंदन का अभिशाप मिला था..
राम स्वयं ब्रह्मांड सकल जो उनको पश्चाताप मिला था..
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एक वेदना राजा की थी और एक थी पति के मन की…
या तो सातों वचन निभा लूँ या फिर रक्खूँ बात स्वजन की..
इतिहासों में वर्तमान हित निर्णय व्यथित अकेले हैं…
क्या रामराज्य के हर निर्णय में दोषी राम अकेले हैं… ?
आततायी रावण वध करके प्रभु जब अवधपुरी को आये
जनकनंदिनी संग राघव को राजमुकुट गुरूवर पहनाये
राजा सदा लोक को अर्पित यह प्रवचन मुनि श्रेष्ठ सुनाये
लोकवचन का मूल्य बचाते मर्यादित अलबेले हैं
क्या रामराज्य के हर निर्णय में दोषी राम अकेले हैं… ?
हार मुबारक
ख्वाबों के दरिया को हमने आँसू को हर बार बहाया..
जब जब मन में पीर उठी तो शब्दों का मरहम पिसवाया.
हर दिन पर्दे के पीछे हम कितना टूटे कितने बिखरे..
लेकिन पर्दे के आगे बस सुर छेड़ा और राग सुनाया..
सुर की दीवानी दुनिया को नया गीत नव प्यार मुबारक..
चलो अभागे मन के भीतर तुमको अपनी हार मुबारक…
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कितने आँसू,कितनी आँखें, कितनी कितनी बार बतायें..
अच्छा होगा शायद सबको,सकुशल है संसार बतायें..।
मन की पीड़ाओं को शायद सुर के साथ निभाया जाये..
आँखों से निकले से अच्छा गीत सुधा बरसाया जाय..
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गीत सुधा में डूबे मन को पीड़ा का उपहार मुबारक..
चलो अभागे मन के भीतर तुमको अपनी हार मुबारक..
उठो पार्थ ! गाण्डीव उठाओ
हारा हुआ शख्स ख्वाबों में झूठी विजय तलाशा करता…
मरघट के चौखट पर चढ़कर जो जीवन की आशा करता….
उसकी विजय सुनिश्चित करना मात नहीं,है घोर विवशता
जो अंतस में टूट चुका हो वो क्या कहीं तमाशा करता…
अपनों का सम्मान बचाने व्यसनों का वध करना होगा..
उठो पार्थ ! गाण्डीव उठाओ तुम्हें विजय को लड़ना होगा..
जीवन में कुछ हार नहीं है.. हारों को संसार नहीं है..
छिपकर डरकर जी पाना खुद पौरुष को स्वीकार नहीं है
शुरू किया है जो रण तुमने उसमें जान भिड़ानी होगी..
तुम तो रण कौशल दिखलाओ बाकी स्वयं कहानी होगी..
अपनी संप्रभुता के खातिर स्वयं तुम्हीं को अड़ना होगा..
उठो पार्थ ! गाण्डीव उठाओ तुम्हें विजय को लड़ना होगा..
गीत
जब जब मैंने खुद को तोड़ा जाने कितने लोग बचाये ।
लेकिन इस कोशिश में मैंने तुम पर भी मलबा ढाया है ।।
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देखो मैं ना कहता था कि साथ रहोगी दुखी रहोगी,
केवल आँसू का सागर हूँ कब तक अपनी नाव गहोगी ।
तुमसे बस इतना कहना है माफ नहीं करना तुम मुझको,
लेकिन तुमसे हो पाये तो खुश रखना तुम हरदम खुदको ।
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अपने स्वाभिमान के खातिर बस तुमको ही समझाया है ।
लेकिन इस कोशिश में मैंने तुमपर भी मलबा ढाया है । ।
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सुनो तुम्हारी आँखें खुश होने की ख़ातिर बनी हुई हैं,
दुःख छोड़ो खुशियाँ खुद चौखट तक आकर के रुकी हुई हैं ।
रूप तुम्हारा शतवंती के चौसर पर मैं हार गया हूँ,
धिक् जीवन सौगंधों में मैं अपना सबकुछ वार गया हूँ ।
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संबंधों की सौगंधों का पूरा मोल चुकाया है ।
लेकिन इस कोशिश में मैंने तुम पर भी मलबा ढाया है ।।
पापा खड़े हैं
वो बरगद सी छाया सफेदे सा कद,
वो बड़ी सी दुनिया वो छोटा सा पद
वो मेहनत की सीखें वो थक कर भी लड़ना
वो अंधेरे के जुगनू का सूरज से भिड़ना,
वो बचपन का दोस्त वो सुखदुख का साथी,
वो रौशन दिये की जलती हुई बाती,
वो जीवन के रण में अकेले लड़े हैं
मुझे कोई दिक्कत तो पापा खड़े हैं।।
वो जिनकी वजह से मैं दुनिया में आया,
वो जिसने मुझे यहां चलना सिखाया ,
वो ताकतवर हाथों की हल्की सी दुलार,
वो छोटी सी गलती पे तगड़ी सी मार ,
वो पैसों की मशीन वो प्यार की भरमार,
वो थका पथिक जिसे मंजिल का इंतजार,
वो मानस की सीखें वो वेदों का ज्ञान,
वो गीता के श्लोक वो अनोखी पहचान ,
वो संस्कारों की माला में सबसे बड़े हैं ,
मुझे कोई दिक्कत तो पापा खड़े हैं।।
