आँधियों का मौसम ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय
आँधियों का मौसम ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय मैंने तो अपने घर के टीन-छप्पर सँभाल लिए हैं, आप अपनी रक्षा स्वयं करें। जिधर से सुनों यही सुनने को…
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आँधियों का मौसम ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय मैंने तो अपने घर के टीन-छप्पर सँभाल लिए हैं, आप अपनी रक्षा स्वयं करें। जिधर से सुनों यही सुनने को…
अध्यक्षस्य प्रथम दिवसे ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जन्मेजय उन्होंने मुझे सुबह सुबह चौंका दिया। सुबह सुबह चौंकाने का काम या तो पत्नी करती है या फिर टेलीफोन करता…
अंधेरे के पक्ष में उजाला ( समकालीन व्यंग्य ) : प्रेम जनमेजय मेरे मोहल्ले में अनेक चलते किस्म के लोग रहते हैं। मेरे मोहल्ले में पुलिस, न्यायालय, संसद, साहित्य, नौकरशाही…
प्रेम जन्मेजय के कलम से : -प्रेम जन्मेजय मित्रो! पिछले डेढ़ महीने से मेरा ओढ़ना- बिछौना बना ‘व्यंग्य यात्रा’ का 148 पृष्ठीय जुलाई- सितंबर 2025 अंक प्रेस में चला गया…
अपनी राह की अन्वेषक -प्रेम जन्मेजय 1969 में दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्टस फैक्लटी में मेरे साहित्यिक व्यक्तित्व का निर्माण करने वाले शिक्षाकाल का आंरभ हुआ तो लगा कि कुएं से…