“रेडियो की भाषा” : निबंध
इस्लामी दार्शनिक जलालुद्दीन रूमी ने अपनी मसनवी में एक कहानी बयान की है। एक आदमी ने चार अलग-अलग भाषा बोलने वालों को एक दिरहम दिया और एक चीज़ खरीदने को कहा –
ईरानी ने अपनी ज़बान फ़ारसी में कहा – इससे अंगूर खरीदेंगे।
अरबी आदमी ने अपनी ज़बान में, यानी अरबी में कहा – इससे इनब खरीदेंगे।
तुर्की ने कहा – हम उज़ूम खरीदेंगे।
और एक चौथे आदमी ने कहा – इस्ताफ़िल खरीदेंगे।
और चारों आपस में लड़ने लगे। उस वक्त अगर चारों भाषाएँ जानने वाला वहाँ कोई होता तो बताता कि आप सब एक ही चीज़ खरीदना चाहते हैं और वह है ‘अंगूर’ – जिसे संस्कृत में द्राक्ष और अंग्रेजी में ग्रेप्स कहते हैं।
दरअसल भाषा का मसला विवाद का है ही नहीं, भाषा तो संवाद के लिए है और यह संवाद तभी बेहतर हो सकता है जब शब्द के न केवल अर्थ बल्कि मर्म को भी समझ लिया जाए। हाँ, भाषा ऐसी ज़रूर होनी चाहिए जिसके अर्थ निकालने में कोई तकलीफ़ न हो, लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि भाषा अपनी सार्थकता और सांस्कृतिक पहचान खो दे।
भाषा कैसी हो, इस बारे में विषय, प्रांत, व्यक्ति आदि को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं और वे मत ठीक भी हो सकते हैं, लेकिन एक सर्वसामान्य…
अर्थ में भाषा को लेकर भारतेंदु बाबू हरिश्चन्द्र का एक छंद उल्लेखनीय है–
‘जो हि एक बार सुनें, मोहे सो जनम भमरी
ऐसा न असर देख्यो, जादू के तमासा में
अहि हूँ नवावे सीस, छोटे बड़े, रीझैं सब
मगन रहत नित पूर होई आसा में
देखी न कबहु मिसरी में मधु हूँ मैंना
रसाल ईख दारा में न तनिक बतासा में
अमृत में पाई न अधर में सुरंगना के
जैसी मधुराई भूप सज्जन की भाषा में।
सज्जन की भाषा यानी भाषा की गरिमा ही माध्यमों की, संवाद की और संप्रेषण की भाषा होनी चाहिए।
वैसे भी हम यदि इस बात पर बारीकी से विचार करें कि जब हम यह कहते हैं कि आज मैंने शैली और कीट्स को पढ़ा। गालिब और मीर को पढ़ा। तुलसी और कबीर को पढ़ा। रामदास या तुकाराम को पढ़ा या फिर भवभूति और कालिदास को पढ़ा, तो हम-आपको यह बताने की आवश्यकता कभी नहीं होती कि शेक्सपीयर को अंग्रेजी में पढ़ा और कालिदास को संस्कृत में। दरअसल यह सारे नाम किसी भाषा, प्रांत, देश या जाति के रह ही नहीं जाते। यह नाम हैं साहित्य के, कविता के, शायरी के, जिनके माध्यम से अपनी बात को हम अधिक सार्थक, रोचक, तार्किक और प्रभावी बना पाते हैं। और यह कहना आज भी अनुचित न होगा कि साहित्य और समाज, कला और संस्कृति के जितने संदर्भ आकाशवाणी के कार्यक्रमों में आज भी हैं, उतने अन्य माध्यमों या एफ.एम. चैनलों पर उपलब्ध नहीं हैं। कहना होता है कि रेडियो ने ‘अभिव्यक्ति’ से उसके लिखित और दृश्य; सभी साधनों से परे उसे उच्चारित शब्द (स्पोकेन वर्डस) का जो अस्त्र दिया, वह कई बार इस्तेमाल होने के बाद भी उसकी धार कभी कम नहीं होती, बल्कि दृश्य और लिखित कार्य को और अधिक व्यापक करने में जो माध्यम सहयोगी बना; वह है रेडियो। फिल्मों की काव्यमय उपलब्धियों को बार-बार दुहराकर (गीतों का निरंतर प्रसारित होते रहना) भाषा और शब्द की रंजकता को दिल-दिमाग में बसाकर रेडियो ने भाषा और फिल्मों पर उपकार ही किया है।
एक समय था जब भाषा की शुद्धता आकाशवाणी की पहचान थी। (कुछ एक अपवादों को छोड़कर आज भी है) वार्ता, चर्चा में अनेक उदाहरण प्रस्तुत होते थे, एक प्रसंग याद आता है, आज के धार शहर को राजा भोज के जमाने में धारा नगरी
कहते थे। राजा भोज स्वयं विद्वान थे। ‘सरस्वती कंठाभरणम्’ और ‘शृंगार प्रकाश’ ये उनके ग्रंथ प्रसिद्ध हैं। वे अपनी प्रजा का हाल जानने कभी-कभी अकेले घोड़े पर निकला करते थे। एक बार उन्होंने एक वृद्ध को लकड़ी का भारी गट्ठर लिए उसके बोझ से परेशान होते देखा, तो कहा – “भो वृद्ध, भारं न बाधति? तुम्हें वृद्धावस्था में भारी बोझ परेशान नहीं कर रहा?” वृद्ध ने राजा के अशुद्ध वाक्य पर कटाक्ष करते हुए कहा, “राजन् न तथा भारं बाधते यथा बाधते बाधते” अर्थात् लकड़ी के भारी बोझ से जितनी तकलीफ नहीं हो रही है उससे अधिक परेशान यह ‘बाधते’ शब्द कर रहा है।
एक समय था जब आकाशवाणी अकेला माध्यम था और एक शब्द विचारपूर्वक बोला, कहा जाता था और विश्वसनीयता इतनी कि विद्वानों में भी उसे मानक और शुद्ध समझा जाता था। उच्चारण, तलफ्फुज या प्रनाउंसिएशन (प्रनन्सीएशन) पर बहस छिड़ जाती, शब्दकोष खुल जाते, लुगत देखी जाती और डिक्शनरी से ‘कनफर्म’ किया जाता।
आज मसला थोड़ा अलग है। चिंता बोलने वाले को नहीं है और सुनने वाले का तो प्रश्न ही नहीं है। कहा जाता है कि रेडियो ही नहीं है बहुत से घरों में, लेकिन यह आधे से भी आधा सच है। आकाशवाणी की जो भूमिका देश के सामाजिक, सांस्कृतिक और कला जीवन में है, उसे झुठलाया नहीं जा सकता। भाषा किसी देश की पहचान होती है और भाषा का सर्वाधिक प्रयोग माध्यमों में होता है। और चूँकि रेडियो एक ऐसा माध्यम है जहाँ केवल और केवल ‘शब्द’ होता है, इसलिए वह ‘आकाश’ तक उठकर ‘वाणी’ रूप में व्यापक हो जाता है। इसी व्यापकता के कारण इस माध्यम की जिम्मेदारी भी कुछ अधिक है।
आकाशवाणी की भाषा को लेकर एक प्रश्न पहले से ही चर्चा में रहा। वह प्रश्न था – भाषा के स्वरूप को लेकर। हिंदी और हिंदुस्तानी को लेकर। यही कारण था कि दिल्ली केंद्र से वर्ष 1939 में 20 से 25 फरवरी के बीच हर दिन ‘हिंदुस्तानी क्या है’ इस विषय पर वार्ता प्रसारित की गई। वार्ताकार थे – डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. जाकिर हुसैन, प्रो. ताराचंद्र, आचार्य नरेन्द्र देव और आसिफ अली। हिंदी-हिंदुस्तानी का यह विवाद या चर्चा आज भी है और शायद आगे भी रहे। लेकिन यह अवश्य ध्यान रखने योग्य है कि विषय के अनुरूप भाषा का प्रयोग हो रहा है या नहीं, क्योंकि कठिन और सरल – ये शब्द समाज और प्रांत पर भी निर्भर हैं कि वहाँ कैसी भाषा बोली जाती है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर समय और प्रसंग का विचार करना भी आवश्यक है। स्वाधीनता दिवस समारोह में यदि बहुतायत में उर्दू का प्रयोग होगा जैसे कुछ वाक्य ‘आज हम आजाद हैं’ हजारों कुर्बानियों के बाद मिली आजादी, ‘हमारा प्यारा मुल्क’ और कुछ शेर भी, यह हवा आजाद है, यह फिजा आजाद है, तो यहाँ विचार का बिंदु यह है कि भारत के स्वतंत्रता दिवस समारोह का आँखों देखा हाल बताते समय भाषा का स्वरूप दिन विशेष पर क्या हो?
शेर अवश्य पढ़े जाएँ, लेकिन साथ ही साथ हिंदी की कुछ कविताएँ प्रसंगानुरूप बोली-पढ़ी जाएँ, तो लोगों को अच्छी ही लगेंगी—जैसे निराला की कविता—
भ्रमर का गुंजार, वह भी स्वाधीन,
पक्षियों का कलरव वह भी स्वाधीन,
उदय अस्त दिनकर का, सब है स्वाधीन,
या सोहन लाल द्विवेदी की पंक्तियाँ—
जय स्वतंत्र भारत, जय जननि, जय नव भारत हे!…
जय नवीन आकाश धरा नव, चंचल अंचल हर्ष भरा भव
नव जीवनमय नवचेतनमय जय नव जागृत है…।
आज यदि हम आकाशवाणी के अतिरिक्त भी टी.वी. चैनलों की भाषा सुनें तो कई जगह ऐसा लगता है कि कुछ शब्दों का प्रयोग जानबूझकर तो नहीं, लेकिन अनावश्यक भी लगता है—(जैसे) आत्मघाती के लिए ‘फिदाइनी’, हिमपात के लिए ‘बर्फबारी’, प्रांत या प्रदेश के लिए ‘सूबा’, अपहरण के लिए ‘अगवा’, देश के लिए ‘मुल्क’ जैसे शब्द।
आकाशवाणी द्वारा ‘सामुदायिक गान’ कार्यक्रम सर्वथा अभिनंदनीय पहल है। देश की सभी प्रांतीय भाषाओं के शब्द का, साहित्य का थोड़ा ज्ञान और भान तो हमें हो ही जाता है, लेकिन यहाँ भी हिंदी भाषा के गीत के लिए दो अवसरों पर पॉल रॉब्सन की गीत रचना ‘वी शैल ओवरकम’ का अनुवाद ‘हम होंगे कामयाब’ और दूसरी बार ‘वक्त की आवाज है मिल के चलो, जिन्दगी का राज़ है मिल के चलो’ हिंदी भाषा के साथ अन्यायपूर्ण लगता है। इसे बस यही समझ कर छोड़ देना ठीक है।
चूँकि रेडियो एक बहुश्रुत माध्यम है, वह ध्वनि-चित्र बनाता है, दृश्य बनाता नहीं, बल्कि दृश्य बनाने की स्वतंत्रता देता है। केवल एक बार सुना जा सकता है, रेडियो का संदेश हवा में विलीन हो सकता है, इसलिए इस माध्यम की भाषा पर अधिक विचार और चिंता की जरूरत है। यहाँ ‘और’ शब्द केवल उच्चारण… से अपना अर्थ बदल देता है। और ऑर तथा मोर अधिक। ऐसे ही अनेक शब्द और वाक्य – ‘मैंने आपको एक किताब दी थी’ वाक्य में प्रत्येक शब्द पर स्वराघात से उसके अर्थ की अभिव्यक्ति अलग होती जाएगी।
रेडियो के प्रसारणकर्ता के लिए यह भी आवश्यक है कि प्रांत विशेष की भाषा के अलावा हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत और उर्दू का कार्यसाधक ज्ञान यदि उसके पास है, इन भाषाओं के शब्द उसके पास हैं तो कार्यक्रम में, संभाषण में, अपनी प्रस्तुति में वह अधिक सफल होगा। उच्चारण की शुद्धता प्रसारण और भाषा की अनिवार्य शर्त है, क्योंकि दोषपूर्ण, असहज और गलत उच्चारण से अर्थभिन्नता ही नहीं, अर्थ का अनर्थ हो सकता है।
स्वजन – (आत्मजन), श्वजन (कुत्ता), सकलम (कुल), शकलम (अपूर्ण, खंडित), जलील (महान), ज़लील (अधम, नीच), साक़ी (शराब पिलाने वाला/वाली), शाक़ी (शिकायत करने वाला), शक्र (दरार, विदीर्ण), शक (संदेह) ऐसे अनेक उदाहरण लगभग सभी भाषाओं में मिलते हैं। भाषा की सहजता और रोचकता साथ ही संप्रेषण क्षमता की परिणति लोकप्रियता में होती है। उसका लाभ मिलता है। इसलिए रेडियो और अन्य माध्यमों को भाषा के प्रति उनके सामाजिक दायित्व को भी समझना होगा।
शब्द माध्यम के लिए विषय की उपयुक्तता, स्वर और ध्वनि का ध्यान, छोटे और सरल वाक्य (भाषा नहीं) विषयानुरूप भाषा, आँकड़ा का कम-से-कम उपयोग, सटीक एवं स्पष्ट सामग्री, लक्षित श्रोता के लिए विषय की संबद्धता, अच्छी तकनीकी गुणवत्ता के साथ रोचक प्रस्तुति, यही है मंत्र; अच्छे प्रसारण और बेहतर कार्यक्रम का।
आज 24 भाषाओं और लगभग 146 बोलियों में आकाशवाणी अपना प्रसारण करता है। लोकजीवन, लोकभाषा और लोक संस्कृति के संरक्षण–संवर्धन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। सबको साथ लेकर; सबके साथ चलकर; शब्दों का संसार सजाए हम आपको ‘बोलता’ करती है; ‘वक्ता’ बनाती है और वक्ता बनना कितना कठिन है, यह बात इस श्लोक से स्पष्ट होती है –
शतेषु जायते शूरः, सहस्रेषु च पंडितः।
वक्ता दशसहस्रेषु, दाता भवति वा न वा॥
सौ में एक वीर, हजार में एक विद्वान लेकिन वक्ता दस हजार में कोई एक हो पाता है।
