प्रतीक्षा ( कविता ) : मंजु गुप्ता
क्या कभी तुमने महसूसा है
वह क्षण
जब देह की पोर- पोर में
उग आती हैं आँखें
रोम-रोम बन जाता है कान
और सहस्राक्ष सा अपलक गिनता है
किसी बेहद अपने की प्रतीक्षा के पल
गुनता है छोटी से छोटी मद्धिम आवाज़ें
सुनता है हर आहट, नब्ज की धड़कन- सी
कैसे आवेशमय होते हैं वे पल
प्रतीक्षा के, इंतज़ार के क्षण
जब आने वाले के लिए दिल धड़कता है
सारी देह, आँख या कान बन जाती है
कितनी मधुर, कितनी विह्वल कर देने वाली होती हैं
इंतज़ार की वे घड़ियाँ
जब समय रुक जाता है
वक्त ठहर जाता
हर पल एक युग हो जाता
और हृदय साँस रोक करता है प्रतीक्षा
किसी बेहद अपने की
