(वीश्व पर्यावरण दिवस) : दोहे – डॉ. बबिता ‘किरण‘
मेरे आंगन झूमती, हरियाली की डोर।
करती चिड़ियों की चहक, सुखद सुहानी भोर।।
बना हुआ है घोंसला, चीं चीं का है शोर।
काश कभी हम देख ले, अपने आंगन मोर ।।
आओ जल संचित करें , जल जीवन की नींव ।
जल जाएंगे जल बिना , क्या पौधे क्या जीव।।
जंगल काट रहा मनुज,जीव हुए बेहाल।
मानव तेरा पाप ही, बना हुआ है काल।।
बना हुआ था घोंसला,झूम रही थी शाख।
कुदृष्टि मानव की पड़ी , शाख हो गई राख।।
