“मेघ कहाँ से बरसेंगे” : कविता

काट रहे हो जब पेड़ों को,
मेघ कहाँ से बरसेंगे।

मानव लगा हुआ है देखो,
अंधाधुंध कटाई में।
बिन बारिश सब हरियाली अरु,
पैदावार खटाई में।।
जल बिन अवनी सूखी होगी,
पेड़ कहाँ से सरसेंगें।
काट रहे हो जब पेड़ों को,
मेघ कहाँ से बरसेंगे॥

व्याकुल पंछी भटकेंगे नित,
सरवर सब सूखे होंगे।
जीव-जंतु सब जंगल के नित,
पनघट पर प्यासे होंगे।।
तांडव ऐसा होगा जग में,
गिद्ध काग सब हर्षेंगे।
काट रहे हो जब पेड़ों को,
मेघ कहाँ से बरसेंगे॥

नित्य करो अब वृक्षारोपण,
पौधों का शोषण रोको।
हरी-भरी हो वसुधा नित अब,
वननिर्मूलन को टोको।।
पौधें हैं श्रृंगार धरा के,
बादल फिर से गरजेंगे।
काट रहे हो जब पेड़ों को,
मेघ कहाँ से बरसेंगे॥

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