दो लड़कियाँ ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना

दो –दो लड़कियाँ रहती हैं 
मेरे भीतर!
एक वो, 
जो पैदा हुई थी
गली के कोने वाले घर में

जहाँ सौर के बाहर बैठे लोग
आँचल में छुपा
बचा लेना चाहते थे उसे
ज़माने की हवाओं से,
और उसे बचाने के डर में 
घटते रहे थे… 
ख़ुद!
वो लड़की,
उनके घटने को देख-देख 
बँटती रही भीतर ही
और अपने बढ़ते क़द को 
छुपाने के लिये
होती रही 
दोहरी!!
फिर उस दोहरी हुई लड़की के
भीतर से ही
पैदा हुई, 
एक और
लड़की!
जो न होना चाहती थी दोहरी
न छुपाना चाहती थी 
अपना क़द
न बँटना चाहती थी 
अपने ही भीतर!!
 
ये दोनों ही लड़कियाँ रहती हैं
मेरे भीतर…..!!
हर बात पर राय है 
दोनों की अलग-अलग
बहसती हैं 
झगड़ती हैं,
हर बात पर!
कभी जीतती है 
दोहरी हुई लड़की…..
कभी, 

सीधी खड़ी लड़की….!!
और मैं…,
उनकी बराबर जारी बहस से
थक कर 
अब
इंतज़ार में हूँ,
एक की स्थायी जीत की…..॥……………

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