ब्रिटेन में हिंदी कविता के साढ़े तीन दशक! : डॉ. पद्मेश गुप्त
डॉ. पद्मेश गुप्त ब्रिटेन में बसे प्रतिष्ठित साहित्यकार, शिक्षाविद्, उद्यमी और समाजसेवी हैं, जिन्होंने हिन्दी भाषा, शिक्षा और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में चार दशकों से उल्लेखनीय योगदान दिया है। वे यू.के. हिन्दी समिति के संस्थापक, अनेक प्रतिष्ठित पुस्तकों के लेखक तथा ब्रिटेन में हिंदी सम्मेलनों के संजोकर रहे हैं। विश्व हिन्दी सम्मेलन सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनके साहित्यिक और सामाजिक कार्यों को सम्मानित किया गया है, जिनमें भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया गया विश्व हिन्दी सम्मान भी शामिल है।

मैं 1985 के वर्ष में विद्यार्थी के रूप में यूरोप आया था परन्तु ब्रिटेन में मेरी हिंदी यात्रा आरम्भ हुई, 1990 में जब मैं लन्दन के कुछ हिंदी अध्यापकों और लेखकों के संपर्क में आया।
मैं इस लेख में उन लोगों के उल्लेख को प्राथमिकता दे रहा हूँ, जो मेरी दॄष्टि में मूलतः कवि थे अथवा कविता को निरंतरता और गंभीरता के साथ लिख रहे थे एवं कवि के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बनाने में सफल रहे।
1992 में मेनचेस्टर के एक कवि सम्मलेन के मंच पर मेरा परिचय हुआ, उस समय के हिंदी कवियों से जिसमे सत्येंद्र श्रीवास्तव, गौतम सचदेव, अचला शर्मा, भारतेन्दु विमल और निखिल कौशिक के नाम उल्लेखनीय हैं। यह मेरे जीवन का पहला अवसर था जब मैं किसी मंच पर काव्यपाठ कर रहा था।
डॉ सत्येंद्र श्रीवास्तव विश्व विख्यात कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय में अध्यापन करते थे और श्रेष्ठ कवि थे। सत्येंद्र जी की कविता ‘विंस्टन चर्चिल मेरी माँ को जानते थे’ उनकी हस्ताक्षर कविता रही। सत्येंद्र जी के लेखन की एक विशेषता यह भी थी कि उनके लेखन में यहाँ के जीवन को अत्यंत गहनता से देखा जा सकता है और अपने समय का प्रतिबिम्ब पूरी बौद्धिकता के साथ इतिहास का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जा सकता है।
डॉ. गौतम सचदेव ब्रिटेन के ऐसे रचनाकार थे जिनकी विद्वता का लोहा अच्छे अच्छे मानते थे। साहित्य की हर विधा में पारंगत और पूरी निरंतरता के साथ लिखने की अद्भुत क्षमता रखते थे। कविता की भी करीब करीब सभी विधाओं में उनका लेखन गौतम जी को अत्यंत विशिष्ट श्रेणी में खड़ा करता था। गौतम जी की कविता ‘अलविदा दिल्ली’ ने तमाम कविता प्रेमियों को उनका प्रशंसक बना दिया था।
अचला शर्मा बी.बी.सी. हिंदी सेवा लन्दन के माध्यम से रेडियो नाटकों के लिए जानी जाती थी। परन्तु अचला जी की कविताओं और उनकी प्रस्तुति किसी भी मंच को जीवंत करने में पूर्ण रूप से सक्षम रही है। अचला जी की ‘प्रेम प्रसंग’ जैसी अनेक प्रेम कवितायेँ पाठकों और श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध करती हैं। ‘सन्दर्भ पुराने हैं/व्याख्याएं अधूरी/प्यार की बहस में अब क्या रखा है’ पंक्तियां अचला जी के लेखन शैली का सशक्त उदाहरण है।
भारतेन्दु विमल संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान होने के साथ साथ हिंदी फिल्म जगत से भी सम्बन्ध रखते हैं, अतः उनके लेखन में साहित्य का मर्मत्व मिलना स्वाभाविक हो जाता है। विमल जी की हस्ताक्षर कविता ‘कलंक का टीका’ बेहतरीन व्यंग्य है।
निखिल कौशिक की कविताओं की श्रेष्ठता यह है कि उनकी रचनायें पाठकों से बात करती हैं। संवाद करती कविताओं की यही खूबी है कि वह अपने पाठकों के मन में सीधे सीधे, बिना किसी लाग लपेट के उतर जाती हैं। ‘तुम लन्दन आना चाहते हो’ कविता ने डॉ. निखिल कौशिक को इंग्लैंड ही नहीं अपितु भारत में भी प्रशंसकों की कतार खड़ी कर दी थी।
90 के दशक में, इनके आलावा ब्रिटेन में ओंकार नाथ श्रीवास्तव, कीर्ति चौधरी, सोहन राही और चमन लाल चमन के नाम सिर्फ इंग्लैंड में ही नहीं, भारत में भी सम्मान के साथ प्रतिष्ठा पा चुके थे या पा रहे थे।
ब्रिटेन आने से पूर्व ही ओंकार जी और कीर्ति जी भारत में हिंदी साहित्य के क्षेत्र में अपना स्थान बना चुके थे।
सोहन राही और चमन लाल चमन इंग्लैंड की गिनती सेलिब्रिटी कवियों में आती थी। बिना चमन जी या राही जी के लन्दन का कोई भी मुशायरा पूरा नहीं माना जाता था। हिंदी के आलावा उर्दू और पंजाबी भाषाओँ में भी आप दोनों के गीत और ग़ज़ल खूब पसंद किये जाते थे। जहाँ एक ओर सोहन राही के गीत बड़े बड़े गायकों की आवाज़ बन रहे थे तो दूसरी और चमन जी के गीत सिनेमा जगत का सौंदर्य बन रहे थे।
90 के दशक में हिंदी कविता को और अधिक बल मिला जब डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी जी ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त बन कर आये, और साथ आईं उनकी पत्नी, कमला सिंघवी जी। सिंघवी दंपत्ति स्वयं कवि थे, हिंदी प्रेमी थे अतः ब्रिटेन में हिंदी कविता को अभूतपूर्व प्रवाह मिलने लगा।
1997 में मैंने ब्रिटेन की हिंदी कविता को संगठित करने के उद्देश्य से यहाँ के 25 कवियों का संग्रह ‘दूर बाग़ में सोंधी मिट्टी’ संग्रहीत, सम्पादित और प्रकाशित किया एवं पुरवाई पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया जिससे मुझे अवसर मिला इस देश के इन सशक्त कवियों की रचनाओं से परिचित होने का और प्रकाशित करने का।
90 के दशक के अंत की ओर दिव्या माथुर, उषा राजे, शैल अग्रवाल, उषा वर्मा, प्राण शर्मा की कविताओं ने भी अपनी पहचान बनानी शुरू की। दिव्या माथुर की काव्य लेखनी में अनोखी क्षमता यह थी कि दिव्या जी एक विषय को उठा कर उस पर अनेक कवितायेँ लिख लेती हैं। उनके कविता संग्रह ‘ख्याल तेरा’, अंतःसलिला’, ‘झूठ’ उनकी इस अद्भुत क्षमता के उदाहरण हैं।
दिव्या माथुर, उषा राजे, शैल अग्रवाल और उषा वर्मा का रचना संसार बड़ा है, सशक्त और मार्मिक कविताओं के आलावा कथा साहित्य में भी इन चारों का महत्पूर्व योगदान रहा है।
उषा राजे की कवितायें जीवन के अनेक अनुभवों को अत्यंत नज़दीक से देखती और समझती ही नहीं अपितु मार्मिक अभिव्यक्ति में भी सफल रही हैं।
मैं शैल जी की कविताओं में उनके शब्दों के चयन का प्रशंसक हूँ। शैल जी की लेखनी में काव्यात्मक प्रवाह अत्यंत प्रभावशाली है, फिर चाहे वह कविता हो, कहानी हो या कोई लेख। उषा वर्मा की रचनाएँ विचार शीलता और बौद्धिकता में मंझी हुई, पाठकों के मस्तिष्क को सोंचने पर मजबूर कर देती है।
प्राण शर्मा ग़ज़ल और शायरी के बहुत बड़े उस्ताद रहे हैं। विशेष रूप से अपनी ग़ज़लों के माध्यम से प्राण जी ने ब्रिटेन के हिंदी साहित्य में अपना विशेष स्थान बनाया।
इस दौरान डॉ. रुपर्ट स्नेल के अवधि भाषा में लिखे दोहे भी आकर्षण का केंद्र रहे।
2000 के दशक के आरम्भ के साथ जय वर्मा जी के अलावा अनिल शर्मा जोशी के साथ मेरी पीढ़ी के अन्य कवि मोहन राणा, तितिक्षा शाह, वंदना मुकेश, अजय त्रिपाठी, तेजेंद्र शर्मा, दिवाकर सुकुल, ब्रिज गोयल, अरुण अस्थाना जैसे नाम प्रकाश में आने लगे। इसे ब्रिटेन में हिंदी कविता का स्वर्णिम युग माना जाने लगा।
सत्येंद्र जी ने यहाँ तक लिख दिया कि ब्रिटेन में हिंदी का विस्फोट हो गया है। इसके साथ ही ब्रिटेन के कवियों, उनकी रचनाओं को भारत की मूल धारा से जुड़ने की शुरुआत हो गयी, प्रकाशकों के सम्पर्क, विश्विद्यालयो में यहाँ के लेखकों को मान्यता मिलने लगी।
जय वर्मा के लेखन में जीवन की अनेक समस्यायें और उनके समाधान मिलते हैं।
सन 2000 में अनिल शर्मा जोशी जी लन्दन के भारतीय उच्चायोग में भारतीय राजनयिक के रूप में, हिंदी एवं संस्कृति अधिकारी के पद पर आये। अनिल जी एक श्रेष्ठ कवि होने के साथ साथ अद्भुत संगठन क्षमता रखते हैं, अतः लंदन आते ही अनिल जी की अगुवाई में ब्रिटेन में हिंदी कविता का सैलाब आ गया। वर्ष में तीन से चार कवि सम्मेलन सिर्फ़ ब्रिटेन के कवियों के आयोजित होने लगे।
अनिल जी लम्बी कविता के कवि हैं, साथ ही विषय की जड़ों तक पहुँच अपने विषय के समस्त कोण व्यक्त करते हैं जो पाठकों को उनका बड़ा प्रशंसक बनाने में कामयाब रहती है। मुक्तछंद की कविता होने के बावजूद कविता का प्रवाह लिए अनिल जी की प्रवासी जीवन की अनेक रचनाओं ने अपनी प्रासंगिकता के कारण ब्रिटेन में हम जैसे अनेक कवियों को अपना अनुगामी बना लिया था। अनिल जी की कविता ‘नींद कहाँ है’ ब्रिटेन के हिंदी समाज के लिए अत्यंत प्रेरणादायी कविता बन कर उभरी।
मेरी अनेक चर्चित कविताओं का जन्म अनिल जी के ही सान्निध्य और उसी दौरान हुआ जैसे ‘पौधा’, ‘कबूतर’ और ‘छड़ी घडी ऐनक’; जिसे 2005 में अनिल जी द्वारा संग्रहीत और सम्पादित पुस्तक ‘धरती एक पुल’- ब्रिटेन के हिंदी कवियों के संग्रह में स्थान भी मिला।
मोहन राणा जी के विषय में यही कहूंगा कि ऐसे कवि सदियों में गिने चुने ही पैदा होते हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि मोहन जी मेरे समकालीन ही नहीं अपितु मेरी पीढ़ी के कवि हैं और इंग्लैंड के निवासी हैं जो मेरी भी कर्म भूमि है। मोहन राणा आम पाठक के कवि नहीं हैं। उनका बौद्धिक स्तर, कविता के प्रति अद्भुत समझ, अभिव्यक्ति में कल्पना और प्रतीकों का विस्तार मोहन जी को कवियों की अत्यंत विशेष श्रेणी का कवि बनाता है।
तितिक्षा जी की कवितायेँ भावनाओं और अनुभवों के मध्य,अभिव्यक्ति का संवाद करती, प्रवासी जीवन को चित्रित करती अपने लेखन प्रवाह से पाठकों को आकर्षित करती हैं।
वंदना मुकेश मेरी दॄष्टि में ऐसी कवियत्री हैं जिन्हें कहानी को भी कविता में पिरो कर लिखना आता है। आज के सामाजिक परपेक्ष्य में अपनी बात को पूरी बेबाकी के साथ गजलों के माध्यम से व्यक्त करती अजय त्रिपाठी की रचनाएं निश्चित रूप से वर्तमान समाज का प्रतिबिम्ब हैं।
तेजेन्द्र शर्मा मूलतः कहानीकार हैं, शब्दों और विषयों का भण्डार लिए, प्रवासी जीवन को अभिव्यक्त करती तेजेन्द्र जी की कविताएँ ऐसे विषयों का स्पर्श करती हैं जो हम आम प्रवासियों की भावनाओं को अपनी बात लगती है।
दिवाकर सुकुल पेशे से मनोचिकित्सक हैं, अतः मनुष्य के मनोविज्ञान को समझती दिवाकर जी की कवितायें पाठकों के मन-मस्तिष्क को भीतर तक छू जाती हैं।
अरुण अस्थाना एक अत्यंत मंझे हुए लेखक हैं। उपन्यास, कहानियों के आलावा अपनी कविताओं में भाव प्रवाह के साथ ऐसे शब्दों और प्रतीकों का प्रयोग करते हैं जिन्हें पढ़कर बड़े बड़े दिग्गज कवि अरुण से प्रभावित हो जाते हैं।
बृज गोयल ब्रिटेन में एक मात्र मूलतः हास्य-व्यंग्य के कवि हैं। बृज जी हास्य और व्यंग्य के माध्यम से गंभीर सन्देश देने से नहीं चूकते।
इन दो दशकों में नरेश भारतीय, तोशी अमृता, डॉ. कृष्ण कुमार, अरुणा सभरवाल, शन्नो अग्रवाल, शशि माथुर, रघुवीर मल्होत्रा, इंदिरा आनंद, कृष्ण कन्हैया, ललित मोहन जोशी, पुष्पा राव, महेंद्र वर्मा, पुष्पा भार्गव, श्यामा कुमार, रमा जोशी, स्वर्ण तलवार जैसे कवियों की रचनाएं भी प्रकाश में आयी।
2010 का दशक, ब्रिटेन में हिंदी कविता के लिए कुछ दुर्भाग्यपूर्ण रहा या इसे ट्रांज़िशनल दशक भी कह सकते हैं। लंदन के कवि परिवार में शिखा वार्ष्णेय का आगमन अवश्य हुआ परंतु एक पूरी पीढ़ी हमसे दूर होने लगी। सत्येंद्र श्रीवास्तव, गौतम सचदेव, चमन लाल चमन, ओंकारनाथ श्रीवास्तव, कीर्ति चौधरी, प्राण शर्मा अस्वस्थ रहने लगे और धीरे धीरे हमें छोड़ कर चले गए। सोहन राही जी की अस्वस्थता, उषा राजे, तितिक्षा, दिव्या जी कविताओं के सक्रिय लेखन से दूर होने लगे जिसके परिणाम स्वरुप इस दशक में कविता लेखन की प्रगति में कमी आयी।
शिखा वार्ष्णेय की कवितायेँ पाठकों से सीधे संवाद ही नहीं करती अपितु शब्दशः अपने पूरे भावार्थ के साथ पाठकों और श्रोताओं के मन में उतर जाती हैं, बल्कि घर कर जाती हैं। हमारी रोज़मर्रा के जीवन का प्रतिबिम्ब हैं शिखा की रचनायें।
अब नया दशक नए लेखकों का नया दौर स्वर्णिम लग रहा है। नयी संभावनाओं का दशक लग रहा है। कोविड काल के दौरान मैंने प्रत्येक सोमवार शाम को ज़ूम कॉफ़ी हाउस का वर्चुअल आयोजन शुरू किया था जिसमे मुझे नए और अपरिचित कवियों के साथ संवाद करने का अवसर मिला। इसकी उपलब्धि यह रही कि मैंने पाया कि ब्रिटेन में नयी प्रवासी पीढ़ी के लेखकों और कवियों का नया युग प्रवेश कर चुका है जिसमे तिथि दानी, ऋचा जैन, अन्तरीपा ठाकुर मुखर्जी, आशुतोष कुमार, अभिशेख त्रिपाठी, आशीष मिश्र, शेफाली फ्रॉस्ट एवं इंदु बरौट उल्लेखनीय हैं।
यदि हम तिथि दानी की कविताओं की गहनता और लेखन शैली की बात करें तो तिथि की लम्बी कवितायें- अपने विषय को हर कोण से उसकी जड़ों में पहुँच कर प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। विषय की गहराई में उतर कर, शिखर तक भावों की यात्रा, कविता लेखन की इस कठिन शैली को तिथि अपनी कविताओं में बड़ी आसानी से अभिव्यक्त कर लेती हैं।
ऋचा जैन अपने लेखन में प्रतीकों के माध्यम का शानदार प्रयोग करती हैं। उनकी हर रचना, कविता की सम्पूर्णता को बौद्धिकता की पराकाष्ठा के साथ, पूर्ण होती दिखाई देती है। मुक्तछंद की कविता होने के बाजवूद तिथि और ऋचा की कविताओं की सुन्दर संरचना उन्हें पठनीय बनाती हैं। उनकी रचनाओं की बौद्धिकता समाज में बुद्धजीवी पाठकों का एक बड़ा वर्ग तैयार करती है।
अन्तरीपा की कविताओं में संवेदनशीलता आज के समाज के अनेक ऐसे प्रसंगों को उठाती है, यथार्थ को उजागर करती है, जिन पर संभवतः लोग कुछ कहने या लिखने से कतराते हैं।
अभिषेख त्रिपाठी की कवियतों में एक तरफ व्यंग्य की धार और दूसरी तरफ गंभीर गीत लिखने की प्रतिभा उनको हर वर्ग के पाठकों और श्रोताओं को बहुत जल्द ही अपना प्रशंसक बना लेते हैं।
आशुतोष का लेखन ग़ज़ल और गीत की विधा में सशक्त पकड़ रखता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी रचनाएं छंद में बंधे होने के बावजूद, बिना अपने विषय से भटके, कविता की हर कसौटी पर खरी उतरती है।
आशीष मिश्र का लेखन कविता के संस्कार का अवतार लगता है। उनके छंद की मौलिकता और प्रासंगिकता देख कर ऐसा लगता ही नहीं कि आशीष ने कविता लिखने के लिए लिखा है। एक प्रवाह में गीत के आरम्भ से अंत तक, पाठकों को बांधती आशीष की कवितायेँ, नए दशक में प्रवासी ही नहीं अपितु वैश्विक हिंदी साहित्य की उपलब्धि है।
शेफाली फ्रॉस्ट आज ब्रिटेन में हिंदी की श्रेष्ठ रचनाकारों में से एक हैं। शेफाली की कवितायेँ उनकी अभिव्यक्ति एक चलचित्र सा दिखाती चलती है। जीवन को परदे के पीछे से देखती उनकी रचनायें शेफाली को अत्यंत विशिष्ठ श्रेणी का रचनाकार बनाती है।
इंदु बरोट की रचनाओं में सरलता और सहजता हर वर्ग के पाठक को आकर्षित करती है। इंदु का साहित्यिक भविष्य संभावनाओं से भरपूर है। साथ ही ज़किया ज़ुबैरी, रश्मि खुराना और मधु कुमारी चौरसिया जैसे अनेक कवियों की सशक्त कवितायेँ प्रकाश में आ रही हैं और ब्रिटेन के हिंदी इतिहास को समृद्ध कर रही हैं।
कुछ वर्ष पूर्व लंदन के भारतीय उच्चायोग में हिंदी अधिकारी के पद पर आये तरुण कुमार जी ने ‘प्रवासी मन’ के नाम से ब्रिटेन के हिंदी लेखकों का संग्रह सम्पादित किया जिसमे इस देश के अनेक लेखकों की रचनाएं प्रकाशित हैं।
मैं मानता हूँ कि ब्रिटेन में हिंदी साहित्य का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है और विश्व में हिंदी साहित्य का पिछले तीन दशकों से महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहाँ के लेखन को हमेशा गंभीरता के साथ लिया गया है। ब्रिटेन के प्रवासी लेखन का हिंदी साहित्य को समृद्ध करने में विशेष योगदान रहा है।
हाल ही में ऋचा जैन, अंतरीपा मुकर्जी और आस्था देव ने ज़ूम कॉफ़ी हाउस की तंज पर कविता कैफ़े की द्विमासिक ओपन माइक के आयोजन लंदन में आरम्भ किया है। इस आयोजन में मुझे अनेक नए और युवा कवियों से परिचय के साथ उनके अंदर अच्छी संभावनाओं के संकेत भी मिल रहे हैं।
मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि इस नए दशक में भी ब्रिटेन के प्रवासी लेखक, विश्व के हिंदी साहित्य को समृद्ध ही नहीं करेंगे बल्कि साहित्य के इतिहास को गौरव प्रदान करेंगे।
