पिछली रोटी ( कविता ) : डॉ. शैलजा सक्सेना

उसने कभी नहीं दी
पिछली रोटी
अपने पति और बच्चों को,
….ख़ुद ली…!!

जब भूलने लगी अपना होना,
तो याद आया
माँ ने भी नहीं दी थी कभी उसे 
पिछली रोटी
कहती थी,

“भूलने लगते हैं खाने से इसे”
वह भी भूल रही थी अब
ठीक माँ की तरह 
…..अपना होना……….!!

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