मानकीकरण की अवधारणा और देवनागरी लिपि (आलेख) : डॉ. वरुण कुमार
“देवनागरी लिपि का मानकीकरण!” यह पदबंध ही कुछ अजीब नहीं लगता? लिपि का मानकीकरण!! लिपि के चिह्न और लेखन की प्रणाली तो हजारों साल में परम्परा से और विशाल प्रयोक्ता समाज द्वारा विकसित होते हैं। क्या उनका मानकीकरण कोई संस्था या व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह कर सकता है? और कर भी दे तो वह तथाकथित ‘मानक’ रूप अचानक से पूरे प्रयोक्ता समाज में प्रचलित या स्वीकार्य कैसे हो जाएगा? क्योंकि आखिर उसका प्रयोग तो समाज को ही करना होगा।
इन सबसे पहले एक बुनियादी सवाल उत्पन्न होता है – मानकीकरण क्या है? और इसके बाद आगे का सवाल – केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय या इसके पूर्व नागरी प्रचारिणी सभा, नागरी लिपि सुधार समिति, शिक्षा मंत्रालय की संस्थाओं आदि ने जो देवनागरी लिपि के मानकीकरण के प्रयास किए हैं उनमें क्या चीज की गई है, उनका क्या आशय है?
सबसे पहले प्रथम प्रश्न के बारे में बात करते हैं। किसी चीज को मानक करने से आशय है उसे कोई एक सर्वमान्य रूप देना। इसमें यह बात अंतर्निहित है कि किसी चीज के पहले से कई विकल्प प्रचलित हों और उनमें से किसी एक विकल्प को सर्वमान्य रूप दे दिया जाए और अन्य विकल्पों को अमान्य ठहरा दिया जाए। लिपि के संदर्भ में इसका मतलब होगा किसी लिपि चिह्न के एक से अधिक रूप प्रचलित रूप हों तो उसमें से एक चिह्न को सर्वमान्य मानक के रूप में अपना लिया जाए। देवनागरी में अ, झ, ण, ल को लिखने के कई रूप रहे हैं। मानकीकरण के तहत इनके किसी एक रूप को अपना लिया गया। एक ही चिह्न को सर्वमान्य बना देने से प्रयोग में एकरूपता और इस कारण सरलता भी आती है। मानकीकरण का एक उद्देश्य सटीकता का भी होता है। विज्ञान में दूरी और समय की इकाइयों का मानकीकरण सटीकता के लिए किया गया है, और उसे समय-समय पर बदला भी गया है। पहले दूरी की एक इकाई मीटर की परिभाषा थी उत्तरी ध्रुव से भूमध्य रेखा तक की दूरी का एक करोड़वाँ हिस्सा। बाद में अंतर्राष्ट्रीय भार एवं माप ब्यूरो ने ९०% प्लैटिनम और १०% इरिडियम से बनी मिश्रित एक मानक छड़ की लम्बाई को ‘मीटर’ माना। लेकिन ब्रह्माण्डीय पैमाने की आवश्यकता होने पर इसे भी बदला गया और प्रकाश, जिसकी गति पूरे ब्रह्माण्ड में एक समान रहती है, के द्वारा तय की जानेवाली दूरी पर आधारित पैमाने को अपनाया गया। आज मीटर की परिभाषा है – वह दूरी जो प्रकाश निर्वात में १/२९,९७,९२,४५८ सेकंड में तय करता है। इसी तरह पहले समय की इकाई सेकंड की परिभाषा थी – एक औसत सौर दिन का १/८६४००वाँ हिस्सा। लेकिन इसमें दिक्कत थी कि पृथ्वी का घूमना ही साल के ३६५ दिन एक सा नहीं रहता, उसमें थोड़ा परिवर्तन होता रहता है। इसलिए कोई अपरिवर्तनीय पैमाने की जरूरत थी। परमाणु घड़ी के आविष्कार के बाद परमाणु विकिरण के कम्पनांक पर आधारित नई परिभाषा अपनाई गई, जिसके अनुसार सीजियम-१३३ परमाणु की स्थिर अवस्था (ग्राउण्ड स्टेट) में अति सूक्ष्म स्तरों के बीच संक्रमण से निकलने वाले विकिरण के ९,१९,२६,३१,७७० आवर्तों की अवधि एक सेकंड है।
मानकीकरण में विज्ञान की आवश्यकताएँ भिन्न हैं। वहाँ उसका एकमात्र उद्देश्य सटीकता है ताकि सटीक गणनाएँ की जा सकें। भाषा को गणना नहीं, अर्थ-प्रेषण का कार्य करना होता है। विज्ञान के तथ्य कोई सामाजिक चीज नहीं होते। आप मानें या न मानें, समाज माने या न माने, सारी दुनिया माने या न माने इससे प्रकाश की गति को कई फर्क नहीं पड़ता। वैज्ञानिकों को प्रायः प्रचलित धारणाओं के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा है। गैलीलियो को यह कहने पर दंडित होना पड़ा कि पृथ्वी चपटी नहीं, गोल है। अपने देश में हैजा, चेचक आदि महामारियाँ किसी समय में देवी या भूत-प्रेत का कोप मानी जाती थीं। आज हम विज्ञान के प्रभाव से ऐसा नहीं मानते। इसके विपरीत भाषा सामाजिक चीज है। लिपि के चिह्न, लेखन-प्रणाली से लेकर शब्द, शब्दार्थ, संरचनाएँ आदि सभी सामाजिक हैं। वे समाज में पहले से ज्ञात और प्रचलित हैं, इसीलिए भाषा एक व्यक्ति से दूसरे तक संप्रेषण कर पाती है। शब्द कुछ ध्वनि प्रतीकों का संयोजन है लेकिन हर संयोजन शब्द नहीं होता। उदाहरण के लिए ‘क’, ‘ल’ औ ‘म’ इन तीन ध्वनियों के दो ही संयोजन अर्थवान हैं, इसलिए वे शब्द हैं – कलम और कमल। अन्य संयोजन मलक, मकल, लमक और लकम निरर्थक हैं, इसलिए शब्द नहीं हैं। उसी तरह लिपि में रेखाओं की कुछ विशिष्ट आकृतियाँ ही वर्ण की हैसियत रखती हैं। कोई भी आड़ी-तिरछी लकीर वर्ण चिह्न नहीं बन जा सकती। वर्णों के चिह्न और उनके संयोजन की प्रणाली परम्परा से विकसित-निर्मित होती हैं। इसलिए लिपि के मानकीकरण में सटीकता जैसी किसी चीज का नहीं, बल्कि प्रचलन का महत्व है।
तब, यह सहज ही समझा जा सकता है कि लिपि का मानकीकरण के कुछ प्रतिबंध हैं – उसमें कोई नया चिह्न नहीं लाया जा सकता, वर्णों और शब्दों के संयोजन की कोई नई पद्धति नहीं बनाई जा सकती। जो कुछ पूर्वप्रचलित है उसी में से किसी का ‘चयन’ मानकीकरण हेतु किया जा सकता है, किसी नए का ‘निर्माण’ नहीं किया जा सकता। नए की गुंजाइश कहीं है तो वह भाषा में आई किसी नई ध्वनि को निरूपित करने के लिए है। हिंदी में द्रविड़ भाषाओं के प्रभाव से आई नई ध्वनि को ‘ड़’ से व्यक्त किया जाता है। पारम्परिक देवनागरी वर्णमाला में यह चिह्न नहीं है। उसी तरह उर्दू की कुछ ध्वनियों को विशेष प्रयोजनों के लिए नुक्ता से व्यक्त करते हैं – क़, ग़, ज़, फ़ आदि। अंग्रेजी से आगत एक विशेष स्वर को अर्धचंद्र से व्यक्त करते हैं – कॉलेज, डॉक्टर आदि।
देवनागरी का मानकीकरण दरअसल लिपि चिह्नों का कम, वर्तनी का मानकीकरण अधिक है। यह शब्दों को लिखने के लिए वर्णों के प्रयोग का मानकीकरण है। किसी शब्द को किन लिपि चिह्नों (अर्थात् वर्णों) से और किस संयोजन से व्यक्त करेंगे — ‘गरमी’ लिखेंगे या ‘गर्मी’, ‘गए’ लिखेंगे या ‘गए’, ‘माँ’ लिखेंगे या ‘मां’, इसका निर्धारण वर्तनी के अंतर्गत होता है। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे हमेशा ध्यान में रखने की आवश्यकता है। एक ही लिपि में कई भाषाएँ लिखी जा सकती हैं लेकिन शब्दों का उच्चारण हर भाषा का अपना होता है और तदनुसार उन्हें लिखने का तरीका भी उस उस भाषा का अपना होता है। उदाहरण के लिए, हिंदी में टिकट लिखते हैं तो मराठी में टिकीट। इसलिए लिपि का मानकीकरण किसी न किसी भाषा के संदर्भ में ही होता है। सभी भाषाओं के लिए एक ही सर्वव्यापी मानकीकरण बेमानी कोशिश है। अभी हमने मराठी के उदाहरण में देखा, एक ही शब्द सभी भाषाओं में समान रूप से उच्चरित नहीं होता। अतः ‘देवनागरी लिपि का मानकीकरण’ कहना एक भ्रम पैदा करता है मानों वह कोई सर्वव्यापी मानकीकरण हो जिसे देवनागरी में लिखी जानेवाली सभी भाषाओं पर समान रूप से लागू किया जा सकता हो। सही कहना होगा – “हिंदी के संदर्भ में देवनागरी लिपि का मानकीकरण”, “मराठी के संदर्भ में देवनागरी लिपि का मानकीकरण”, “नेपाली के संदर्भ में देवनागरी लिपि का मानकीकरण” आदि। लिपि के मानकीकरण की बात करते ही भाषा का संदर्भ भी स्पष्ट कर देना उतना ही आवश्यक है।
दुर्भाग्य से नागरी लिपि के मानकीकरण में अधूरे शीर्षक ने इतना अधिक भ्रम फैलाया है कि लोग समझने लगे हैं कि वह अपने आप में सिर्फ देवनागरी लिपि का मानकीकरण है, और भाषा-निरपेक्ष है। भाषा की बात तब उठेगी जब वर्तनी की बात होगी। उस समय एक ही शब्द की अलग अलग भाषाओं में अलग मानक वर्तनी हो सकती है। यह एक मिथ्याभास है। किसी भाषा के पास अपनी कोई विशिष्ट ध्वनि भी हो सकती है जिसका दूसरी भाषा में प्रयोग न होता हो और उसको लिखने के लिए कोई विशिष्ट चिह्न का व्यवहार भी सिर्फ उसी भाषा में होता हो। मराठी में इसका एक उदाहरण उपलब्ध है – वहाँ ‘ळ’ चिह्न से एक विशेष ध्वनि व्यक्त होती है। यह ध्वनि हिंदी में नहीं है। इसलिए परम्परा से मराठी की मानक वर्णमाला में ‘ळ’ को स्थान मिला हुआ है, हिंदी की वर्णमाला में नहीं। नए चिह्न तभी लिए जा सकते हैं जब उसकी ध्वनि भी हिंदी में आ गई हो, जिसके कुछ उदाहरण मैंने ऊपर दिए हैं – कॉलेज, क़लाम, घोड़ा आदि। इसे किसी दूसरी भाषा और लिपि के उदाहरण से और स्पष्ट किया जा सकता है। अपने देश में रोमन संभवतः सर्वाधिक प्रयुक्त होनेवाली लिपि है। रोमन में अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पैनिश, जर्मन, रूसी आदि अनेक भाषाएँ लिखी जाती हैं। फ्रेंच भाषा रोमन A से लेकर Z तक के २६ लेटरों का ही प्रयोग करती है लेकिन उनके उच्चारण फ्रेंच के अपने होते हैं और अपने विशिष्ट उच्चारणों व बलाघातों को व्यक्त करने के लिए उन लेटरों में ही कुछ विशेष संकेतों की व्यवस्था करती है। फ्रेंच में E के अलग अलग उच्चारणों को व्यक्त करने के लिए é, è, ê और ë चिह्नों का सहारा लिया जाता है। इसी तरह A के अलग अलग रूप à और â से व्यक्त किए जाते हैं। उसी तरह O के लिए ô और ö चिह्न। इनका प्रयोग अंग्रेजी में नहीं होता। रूसी अल्फाबेट में रोमन लेटर आधी से भी कम संख्या में हैं, बाकी उसके अपने हैं। उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो रोमन चिह्नों के उल्टे रूप भी हैं। उदाहरण के लिए : А-а, Б-б, В-в, Г-г, Д-д,Е-е, Ё-ё, Ж-ж, З-з, И-и, Й-й, К-к इत्यादि। इसलिए रोमन लिपि का सभी भाषाओं के लिए एक सार्वभौम मानकीकरण नहीं किया जा सकता। लिपि का मानकीकरण जब भी होगा भाषा का संदर्भ उसमें आवश्यक होगा।
केंद्रीय हिन्दी निदेशालय ने अपनी मानकीकरण संबंधी पुस्तिका का नाम ठीक ही “देवनागरी लिपि एवं हिंदी वर्तनी का मानकीकरण” रखा है। फिर भी उसने हाल के संस्करण में एक परिवर्तन करते हुए ‘ळ’ को विशेष चिह्न के अंतर्गत स्थान दिया है। उपर्युक्त चर्चा के निष्कर्षों की रोशनी में देखें तो यह लिपि और भाषा के आपसी संबंधों की समझ में एक बुनियादी कमी का सूचक है। इस चिह्न को लाने के पीछे तर्क दिया गया हैं कि यह ध्वनि मराठी में एवं हिंदी की कुछ बोलियों, यथा हरियाणवी में प्रयुक्त होती है, इसलिए इसे हिंदी वर्णमाला में स्थान दिया जाना चाहिए। यह सब कुतर्क ठहरता है। भाषाई दृष्टि से खड़ी बोली (जिसे हम हिंदी कहते हैं) और मराठी और हरियाणवी सभी अपनी अपनी जगह बराबर हैं, कोई एक दूसरे का अधीनस्थ या अंतर्गत नहीं है। एक की ध्वनि या ध्वनिचिह्न को दूसरे पर थोपा नहीं जा सकता।
मानकीकरण के नाम पर देवनागरी लिपि में कई अवांछित हस्तक्षेप किये गए हैं। उसमें अंग्रेजी में प्रयुक्त होने वाले अंकों को ‘भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप’ कहकर देवनागरी अंकों से ऊपर स्थान दिया। लोगों में यही संदेश गया कि अंतर्राष्ट्रीय अंकों के प्रयोग को वरीयता देनी है, देवनागरी के अंकों को नहीं। लिहाजा देवनागरी के अंक अब कहीं भूले से ही दिखते हैं, अन्यथा उनका प्रयोग समाप्त ही है। उसी तरह मशीन पर टंकण की सुविधा के नाम पर अनुस्वार और चंद्रबिंदु के प्रयोगों में, पंचमाक्षर के संयोगों में मनमाने बदलाव किए गए। इसका परिणाम यह हुआ कि लेखन और मुद्रण से चंद्रबिंदु बाहर हो गया। नई पीढ़ी उसके प्रयोग से अनभिज्ञ हो गई। निदेशालय ने नए संस्करण में पुनः चंद्रबिंदु को बहाल किया है लेकिन अभी के न तो छात्र और न ही प्रेस के कम्पोजिटर चंद्रबिंदु का प्रयोग जानते हैं। इस बीच एक पूरा युग मुद्रण और लेखन में विकृति का शिकार हुआ। पंचमाक्षरों के संयोगों में भी भारी उलझनें पैदा हुईं और अभी भी बनी हुई हैं। निदेशालय ने संयुक्ताक्षरों के लेखन में भी अवांछित परिवर्तन किए। कई प्रतिष्ठित संस्थाओं, जैसे : भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता, नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी आदि ने उन परिवर्तनों को स्वीकार नहीं किया।
भाषा और लिपि हजारों वर्षों की परम्परा में निर्मित होते हैं। लिपि भाषा को संरक्षित और स्थायित्व देने का उपकरण है। जो सैकड़ों साल पहले लिखा गया वह आज भी पठनीय होना चाहिए और जो आज लिखा जा रहा है उसे भी सैकड़ों वर्षों बाद भी पठनीय होना चाहिए। यह नहीं कि तात्कालिक सुविधा के लिए मनमाने फेर-बदल कर दिए जाएँ। लिपि की एक पूरी स्वायत्त व्यवस्था है। उसमें कोई भी हस्तक्षेप बहुत ही जिम्मेदारी से, बहुत ही आवश्यक होने पर, और बहुत ही न्यूनतम किया जाना चाहिए। देवनागरी के मानकीकरण के प्रयासों में उसकी परम्परा रक्षा का दायित्व-बोध कम और अपना कुछ नया प्रदर्शित करने का भाव अधिक दिखता है।
