मानक देवनागरी में ‘ळ’ चिह्न को शामिल किया जाना (आलेख ) : डॉ. वरुण कुमार

ऊपर संलग्न पृष्ठ को देखें। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय ने देवनागरी लिपि के नवीनतम मानकीकरण में एक विशेष चिह्न शामिल किया है – ळ। इसका औचित्य उसी पृष्ठ में नीचे लिखा है। ळ के प्रयोग पर बल देने के लिए निदेशालय के तत्कालीन निदेशक, जो मराठी हैं, उन्होंने हिंदी में अपना नाम मराठी के रूप में लिखा है – सुनील बाबुराव कुळकर्णी। यही नहीं, इस नई पुस्तक में मलयालम भाषा को भी ‘मलयाळम’ लिखा गया है।
कुछ बुनियादी सवाल इससे उठ खड़े होते हैं –
१) हिंदी में ‘ळ’ का उच्चारण ही नहीं है, तो हिंदी लिखने में इस चिह्न का प्रयोग क्यों? जबरदस्ती उनसे लिखवा भी लेंगे लेकिन बुलवाएंगे कैसे? चलिए, मामला चूँकि लिपि के मानकीकरण का है तो लिपि की ही बात करूंगा। ळ के समर्थक तर्क देते हैं कि नामों को मूल रूप में ही लिखा जाना चाहिए। चूँकि हिंदी व मराठी दोनों की लिपि एक है इसलिए हमें कुलकर्णी नहीं, कुळकर्णी; लोकमान्य तिलक नहीं, लोकमान्य तिळक लिखना चाहिए। लेकिन मराठी में तो ‘टिळक’ लिखा जाता है। मराठी वाले केवल ल को बदलने की बात क्यों करते हैं? और तब हम ‘मलयाळम’ क्यों लिखें? हिंदी और मलयालम की तो लिपि भी एक नहीं है। अब क्या मराठी और दक्षिण के भाषी हिंदीवालों के पीछे लट्ठ लेकर पड़ेंगे कि ऐसे नहीं, ऐसे बोलो? हर भाषा दूसरी भाषा के शब्दों का अपने उच्चारण आदत के अनुसार अनुकूलन करती है। संस्कृत का भट्ट उर्दू और कश्मीरी में ‘बट’ हो गया। जैसे, मकबूल बट। अंग्रेजों ने तो ठाकुर को ‘टैगोर’ कर दिया। जाइये, मारिए उनको इंग्लैण्ड-अमरीका जाकर!
२) ळ बोलने वालों की तरफ से यह भी तर्क दिया जाता है कि हिंदी ने कई विदेशी ध्वनियों को व्यक्त करने के लिए नए लिपि चिह्न अपनाए हैं — कॉलेज, नॉलेज (अंगरेजी से), घोड़ा, पेड़ (द्रविड़ भाषाओं से)। तो ‘ळ’ क्यों नहीं अपना सकती? लेकिन बात भावना की नहीं, भाषा के यथार्थ की है। किसी भाषा की लिपि उन्हीं ध्वनियों को निरूपित करती है जिनका उस भाषा में प्रयोग होता है। जिन विदेशी ध्वनियों के मैंने उदाहरण दिए (कॉलेज, पेड़ आदि) वे हिंदी में आ चुकी हैं, उच्चरित होती हैं और अर्थ-भेदक बन चुकी हैं। माल और मॉल दोनों अलग अर्थ रखते हैं। ‘पेड़’ संज्ञा है जबकि ‘पेर’ क्रिया। ळ की ध्वनि तो हिंदी में आई ही नहीं। आ जाती और अर्थ-भेदक हो चुकी होती तो ळ को अपनाना उचित होता।
अगर इस चिह्न को हिंदीतर भाषाओं के लिए निर्मित ‘परिवर्धित देवनागरी’ में रखा गया होता तो कोई बात नहीं थी, क्योंकि उसका उद्देश्य ही हिंदीतर ध्वनियों को निरूपित करना है। लेकिन इसे तो हिंदी के लिए निर्मित मूल वर्णमाला में ही स्थान दे दिया गया – विशेष चिह्न कहकर।
यह तो हिंदी के साथ जबरदस्ती है। आश्चर्य है कि विद्वानों की एक मंडली ने यह निर्णय लिया। इससे भ्रम की स्थितियाँ बन रही हैं। हिंदी शिक्षण की कक्षाओं में लोग पूछने लगे हैं कि ‘ळ’ का प्रयोग कहाँ कहाँ किया जाएगा। क्या उन्हें अब दूसरी भाषाओं के शब्द सिखाएंगे? शब्दकोष निर्माण में जो समस्या आएगी, सो अलग। लोग जिस परम्परा से ‘तिलक’ बोलते-लिखते-पढ़ते रहे हैं, उसमें तिळक की घुसपैठ अनावश्यक उलझन नहीं पैदा करेगी?
मेरा अनुमान है कि हिंदी लिखने-पढ़नेवाला आम प्रयोक्ता और हिंदी के महत्वपूर्ण प्रकाशन व संस्थान इसका बहिष्कार करेंगे, और वह सही होगा। लेकिन एनसीईआरटी जैसे सरकारी प्रकाशनों से यह प्रदूषण फैलेगा, उसी तरह जैसे द्विवेदी की जगह ‘दविवेदी’ लिखा जाने लगा था।
हिंदी देश की सबसे बड़ी भाषा है। अस्मिता, क्षेत्र, वर्ग आदि के आग्रहों और स्पर्धा के मौजूदा समय में अन्य भाषाएंँ इस पर तरह-तरह के दबाव बनाती हैं। हिंदी की लिपि में यह परिवर्तन उसी का एक परिणाम है। सभी सजग लोगोंं को इसका विरोध करना चाहिए। केंद्रीय हिंदी निदेशालय को पत्र लिखकर।
