दोहे : विनयशील चतुर्वेदी
सहज सरल सुंदर सुखद, कविता ज्ञान निकुंज ।
बरबस मन मधुकर विमल, मोहित अक्षर पुंज ।।
हृदय विवेक वीहीन कवि, बिहरेंं काव्याकाश ।
रजत रेख घन दामिनी, ज्यों क्षण करत प्रकाश ।।
बाहर सब उन्जियार है, भीतर बस अंधियार ।
तन का दीवा पलट दे, मन की बाती बार ।।
रात औ दिन रटते रहे, अंधियारे के बोल । जीवन जाग्रत स्वप्न है, आंखें भी तो खोल ।।
नीच ना छोड़े नीचता, दंश न छोड़े सांप । दोनों को ही साधिए, दो गज दूरी नाप ।।
