विष्णु प्रभाकर जी के जन्म दिवस विशेष : डॉक्टर सविता चड्ढा


एक बहुत ही महत्वपूर्ण शख्सियत, सुप्रसिद्ध साहित्यकार, मेरे परम आदरणीय और बहुत ही प्रिय यायावर साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी का जन्मदिन भी 21 जून को होता है।
मुझे याद है हर वर्ष 21 जून को मैं विष्णु प्रभाकर जी के निवास पर उन्हें मिलने जाया करती थी। बहुत पहले जब अजमेरी गेट में कुंडे वालान में रहते थे तब भी और जब वह मेरे निवास रानी बाग के पास पीतमपुरा में रहने आ गए तब भी। जब मेरा जन्मदिन हुआ करता था तब भी मैं सबसे पहले विष्णु प्रभाकर जी को फोन करके कहती थी कि मुझे आपकी शुभकामनाएं आशीर्वाद चाहिए और वह मुस्कुरा कर मुझे बहुत-बहुत शुभकामनाएं देते थे। मेरी कई पुस्तकों के लोकार्पण पर वह उपस्थित रहे। बाद में तो मेरी कई किताबों का लोकार्पण उनके पीतमपुरा वाले निवास में भी हुआ। इस चित्र में तो बहुत कम लोग हैं लेकिन मुझे याद है इस कार्यक्रम में अनीता वर्मा जी भी थी, जगदीश चतुर्वेदी जी थे, मुरारी लाल त्यागी जी थे, साहित्यकार श्रवण कुमार जी थे, विमला गोगना जी थी, सुभाष चड्ढा जी भी थे।
मुझे याद है उन्होंने कई पत्र भी मुझे मेरी पुस्तकों पर अपने आशीर्वचन के रूप में लिखे हैं जो आज भी मेरे पास सुरक्षित है।
आज जब मैं विष्णु प्रभाकर जी को याद कर रही हूं तो मुझे याद आता है मैं जब भी विष्णु जी के घर गई हूं अतुल प्रभाकर जी और उनकी बहू सदैव घर आए अतिथियों के स्वागत सत्कार में रहे हैं। मुझे याद है एक बार मैंने विष्णु प्रभाकर जी को अपने पंजाब नेशनल बैंक में आमंत्रित किया था उस बोर्ड रूम में जहां हमारे वरिष्ठ अधिकारियों की बैठकें हुआ करती थी। उस दिन बोर्ड रूम में हमारे बैंक के कई कर्मचारी कई वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे और उनके आने के बाद हमारे बैंक में एक बड़ा महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ था। जो लोग 40 वर्ष से कम उम्र की आयु के लोग थे और कभी भी सीढ़ियों का उपयोग नहीं करते थे वह विष्णु प्रभाकर जी जो अपनी आयु के 85 वर्ष से अधिक होने पर भी अभी तंदुरुस्त और युवकों की भांति चलकर मेरे कार्यालय में आए थे, लोगों ने सीढ़ियों का उपयोग शुरू कर दिया था। लेखक एक नायक भी होता है, एक ऐसा नायक जो अपनी उपस्थिति से, अपने व्यवहार से,अपने लेखन से समाज को एक नई दिशा दे जाता है। विष्णु जी को मैंने उस दिन एक ऐसे ही नायक के रूप में पाया।
एक और वाक्या आपके सामने रखने की इच्छा है। एक बार पीतमपुरा के निवास में जब मैं उन्हें मिलने गई तो वह मुझे अपने घर के बाहर तक छोड़ने आए थे और तब पीछे से अनुराधा जी आई और उन्होंने उनके हाथ में एक छड़ी दे दी जिसका सहारा लेकर वह बाहर तक आ सकते थे। मैंने महसूस किया उन्होंने अनुराधा जी के हाथ से वह छड़ी तो ले ली लेकिन उस छड़ी को जमीन पर नहीं छुआया। वह उस छड़ी को उठाये मेरे साथ चलते रहे और पूरी गली पार कर गए। गली के अंत में एक मंदिर हुआ करता था आज भी है वहां मंदिर के पास एक आइसक्रीम की रेहड़ी खड़ी हुई थी, मैं उनसे हंसकर पूछा विष्णु जी आइसक्रीम खाएंगे क्या तो उन्होंने हंस कर स्वीकृति दी थी। क्योंकि चलते-चलते हुए अपने घर से वे काफी दूर तक आ गए थे तब मैंने उनसे कहा कि अब मैं आपके घर तक छोड़ कर आता हूं तो वह हंस पड़े.. “तो फिर मैं तुम्हें वापस यहां तक छोड़ने आऊंगा….. अब तुम अपने घर जाओ मैं धीरे-धीरे चलकर चला जाऊंगा….” तब शायद उनकी आयु 90 वर्ष से तो अधिक हो चुकी थी लेकिन उनकी जिजीविशा, जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण और आत्मनिर्भरता में कहीं कोई कमी नहीं थी।
जीवन में हम लोग कितने भी आत्मनिर्भर हो जाए लेकिन आयु की एक सीमा तो होती है। उनकी पोती की शादी में जब हम लोग सब शामिल हुए थे तो मैंने देखा था विष्णु जी उन दिनों बहुत बीमार थे और उन्हें वही बैंक्विट हॉल में लाया गया था।
उस दिन विष्णु प्रभाकर जी को इस असहाय स्थिति में देखकर मन बहुत कष्ट में आया था पर हम लोग कुछ कर नहीं सकते। वृद्धावस्था…. आयु का बड़े होना और फिर धीरे-धीरे हमें प्रभु सत्ता में लीन तो होना ही है। उस दिन विष्णु जी के चेहरे पर एक आत्मिक शांति थी। उन्होंने जीवन में बहुत अधिक सम्मान और प्यार प्राप्त किया था। बहुत सारे साहित्यकार इस विवाह स्थल पर उपस्थित थे, सब उन्हें देख रहे थे लेकिन हम उनकी कोई सहायता उस समय नहीं कर सकते थे।
फिर मुझे अंतिम दिवस की बात भी याद है जब हमें पता चला कि विष्णु प्रभाकर जी अब नहीं रहे तो मैं उनके पीतमपुरा निवास वाले घर में गई थी। मैं काफी देर तक उनके शरीर के पास बैठी रही फिर मैंने किसी को बात करते सुना कोई…. कह रहा था कि ‘ विष्णु जी ने अपनी देहदान किया हुआ था इसलिए अभी देहदान वालों की गाड़ी आएगी और उनके शरीर को लेकर चली जाएगी ‘ यह मेरे लिए बहुत ही हैरान कर देने वाली बात थी लेकिन विष्णु जी के परिवार ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान किया।
पता नहीं क्यों मैं उसे गाड़ी के आने तक प्रतीक्षा नहीं कर सकी यह मेरे लिए थोड़ा कष्टदायी समय था। मैं विष्णु जी अकेले ही आगे की यात्रा के लिए उनके निवास में छोड़कर आ गई थी। आज भी विष्णु जी लगता है कहीं गए तो नहीं, हमारी यादों में आज भी हैं और संभवत हमेशा रहेंगे।
