जब प्रसाद जी से मिलने पहुंचे प्रेमचंद और जैनेंद्र (संस्मरण) : जैनेंद्र

सन् 1933 की बात है। भाई सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने कुछ कविताएं अपनी छापनी चाहीं। जेल से उन्होंने लिखा कि क्या आप यह संभव कर सकते हैं कि प्रसाद जी प्रस्तावना के दो शब्द लिख दें। बनारस जाना हुआ तो हम – मैं (जैनेंद्र) और प्रेमचंद विधिवत प्रसाद के यहां पहुंचे। विधिवत से आशय की मिले सवेरे चक्कर पर भी थे पर प्रयोजन की बात के लिए अलग से जाना उचित था। मैंने ‘भग्नदूत’ की लिपि सामने की, कहा कि मुद्दई जेल में है, खुद अपना मामला सामने नहीं रख सकते, इससे मेरी बात का दुगना वजन समझें। पहले पूछा, “कौन हैं?” मैंने कह दिया कि मैं आया हूं। कह रहा हूं, इसी से जान लीजिए। थोड़ी देर चुप रहें। बोले, “तुम कुछ चाहोगे, यह मैंने नहीं सोचा था, पर तुमने भी ना सोचा होगा कि तुम कहोगे और प्रसाद न कर पाएगा, पर विनोदशंकर व्यास को तो जानते हो, कितना निकट है? कभी मैंने उसके लिए भी कुछ लिखकर नहीं दे सका हूं। अब तुम ही बताओ?” मैंने कहा, “मुझसे ना पूछिए, क्योंकि मेरा बताना एकदम आसान है। लीजिए बताता हूं कि लिखना मान लीजिए और कुछ नहीं तो कारण यही कि अज्ञेय आप के लिए अज्ञात है, जेल में हैं।”
प्रसाद ने मुझे देखा। आधे मिनट मुंह नहीं खोला पर आंखें उनकी विवशता प्रकट कर रही थीं। आखिर बोले, “जैनेंद्र?”
आगे न कह पाए और चुप रह गए। मैंने झेप की हंसी हंसकर पांडुलिपि अपनी ओर खींची और कहा कि कहिए, कोरा तो आपके यहां से कभी कोई गया नहीं, कुछ आ रहा है।
जलपान के आने की आशा हो चुकी ही थी। व्यस्ततापूर्वक उठे कि तश्तरीयां आ उपस्थित हुई। इधर उधर की गपशप और हंसी मजाक होती रही। आखिर कह उठे।
प्रसाद ने उठते हुए कहा, “कहोगे तो तुम जैनेंद्र कि एक बात तो तुमने कही और प्रसाद ने वह भी न रखी।”
“क्यों साहब,” मैंने कहा, “यह कहना भी अब मुझसे से छीन लेंगे आप? एक तो आपने बात रखी नहीं, फिर हम कह भी ना पाएं कि नहीं रखी। कहिए प्रेमचंद जी, यह अन्याय सहा जाय और अपनी वाक्-स्वतंत्रता को छीन जाने दिया जाए।”
प्रेमचंद ने ठहाका लगाया, उसमें प्रसाद भी शामिल हुए। देखा कि उनके हास्य में कुछ नहीं है।
हम चले आए। प्रेमचंद ने गली में कहा कि तुमने बदला ले ही लिया। मैंने कहा कि बदला पहुंचा कहां? वह तो ज्यों का त्यों मुझ पर लौट आया। प्रसाद को उसने छुआ कहाँ ? प्रेमचंद ने कहा, “बात ठीक है, खूब आदमी हैं प्रसाद।”
समझ गया कि प्रसाद और प्रेमचंद में बनती नहीं हैं। पर प्रेमचंद के शव-दाह से लौटे तो देखा गया कि हम वहां तीन ही हैं। शिवरानी जी हर ढारस के लिए प्रसाद को देखती हैं और मुझे भी वही सांत्वना बना है। इस मृत्यु के बाद अपनी मृत्यु पास बुलाने में उन्होंने एक वर्ष भी नहीं लगाया। कौन जानता था…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »