गुल्लो रानी : अरुणा सब्बरवाल
पतझड का आगमन आरम्भ हो चुका था। वृक्षों से गिरते पत्ते हवा में अपना नृत्य दिखा रहे थे। पूरी धरा पर लाल, पीले, नारंगी और भूरे पत्तों का क़ालीन बिछा था। पेड़ भी नीरवस्त्र खड़े शरमाँ रहे थे। लंदन में पतझड़ के समय प्रकृति का नज़ारा ही कुछ ओर होता है। मैं भी अपने पै.टी.ओ में कुर्सी डाल कर प्रकृति की लीलाओं का आनंद लेने लगी ।
मेरे उद्यान में एक बड़े-बड़े पत्तों वाला हॉर्स चेस्टनट का पेड़ है, सर्दियों में बहुत से जीव जंतु उस पेड़ से चेस्टनट एकत्र करने आते है। और छोटे – छोटे कीटाणु उसके बड़े – बड़े पत्तों की छत्र-छाया में ठंड से बचने के लिये छुप जाते हैं।
अचानक मैंने देखा एक सफ़ेद धरियों वाली गोल-मोल सलेटि गिलहरी बड़ी चौकन्नी सी इधर – उधर देखते फुदकती आ रही थी। एकांत पा कर वह अपने आगे के पैरों में दबोचे चेस्टनट को टुकर – टुकर खाने लगी। अचानक उसकी नज़र पृथ्वी पर पड़े दो और चेस्टनट पड़े थे। थोड़ी देर सोचने के पश्चात् गुल्लो रानी ने उन दोनो चेस्टनट को समेटा। निरीक्षण करने के पश्चात् फुदक – फुदक कर उसने धरती पर एक नरम सी जगह ढूँढ कर अपने आगे के पंजों से एक गढा खोदा, एक – एक कर के उसमें चेस्टनट उस गड्ढ़े में डाले फिर उसे मिट्टी से ढक दिया। कुछ देर सोचने के पश्चात्, इधर – उधर देख कर वह निशानी के रूप में दो बड़े – बड़े पत्तों से ढक कर कर चली गयी।
इतने में तेज़ हवा का झोंका उसकी निशानी को उड़ा कर ले गया। दस मिनट बाद वह अपने साथी के साथ आ कर इधर – उधर पागल सी उस निशानी को ढूँढने लगी।
काश वह जानती प्रकृति की विषमता …….।
