कविता-विमर्श में ऋचा जैन की कविताएँ ‘फ़ोन पर माँ’ और ‘मैं राधा ही तो हूँ’

लंदन की ऋचा जैन की कविताओं को पढ़ते हुए आप अनुभूत कर सकते हैं कि वैश्विक कविताएँ पढ़ रहे हैं। इन कविताओं के संदर्भ भारतीय हैं लेकिन इनकी बुनावट वैश्विक हैं। ये कविताएँ शोर नहीं करती, बहुत धीरे- धीरे गहरे उतरती हैं और आपको लगने लगता है कि ये कविताएँ आपके भीतर समा गई हैं।

फ़ोन पर माँ

असाध्य रोग से जूझती अपनी बेटी की सेवा करते
वर्षों से घायल
माँ
आयु से पस्त
बियानवे वर्ष की माँ के
‘अब बहुत हुआ,
मुक्ति कैसे’—जैसे
प्रश्नों से तहस-नहस
माँ
विधि के विधान पर घोर आश्चर्य जताती है
युद्ध के दिनों में तो हर रोज़, एक रोज़ में कई बार
हिदायत देती है मुझे
खजूर और भाड़ के भुने चने रखने की
हफ़्ते भर के लंबे ट्रेक पर ये ज़रूर होने चाहिए
पिता के ऊँचा सुनने और एक ही बात को बार-बार दोहराने से उपजी
अपनी पुरानी व्यथा शीघ्रता से सुनाते हुए
बाग़ में काम करते माली को हल्दी उखाड़ने की हिदायत देती है
फिर अगले ही क्षण घर की 7 साल बाद होने वाली
पुताई की अपरिहार्यता मुझे समझाते हुए
अपने पंजों की नसों में आयी सूजन का हल्का-सा ज़िक्र करती है
‘चिड़िया अपना घर समझ कर घर में आती है।’
मुनि क्षमासागर की यह पंक्ति मुझे सुनाती है
कहती है, उन्हें ज़रूर पढ़ना तभी बहन के कराहने की आवाज़ पर
पूछती है — और, हो गई बात!
मैं कहती हूँ, हाँ। कल फ़ोन करती हूँ।


मैं राधा ही तो हूँ

यूँ गलबहियाँ डाले रहोगी तो तान कैसे लूँगा राधा
नहीं पता कान्हा
पर तान के संग तुम्हारे हृदय के कम्पन और श्वासों की आवाजाही
न गयी मेरे कानों में
तो वो तान अधूरी है मेरे लिए
कृष्ण ने राधा को अपने और समीप खींचा
अंकपाश कसा
साँसें भरीं और छोड़ दीं बंसी में
दिशाएँ मोहिनी से बँध गयीं
तभी धरा पर एक कदम्ब का फूल गिरा
उसके कम्पन से जमुना के जल में हलचल हुई
उस हलचल में काल बीत गये
जल वाष्प हुआ और फिर वर्षा
वर्षा — जल और फिर वाष्प
जल बस अभी-अभी बदला था
बाड़े के बड़े घर के छप्पर से झरती उरबतियों में
किवाड़ से टिकी बाइक से टपकी पेट्रोल की बूंद
डामर के पथ पर इंद्रधनुष बना रही थी
सौंधाई-सी वायु मंद-मंद अचल
माउथ-ऑर्गन अब भी कान्हा के अधरों पर था
दिशाएँ अब भी स्थिर—प्रेमपाश में जकड़ी हुईं
उसने एक क्षण को आँखें खोलीं
जैसे तथागत खोलते हैं ज्ञानोदय के बाद
कान्हा को निर्निमेष निहारा
और फिर लीन हो गयी
‘मैं राधा ही तो हूँ’ इस बोध के साथ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »