युवा लेखन विशेष विमर्श में दीप्ति शर्मा की कविताएँ
तीनों कविताएँ ‘आज़माइश’, ‘बदलते रंगों में’ और ‘पिता’ जीवन, प्रेम और पारिवारिक संवेदना के विविध पक्षों को मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। ‘आज़माइश’ में जीवन के उतार-चढ़ाव, रिश्तों की परीक्षा और उजाले-अँधेरे के प्रतीकों के माध्यम से मानवीय संघर्ष को प्रस्तुत किया गया है। ‘बदलते रंगों में’ प्रेम की स्थिरता, उसकी गहराई और उसके इंद्रधनुषी विस्तार को सुंदर बिंबों के माध्यम से व्यक्त करती है। वहीं ‘पिता’ कविता में पिता के त्याग, संघर्ष, सहनशीलता और निस्सीम प्रेम के प्रति बेटी की भावपूर्ण कृतज्ञता दिखाई देती है। तीनों कविताओं की विशेषता सरल भाषा, सहज भावाभिव्यक्ति और प्रभावशाली प्रतीक-बिंबों में निहित है। : प्रखर शर्मा
परिचय : दीप्ति शर्मा दिल्ली की निवासी हैं और वर्तमान में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली में हिंदी विषय में शोधरत हैं। हिंदी साहित्य के अध्ययन और शोध के क्षेत्र में उनकी विशेष रुचि है।

आज़माइश
आजमाना न था साथी
जीवन की आज़माइश में
ज़िंदगी को तौलता तराज़ू
सूरज बना,
तुम कंधे पर बैठ उसके
थामने लगे दुनिया,
पकड़ने लगे पीलापन।
मुट्ठी बंद करते ही
अँधेरा हो गया।
पीलापन छूटा तो
आज़माया तुमने
रिश्तों की गहराइयों को।
अँधेरा हुआ तो
कंधा छूट गया,
परछाई का साथ मिला।
अब क्या?
सूरज के कंधे की सवारी
चश्मे के लेंस में दिख रही।
तुम आज़माते रहे,
ज़िंदगी नाचती रही,
उजाला अँधेरा हुआ।
आँखों का चश्मा
ज़िंदगी की रोशनी ले
डूब गया अंततः।
बदलते रंगों में
तुम्हारे चाहने से
रंग नहीं बदलते,
प्रेम नहीं बदलता।
ख़ून लाल ही रहता है
और आसमान नीला।
जैसे प्रेम बढ़ता है,
ख़ून अधिक लाल हो जाता,
आसमान अधिक नीला।
बढ़ते रंगों में
हम-तुम एक से हो गए।
देखो!
प्रेम हमारा इंद्रधनुष बन रहा,
बरस रहा,
अब धरती सुनहरी हो चली है।
पिता
पिता,
मेरी धमनियों में दौड़ता रक्त
और तुम्हारी रिक्तता
महसूस करती हूँ मैं।
चेहरे की रंगत का तुम-सा होना
सुकून भर देता है मुझमें।
मैं हूँ, पर तुम-सी
दिखती तो हूँ, ख़ैर,
हर ख़ूबी तुम्हारी पा नहीं सकी।
पिता,
सहनशीलता तुम्हारी,
गलतियों के बावजूद माफ़ करने की,
साथ चलने की,
सब जानते हुए चुप रहने की—
मुझे नहीं मिली।
मैं मुँहफट हूँ कुछ, तुम-सी नहीं,
पर होना चाहती हूँ
सहनशील।
तुम्हारे कर्तव्यों-सी निष्ठावान
बन जाऊँ एक रोज़।
पिता,
महसूस करती हूँ
मुरझाए चेहरे के पीछे का दर्द,
तेज़ चुभती रोशनी में काम करते हाथ।
कौन कहता है पिता मेहनती नहीं होते?
उनकी भी बिवाइयों में दरारें होती हैं।
चेहरे पर झुर्रियाँ,
कलेजे में अनगिनत दर्द समेटे,
आँखों में आँसू छिपाए,
प्यार का अथाह सागर
होता है पिता।
तुम
सागर हो,
आकाश हो,
रक्त हो,
बीज हो,
मुझमें हो।
बस, और क्या चाहिए,
पिता,
जो मैं हू-ब-हू
तुम-सी हो जाऊँ।
