दिन विशेष विमर्श : सोमा बंद्योपाध्याय द्वारा सुनील गंगोपाध्याय की रचना का अनुवाद

पौराणिक सन्दर्भ से नोआ की नाव का बिम्ब लेते हुए कवि बारिश की रात और ऐसे ही तूफ़ान में अपने जन्म को याद करते हुए बचपन में खो जाता हैI कविता वर्तमान और भूतकाल का एक अनोखा आख्यान प्रस्तुत करती है – मनोज अबोध

परिचय : बाबा साहेब अंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी, कोलकाता की पूर्व कुलपति और कलकत्ता यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और गवर्नर की नॉमिनी सोमा बंद्योपाध्याय एक प्रतिष्ठित बहुभाषी लेखिका, अनुवादक और ख्यातिप्राप्त शिक्षाविद् के रूप में जानी जाती हैं । अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित सोमा जी की 56 मौलिक और अनुदित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।

বৃষ্টির রাতে : সুনীল গঙ্গোপাধ্যায়

বৃষ্টি কি কখনো কারুর কাছে পুরোনো হয়ে যায়

নোয়ার নৌকো তো আর দ্বিতীয়বার ভাসেনি

খুব ঝড় বদলের রাতে আমার জন্ম, মাতৃগর্ভে থেকেও
সেই শব্দ শুনেছি
নদী লাফ দিয়ে উঠেছিল, জিভ বাড়িয়েছিল উঠোনের আঁতুরঘরে

সেই দুঃখ স্মৃতি নিয়ে মা- মাসিরা এখনও হাসাহাসি করে
যদিও সে বাড়িও নেই, নদীও হারিয়ে গেছে
তবু ঘুমের মধ্যে আমি গাছের মতন আকাশের দিকে চেয়ে
থাকি ।

হঠাৎ ডেকে ওঠে সুপুরুষ অভিনেতার মতন মেঘ
ঝমঝম করে বেজে ওঠে বাল্যকাল, বারবার খুলে যায় জানালা
মুখে এসে ঝাপটা লাগে, দেখতে পাই নির্জন রাস্তায় হেঁটে যাচ্ছে একটি মাত্র দুঃখী মানুষ
সামান্য পা টেনে টেনে হাঁটছে, ভ্রুক্ষেপ নেই বৃষ্টিতে

কোনোদিন আগে তাকে দেখিনি, মুখটা তবু এত চেনা
ঠিক এইরকমভাবে পথের মোড়ে মিলিয়ে গিয়েছিলেন আমার বাবা ।

बारिश की रात : प्रो.सोमा बंद्योपाध्याय

बारिश क्या कभी किसी के लिए पुरानी हो जाती है
नोआ की नाव भी तो कभी दूसरी बार नहीं तैरी थी ?

एक बड़ी तूफानी रात में, मैंने जन्म लिया था,
मां के गर्भ में ही सुना था मैंने उसका गर्जन
नदी कूद कर आयी थी आंगन के भीतर जनानेखाने में ,
उसकी दुखभरी स्मृति को लेकर आज भी ठिठोली करती हैं मेरी मां और मौसी
जबकि आज न तो वह घर है और न वो नदी
फिर भी नींद में मैं किसी वृक्ष-सा आसमान की ओर देखता रहता हूं।

अचानक गरज उठता है बादल किसी सुदर्शन अभिनेता की तरह।
झमाझम बरसता है जैसे बचपन, बार-बार खुल जाती है खिड़की
चेहरे पर मारती हैं छींटे, देखता हूं निर्जन रास्ते पर पैदल चला जा रहा है
केवल एक दुःखी मनुष्य
पांव जैसे खींच खींच कर चल रहा है,
बारिश का जैसे कोई असर ही नहीं उस पर ।
पहले कभी देखा नहीं था उसे, फिर भी वह चेहरा इतना जाना- पहचाना
ठीक इसी तरह राह के किसी मोड़ पर गुम हो गए थे मेरे बाबा !

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate This Website »