स्मृति के चलचित्र…गंगोत्री से गोमुख ग्लेशियर तक : डॉ. संजय अनंत

स्मृति के चलचित्र…गंगोत्री से गोमुख ग्लेशियर तक, रोचक यात्रा संस्मरण प्रिय योगेश्वर के साथ
मित्रो, ये तस्वीरें सन् 1986 की हैं, यानी 39 साल पुरानी। गंगोत्री से गोमुख तक की इस यात्रा के समय मेरी आयु केवल 16 वर्ष थी। ये रंगीन फोटो लेने वाला, उस समय के हिसाब से उन्नत तकनीक वाला जापान निर्मित कैमरा भी हमारा नहीं था। हमें यह कैमरा डॉ. सुनील वर्मा (मुन्नू भैया) ने दिया था। वे नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से दक्ष, एक सफल पर्वतारोही हैं और उन्होंने ही हमें इस यात्रा के लिए प्रोत्साहित किया था।
उस समय इस यात्रा पर बहुत कम लोग जाते थे। कारण यह था कि गंगोत्री से गोमुख ग्लेशियर के बीच रास्ता अत्यंत कठिन था और रात्रि विश्राम की कोई व्यवस्था नहीं थी। इस यात्रा में मैं और मेरे अभिन्न मित्र योगेश्वर थे। दरअसल, घर में हमने केवल इतना बताया था कि हम ऋषिकेश-हरिद्वार घूमने जा रहे हैं। यदि सच बताते, तो हम दोनों को ही घर से इस यात्रा की अनुमति नहीं मिलती।
एक स्थानीय गाइड हमारे साथ था। मेरे हाथ में जो स्टिक है (फोटो में), वह नीचे की ओर नुकीली है और उस पर धातु की परत चढ़ी है। यह गाइड द्वारा दी गई थी, बर्फ पर फिसलने से बचने के लिए। चीड़वासा, भोजवासा होते हुए गोमुख ग्लेशियर और आगे नंदनवन तक का मार्ग बहुत कठिन था। रास्ते में, विशेषकर चीड़वासा में, बहुत सावधानी रखनी पड़ती थी। एक ओर आपको रास्ते पर चलना है और दूसरी ओर ऊपर पहाड़ से गिरते बड़े-बड़े पत्थरों और चट्टानों पर भी ध्यान देना है।
जब हम सुबह 7 बजे शुरू की हुई यात्रा में चलते-चलते दोपहर 2 बजे के आसपास श्री गंगा जी के मूल उद्गम, गोमुख पहुँचे, तो सारी थकान दूर हो गई। आँखों के सामने बहुत ही सुंदर, अद्भुत दृश्य था – खुले नयन, साहिब को देखूँ…
वहाँ हमें इज़रायल से आया एक यहूदी दंपति मिला। वे सक्षम थे, उनके पास रुकने के लिए टेंट आदि की पूरी व्यवस्था थी, किंतु हमारे रुकने की कोई सुविधा नहीं थी। हमें बताया गया था कि वापस लौटते समय एक बाबा जी का आश्रम मिलेगा, वहीं रात बितानी होगी। लकड़ी से बना आश्रम, मंदिर और साथ में कुछ कमरे, रोशनी के लिए लालटेन।
पर बाबा जी निश्चित ही मानव-सेवा पर विश्वास रखने वाले सिद्ध पुरुष थे। उनके इस ठिकाने पर कोई शुल्क नहीं था। यात्री अपनी श्रद्धा से जो दे दे, वही बहुत था। खाने के लिए गरम-गरम खिचड़ी और उस असहनीय ठंड से बचने के लिए एक कंबल, वह भी निःशुल्क।
संध्या 6 बजे के बाद प्रकृति वहाँ मानो आपके लिए अनोखे दृश्य प्रस्तुत करती है। वह सूर्यास्त अद्भुत होता है। चारों ओर बर्फ से ढकी चोटियाँ और सूर्य की किरणों के परावर्तन से आकाश में अद्भुत दृश्य बनता है। पहाड़ का रंग थोड़ी-थोड़ी देर में बदलता है। हम दोनों आश्रम की खिड़की से यह अद्भुत नज़ारा देख रहे थे। जब सूर्य की रोशनी बर्फीले पहाड़ों पर पड़ती है, तो परावर्तन के कारण उसकी आभा बदल जाती है। शाम होते-होते बर्फीले पहाड़ कभी गुलाबी, तो कभी सुनहरे नज़र आते हैं और रात्रि का दृश्य तो और भी अद्भुत। उसका वर्णन शब्दों में संभव नहीं।
फिर सुबह, आश्रम के मंदिर में प्रणाम कर हम वापस गंगोत्री लौट आए।
अब वहाँ क्या व्यवस्था है, पता नहीं, किंतु 1986 में जो कठिन यात्रा हमने की, अब पुनः उस यात्रा पर जाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। बड़ा सीधा-सरल जमाना था साहब। मिनरल वाटर क्या होता है, तब पता ही नहीं था। बस ट्रेन में जगह मिल जाए, कोई पहले से बुकिंग नहीं। जो ठिकाना मिला, वहीं रुक गए। मोबाइल नहीं था। मेरे घर में उन दिनों टेलीफोन लग गया था, तो हरिद्वार-ऋषिकेश से एक-दो बार कॉल किया, वो भी कुछ सेकंड का, क्योंकि पैसे बचाने होते थे।
जब वापस लौटे और बताया कि गंगोत्री ही नहीं, गोमुख तक हो आए हैं, तो बहुत डाँट पड़ी – बिना बताए कैसे चले गए, इत्यादि-इत्यादि।
