दिन विशेष युवा लेखन विमर्श में उद्भव शांडिल्य की कविताएँ
इन रचनाओं में संस्कृतनिष्ठ तत्सम शब्दावली, एक लयबद्ध प्रवाह और गंभीर दार्शनिक चिंतन प्रमुखता से दिखाई देता है। कवि का आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पण गहरा है, और मानवीय संबंधों को वे अत्यंत सात्विक और उदात्त रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी लेखनी सांस्कृतिक चेतना, इतिहास-बोध और प्रकृति के सौंदर्य को गहराई से आत्मसात करती है। इनकी कविताओं में पारंपरिक छंदों और आधुनिक भावबोध का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है, जहाँ हर शब्द सज-धजकर और सधे तरीके से अपने अर्थ का विस्तार करता है। इनकी रचनाओं में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा का एक जीवंत माध्यम बनती है, जहाँ बाहरी संघर्ष और आंतरिक चेतना के बीच का द्वंद एक शांत समाधान की ओर बढ़ता है। कवि का मूल लक्ष्य आत्मा के परिष्कार और शाश्वत सत्य की प्राप्ति है, जिससे ये कविताएं साहित्य में एक विशिष्ट और स्थाई स्थान प्राप्त करती हैं। : प्रखर
परिचय : उद्भव शांडिल्य का जन्म रिविलगंज, सारण (छपरा), बिहार में हुआ। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से भूगोल में परास्नातक किया और वर्तमान में ‘हिमालय’ विषय पर पीएचडी शोधरत हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनका कविता संग्रह ‘स्मृतियाँ तुम्हारे आलिंगन की’ सर्वभाषा ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित हो चुका है।

वैसे मुझे तुम मिलना प्रिये!
तिलांजलि का तर्पण जैसे
देव को सलिल अर्पण जैसे
सच बोलता हो दर्पण जैसे
वैसे मुझे तुम मिलना प्रिये!
धरा लोक में प्रकृति जैसे
पुरखों की पावन स्मृति जैसे
चेतना की नवजागृति जैसे
वेदों की अखंड कृति जैसे
वैसे मुझे तुम मिलना प्रिये!
भास्कर हो मंडल में जैसे
गंगा ब्रह्म कमंडल में जैसे
छवि तथागत शैली गांधार
थामें बांसुकी हो जैसे मंदार
वैसे मुझे तुम मिलना प्रिये!
हो सोमरस सिंधु का जैसे
विस्तार न्यून बिंदु का जैसे
जैसे मनु और मत्स्य अवतार
जैसे सुदर्शन की तीव्र धार
वैसे मुझे तुम मिलना प्रिये!
खग विचरते हो जैसे अंबर
ज्यों साधना में लीन दिंगबर
संगीत सुरों का प्रभाव जैसे
शबरी के पवित्र भाव जैसे
वैसे मुझे तुम मिलना प्रिये!
प्रार्थना
हे! पृथु, प्रवर, हे! प्रणत, शुभंकर।
तम पर तेज हे! आदि भद्रंकर।।
हे! सकल जग प्रसरित मार्तण्ड।
तेरी जय-जय अक्षुण्ण अखण्ड।।
जाज्वल्यमान हे! दिव्य अरूण।
ऊर्जायमान मम देव वरुण।।
हे! जनs-क्षेम के शक्ति बिंदु।
हे! शून्य नमामि दया सिन्धु।।
चैतन्य पुरुष विस्तृत विचार
हे! जीवन पथ के गुणागार ।।
हे! जग समष्टि के महासार।
तेरी जय-जय, हे! महाप्राण।।
निष्काम योगी, हे! प्रभु निश्च्छल।
अविरल धारा बहती कल-कल।।
हे! बुद्धि-शक्ति के आदि रूप।
सम्पूर्ण धरा के आदि भूप।।
छोड़कर सब मोह पास आपकी शरण आया।
पुरुषोत्तम देव गहने, आपकी चरण आया।
हे ईश्वर! हे! परमप्रज्ञ, भर दे मुझमे अब सदाचार।
दे दृष्टि परम करूं पुण्य करम, त्यज दूं अपने सब व्यभिचार।।
हो जाऊं मैं भी पूर्णप्रज्ञ, इतना मुझमें भर दे कौशल।
बनूं तमोमुक्त संग सतोयुक्त, भर जाए मुझमें संयम बल।।
दे संबल व बुद्धि अतुल्य, धारण कर लूं कुछ महामूल्य।
चैतन्य तुंग के समतुल्य, मिले शब्द ब्रह्म का महामूल्य।।
तुम किरण धवल के पुर प्रभास।
इस मन उपवन के मधुमास।।
हे! भवप्रिया के शंभुनाथ, संचित हो मुझमें सूक्ष्मज्ञान।
हो जीवन निर्भय प्राणनाथ, धर लूं मैं तेरा महाध्यान।
नित नवीन नवनीत को, बिन मांगे तुम भर देते हो।
मूल समूल विषाद को, बिन प्रकट किए हर लेते हो।
सप्तरश्मि से माँ गंगे, ज्यों स्वर्णमयी हो जाती हैं।
दृष्टि मात्र से तव दाता अन्तस् ज्योति जग जाती है।
अपरिमित नभ बिम्बों पर फैले , निज स्वप्नों का आधार हूँ।
हे! दिव्य पुरुष, नक्षत्र पुंज, तेरे अंश का विस्तार हूँ।।
जीवन व्योम संघर्ष तंतु पर, विजय मिले ये आशा है।
पुनः मिले तव शरण प्रभु, ये ही जीवन प्रत्याशा है।।
