दिन विशेष नवोदित रचनाकार विमर्श में गौरी तिवारी की कहानी ‘माँ की साड़ी’
परिचय : गौरी तिवारी बी.ए. तृतीय वर्ष की छात्रा हैं और हिंदी ऑनर्स के माध्यम से हिंदी भाषा एवं साहित्य का अध्ययन कर रही हैं। वे आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली की छात्रा हैं। साहित्य के प्रति उनकी रुचि और रचनात्मक अभिरुचि उन्हें नवोदित रचनाकार के रूप में अपनी संवेदनाओं को शब्द देने के लिए प्रेरित करती है।

‘माँ की साड़ी’
कई बार वस्त्र, एक विरासत या धरोहर की भांति अपने भीतर सुख-दुःख के पल तथा अनेक तरह की स्मृतियां संजोए होते हैं। यदि वह वस्त्र साड़ी है तो एक बेटी के लिए उसकी माँ की साड़ी सिर्फ एक कपड़े का टुकड़ा न हो करके उसका समूचा बचपन बन जाता है। जिस प्रकार अपने जीवन में विद्यालय में अध्ययन के प्रारंभ में तीन-चार वर्ष की नादान बच्ची अपनी माँ की ओढ़नी से साड़ी पहन उन सा दिखने का प्रयास करती है, वही विद्यालय का अध्ययन समाप्त होते-होते शिक्षक दिवस पर माँ की साड़ी पहन आत्मविश्वास से शिक्षिका की भूमिका निभाती है। नौकरी के लिए साक्षात्कार हो या नौकरी का पहला दिन, माँ की साड़ी ही है जो माँ के साथ न होते हुए भी मन के भय को समाप्त कर आत्मविश्वास से भर देती है। रीता के मन में भी अपनी माँ की साड़ियों के प्रति ऐसा ही आकर्षण था। अपने जीवन के पहले वसंत में कदम रखते हुए अपनी माँ की साड़ी का आँचल पकड़ उनके पीछे-पीछे चलना, लुका छिपी खेलते समय अपनी माँ की साड़ी को कवच बनाकर उसके भीतर छिप जाना, कभी रोने पर माँ किस प्रकार अपने आंचल से उसके अश्रु पोंछती मानो वह बहुमूल्य मोती हों जिन्हें धरा पर गिरने से बचा रही हो। यह स्मृतियाँ हमेशा के लिए रीता के हृदय में कैद हो गई थी, जो कहीं न कहीं माँ के साथ बढ़ते लगाव का भी प्रतीक था। कब नन्हीं सी रीता सिविल सर्विसेज की परीक्षा देने लगी पता ही नहीं लगा, पर समय के साथ उसकी माँ, सुनीता की तबियत बिगड़ने लगी, कभी घुटनों में दर्द के कारण न चल पाना, तो कभी आंखों से धुंधला दिखाई देना, अस्पताल जाने पर चिकित्सक एक ही बात कहते हैं कि या तो सर्जरी करवाइये या फिर आजीवन दवाई को अपना साथी बना लीजिए।
प्रीलिम्स के परिणाम वाले दिन रीता को देख माँ ने पूछा –
”आज तो रिजल्ट आने वाला था न? आ गया क्या? कैसा रहा रिजल्ट रीता?”
“इस बार भी मैं पास नहीं हुई माँ। मैंने अपनी तरफ से पूरी तैयारी की थी लेकिन समझ नहीं आ रहा कि कमी कहां रह गई, अब नहीं दूंगी दुबारा प्रीलिम्स का पेपर। शिक्षक की भर्ती का फॉर्म भरकर उसकी तैयारी करूंगी।”
“कोई बात नहीं, फिर से दे देना पेपर। लेकिन दो बार फेल होने की वजह से अपना सपना छोड़ दूसरी राह पकड़ना गलत है।”
रीता इसका कोई जवाब नहीं देती, चुपचाप अपनी माँ की गोद में आंखें बंद करके लेट जाती है। उसकी बंद आंखों के किनारे से निकलते आँसू को सुनीता अपने आंचल से पोछते हुए कहती है की हार कर बैठने से कहीं ज्यादा बेहतर है गिरकर बार-बार उठना।
माँ द्वारा कहे इस वाक्य ने रीता को हिम्मत दी और उसमें आत्मविश्वास आया। भूतकाल में हुई गलतियों और अपनी कमियों को परख कर रीता फिर से सरकारी परीक्षा की तैयारी करती है। दो वर्ष के अथक परिश्रम के बाद वह प्रीलिम्स पास कर मेंस की परीक्षा देती है। इस बीच उसकी माँ का स्वास्थ्य बिगड़ जाता है।
“माँ मेंस का रिजल्ट आ गया।”
“कोई बात नहीं बच्चा, अगली बार फिर दे देना।”
“अरे नहीं माँ! मैं पास हो गई।”
यह सुनते ही सुनीता की आँखें नम हो जाती हैं और वह कहती है “वाह! बहुत बढ़िया बेटा। चिट्ठी मिल गई नौकरी की?”
“अभी नहीं माँ, अंतिम चरण अभी बाकी है साक्षात्कार का। आप उस दिन मेरे साथ चलेंगी न?”
” अगर तबियत ठीक रही तो जरूर चलेंगे।”
चिकित्सक की सलाह पर सुनीता को एक महीने पूर्ण रूप से आराम करने के लिए कहा गया। कमजोरी के कारण चलने में उसे परेशानी हो रही थी। वह रीता के साथ अधिक समय व्यतीत नहीं कर पा रही थी। साक्षात्कार के दिन रीता की माँ उसके साथ नहीं जा पायी इसलिए वह उसे प्रोत्साहित करते हुए कहती हैं कि वह और उनका आशीर्वाद हमेशा उसके साथ है। रीता की माँ परीक्षा के लिए उसे शुभकामनाएँ देती हैं, किंतु रीता के मन में प्रश्नों का सैलाब उभर रहा था, क्या होगा यदि वह इस बार भी फेल हो गई ? साक्षात्कार में कितने कठिन प्रश्न पूछे जाएंगे? माँ की तबीयत कब ठीक होगी? आदि-आदि। तभी उसकी माँ उससे कहती हैं कि वह अलमारी में रखी हल्के भूरे रंग की साड़ी निकाल ले और वही पहनकर साक्षात्कार देने के लिए जाए। वह साड़ी उसे बहुत पसंद थी, जब भी अपनी माँ को उस साड़ी में देखती उसका भी मन करता एक बार उसे पहनने का। इसलिए वह खुश हो जाती है और अलमारी से साड़ी निकाल लेती है।
रीता वह साड़ी पहनकर जब साक्षात्कार देने जाती है तब स्वतः उसका मन शांत हो जाता है और उसे प्रतीत होता है की उसकी माँ और उनकी शुभकामनाए उसके साथ हैं। वह आत्मविश्वास के साथ सभी प्रश्नों के उत्तर देती है, पर पूछे गए अंतिम दो प्रश्नों के उत्तर नहीं दे पाती। फेल होने की शंका के कारण उसकी आंखें भर आती है किंतु अपने मनोभावों को नियंत्रित करते हुए वह शांत स्वर में कहती है कि उसे प्रश्न का उत्तर नहीं पता और साक्षात्कार समाप्त होते ही मुख पर हल्की मुस्कान लिए कक्ष से बाहर निकलती है।
करीब एक माह बाद परीक्षा का परिणाम आता है।
” माँ रिजल्ट आ गया!”
सुनीता उसका सिर सहलाते हुए कहती हैं “कैसा रहा रिजल्ट?”
“इस बार मैं फेल नहीं हुई माँ।”
“हमने कहा ही था की इतने वर्षों के परिश्रम का फल तुम्हें ज़रूर मिलेगा।”
“वो तो है माँ, लेकिन आपकी साड़ी ने मुझे साक्षात्कार के दिन बहुत हिम्मत दी। आपके साथ और आपकी शुभकामनाओं तथा आपकी लकी साड़ी की वजह से ही मुझमें आत्मविश्वास आया और मैं निर्भीकता से सभी प्रश्नों का उत्तर दे पाई और यह कहते-कहते दोनों माँ बेटी आपस में लिपट जाती हैं।”
