दिन विशेष विमर्श में डॉ. सुनीति रावत की कहानी मरभुक्खे
डॉ. सुनीति रावत की यह कहानी ढाबे वाले सरदार जी और पास के कालेज में पढने वाले लड़कों को लेकर बुनी गई है। बुनावट इतनी कसी हुई है कि एक भी फंदा गिराने की गुंजाईश ही नहीं है। सरदार गुरुवचन सिंह और ढाबे के बाक़ी कर्मचारियों के बीच वार्तालाप और काम का सामंजस्य देखते ही बनता है। कहानी आज की युवा पीढी के संस्कारों और सोच पर भी बात करती है। पंजाबी बोलचाल का तड़का कहानी का स्वाद बढ़ा देता है – मनोज अबोध
परिचय : 18 सितंबर 1946 को जन्मी डॉ. सुनीति रावत पत्रकारिता में एम.ए., पी.एच.डी. हैं।
सम्पादन के अनुभव के साथ साथ उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियों में उपन्यास: सीमा रेखा, लौंग, बदलते संदर्भ कहानी-संग्रह: रंगशाला, अनूठे अनुबंध, सड़क किनारे, चयनित कहानियाँ, जनप्रिय कहानियाँ, तीर तरकश के (लघु कथा संग्रह) कविता-संग्रह: गीत निकुंज, छुपे मकरंद, सब रंग पलाश, सुन मिताली, वरं-ब्रूहि, डाँडी काठी, प्रभु और प्रकृति, डोलते अक्स, नज्म-गजल-संग्रह, दो शोध ग्रंथ, अनुवाद: श्रीमद्भगवत गीता का भावानुवाद श्रीकृष्ण गीता (काव्यरूप) और बाल साहित्य: कहानी-संग्रह: घरौंदा, पार्क फंड, सरस कहानियाँ, महाभारत कथाएँ, जंगल से, सरस कहानियाँ उपन्यास: राजनगर, एक कबीला कविता: देश हमारा, स्वर गीत, गुनगुन गीत, आओ गाएँ, हम तुम गाएँ, पर्वगीत, काव्य पहेलियाँ अदि प्रमुख हैं।

मरभुक्खे
हाइवे के दोनों ओर, थोड़ी दूर पर बने ढाबे अपनी अलग ही सज-धज लिये जमे हैं। ढाबों के आगे पसरी खुली जगहों पर आते-जाते वाहन रुकते, सरकते रहते हैं। इन्हीं ढाबों की कतार में एक ढाबा है सरदार गुरुवचन सिंह का। ढाबे के शीर्ष पर लाल पेंट से लिखा एक बोर्ड है-‘गुरुवचन सिंह दा ढाबा’ जो लाल-पीली बत्तियों के बीच दिन-रात जगमगाता रहता है। ढाबे के एक ओर ऊंची सी पत्थर की चार फुटी दीवार के ऊपर स्टील के बड़े-बड़े पतीलों की कतार चमचमाती रहती है। सामने खुले बेड़े में मेजों के चारों ओर चार-चार कुर्सियाँ हैं, मेजों के ऊपर चमकती हैं स्टील की नमक दानियों और हरी-लाल सास की बोतलें। दीवार के पास ही तंदूर में सिकते फुलकों और आलू के पराठों की महक उठती रहती है और मंदी आंच पर रखे पतीलों से मां की दाल ते छोलों की खुश्बू आती रहती है। पास ही एक मेज के आगे लगी कुर्सी पर सरदार गरुवचन सिंह बैठे-बैठे खाने के आर्डर की पर्चियां काटने और पैसे के हिसाब-किताब में लगे रहते हैं। वे बीच-बीच में तनिक फारिग होकर ढाबे का चक्कर लगा आते हैं। पतीलों के पास खड़ा सतबीर भी जब-तब टन्-टन् करके पतीलों के किनारों पर कड़छी खटखटा देता है। कड़छी और पतीले की गूंज जैसे ‘आओ! बेटा! बैठो! खाओ!’ का जुमला दोहराती हैं। गुरुवचन सिंह के ढाबे की दाल और छोले का स्वाद खान वाले की जीभ पर देर तक दूर तक रहता है और हर आते-जाते की जुबान तक पहुंच कर उसी ढाबे में खाने का पैगाम भी पहुंचाता रहता है। हर रोज के आने-जाने वालों की भीड़ इसी मशहूरी की दास्तान सुनाती है।
पिछले कई वर्षों से चले आ रहे इस सिलसिले में सहसा और भी हलचल बढ़ने लगी है। इसका कारण है ढाबे के ठीक पीछे की खाली पड़ी जमीन पर एक मैनेजमेंट कॉलेज का बनना और उससे थोड़े ही दूर पर नये-नये इंजीनियरिंग का खुलना। यही नहीं, कॉलेजों के आ जाने से रातों-रात कुछ ऊँचे कद की इमारतें भी शहर के इसी छोर पर उठ गई हैं जिनमें हास्टल जैसी व्यवस्था कर दी गई है। जब से ये कॉलेज खुले हैं, गुरुवचन सिंह के ढाबे के आगे दूर तक फैली लम्बी-चैड़ी टिन की छत पड़ गई है। छत के नीचे नई कुर्सियां और मेजों की भीड़ भी बढ़ गई है। यह भीड़ कॉलेज के नये-नये जवान होते छोकरों की है। रौनक है कि बढ़ती जा रही है, आमदानी भी उसी रफ्तार से फलांगती जा रही है।
उस दिन भी सवेरे से ही ढाबे में चहल-पहल शुरू हो गई थी, दोपहर होते-होते तो आसपास के कॉलेजों के लड़के मेजों को घेरे बैठने लगे थे। घड़ी पर नजर डालकर ढाबे के मालिक गुरुवचन सिंह चिल्लाये-‘‘ओ पिद्दी, जरा छेती-छेती हाथ मार!’’ फिर दूसरे लड़के की ओर देखकर बोले-‘‘अवतारे! मेजां नू साफ करके मेजपोश बिछा छेती, ये कोई ट्रक ड्राइवर नहीं हैंगे, कॉलेजों दे शौकीन लौंडे-लफाड़े हैंगे, आंदे ही फरमाइशां शुरू कर देणगे।’’ फिर तंदूर केू पास खड़े तीसरे लड़के की तरफ देखकर कहा-‘‘सतबीरे! तंदूर तां टिच गरम है ना, परांठे दी तैयारी कर दही-सीह मथ छड्या, सब्जियाँ, दाल-दाल बस तैयार हैंगीं हन पुत्तर।’’
सतबीरे ने पतीली में कड़छी चलाते हुए कहा-तुसी चिंता न करो दार जी, मामला सारा फिट-फाट हैगा।’’
अवतार सिंह और पिद्दी अपने-अपने कामों में लग गए। देखते ही देखते आंगन में मेजें सज गई। स्टील में चमकते हुए गिलास और पानी भरे जग भी मेंलों पर लग गए। जल्दी ही लड़कों के झुंड ढाबे की तरफ आने लगे। आते ही ढाबा गूंजने लगा-‘‘गर्मागर्म आलू के परांठे इधर। दो अंडे का आमलेट साथ में चाय इधर! अरे पिद्दी, दो थाली दे दधर, पूरी-छोले फटाफट और न जाने क्या-क्या! फरमाइशें बढ़ती जा रही थी। पिद्दी पूरी मुस्तैदी के साथ इधर से उधर दौड़ता, कटे प्याज, हरी मिर्च की प्लेटें, दही आदि की एक थाली, दो थाली की फरमाइशें पूरी करने लगा था। कोई पुकारता-‘‘ऐ छोटू, ऐ पिद्दी, यार एक परांठा दे गरमागरम। इधर पानी दे भाई, कितनी देर से कह रहे हैं।’’ इधर-उधर, जितनी देर यह शोर शराबा चलता रहा, पिद्दी भी फिरकनी की तरह इधर-उधर दौड़ता रहा। अवतारा भी थाली लगा उठा करते-करते थक सा गया और सतबीरे माथे का पसीना पोंछता, परांठा, फुलका बनाता हांफने लगा था।
तीन बजते-बजते ढाबे में आवा-जाही कुछ थमी तो गुरुवचन सिंह गद्दी पर बैठते हुए बोले-‘‘सतबीरे! मैंनू भी दे गोभी दे परांठे, दही-मक्खन दे नाल पुत्तर।’’
‘‘आहो जी शाह जी! अभी लो जी तुसी वी।’’कहते हुए सतबीर ने चमकती हुई थाली में गरम परांठा रखा, तो पिद्दी दही, अचार, प्याज लेकर दौड़ा। सतबीर एक-एक कर गरम परांठा सेंकता जा रहा था तो अवातार सिंह सरदार जी की थाली में परांठा सरकाता जा रहा था। परांठा खाते-खाते ही सहसा सरदार जी बोले-‘‘ओए! अज तीन दिन हो गए ने ते ओ दोनों बंदे नी आए, की गल सीगी।’’
‘‘कौण शाह जी!’’ सतबीर तवे में परांठा पलटता हुआ बोला।
‘‘वही पुत्तर! सतविन्दर ते भूपिन्दर।’’
सतबीर कुछ कहता कि पिद्दी बोल पड़ा-‘‘सच बोलूं शाह जी, वे दोनों नहीं आते हैं तो मजा भी नहीं आता।’’
‘‘गल तो तेरी ठीक ए, मन नी लगदा साडा वी।’’ कहकर गुरुवचन सिंह परांठे का कौर तोड़ते हुए फिर बोले-‘‘ओए पिद्दी पाणी दा गिलास नहीं रख्यां तूं? ल्या छेती।’’
‘‘अभी लाया उस्ताद जी।’’ पिद्दी पानी भरा गिलास लेकर दौड़ा। गुरुवचन सिंह ने एक नजर उसकी तरफ देखा-‘‘ओए! मुंह सूख गया फिरकनी दा, सतबीरे! वेख इधर, सब तों छोटा होगा ये, ये दी थाली भी ला। औतारे, बाकी बरतन-शरतन उठाण दा काम तू छांट ले पुत्तर।’’
औतार सिंह सिर हिला कर काम करता रहा तो सतबीर ने दो थालियों में दाल, चावल, सब्जी, रखी, पिद्दी ने झट थाली के किनारे प्याज, अचार भी रख दिया, फिर थाली उठाते हुए बोला-‘‘भाई अवतार सिंह, जीम लो आप भी, और आप भी खा लो दद्दा।’’
‘‘तू खा! साडी फिकर ना कर छोटू! ये ले आज रोटी नहीं, तू भी गोभी द परांठा खा, औतारे दी थाली में भी ये परांठा रख दे।’’ छोटे की बांछें खिल गई-‘‘दद्दा! परांठा मुझे बहुत अच्छा लगता है, आप भी थाली लगा लो ना।’’
‘‘ये लो, ये बण गए ने साडे परांठे वी।’’ तंदूर के ऊपर वाल तसला पलट कर सतबीर भी झट हाथ-मुंह धोकर आया तो छोटू ने उसकी थाली भी लगा दी। सतबीर खाने बैठा तो छोटू नल के नीचे लगे बर्तनों के ढेर की तरफ बढ़ गया। अवतार सिंह भी झटपट खाना निबटाकर पास आया और बोला-‘‘छोटू, थाली-कटोरी तू धो और बड़े देग-पतीले इधर सरका दे, मैं मांझ लूंगा।’’
‘‘क्यों अवतार भैया, ऐसा क्यों?’’
‘‘अरे पिद्दी! अभी तू बहुत छोटा है ना, तेरे बस के नहीं देग-कढ़ाहे और फिर शाह जी ने देख लिया तो कान खिंचाई कर देंगे। बोलेंगे-साले सरम नीं औंदी त्वानू, पिद्दी ते आगे एन्ने बड़े-बड़े बरतन रखदा पैया।’’
‘‘हूँ।’’ पिद्दी हँसते हुए थालियां मांझने लगा। यही वक्त होता था, जब काम निबटा कर थोड़ी देर तीनों गल्ले की बोरियों पर पीठ टिका कर गप-शप करते, तनिक सुस्ताते थे।
अभी वे कुछ देर बैठे थे कि गुरुवचन सिंह मसनद पर पीठ टिकाये बोल पड़े-‘‘सतबीरे! थोड़ी देर बाद दे राहगीर औण लगेंगे पुत्तर! इस तौं पहले ते मैन्नू वी एक कड़क चा पिला दे यारा! खुद वी ले, ते पिद्दी ते अवतारे नू वी दे छड़, फिर तो जमके अद्धी रात तक काम करना पऊ।’’
‘‘आहो जी!’’ कहकर सतबीर उठने लगा तो अवतार सिंह बोला-‘‘भाई जी! तुसी अभी आराम करो जी, चा मैं बना दूंगा तो पिद्दी परोस देगा जी।’’
‘‘ठीक है अवतारे! तेरी गल भी ठीक सी, त्वाडी चा ते अधिक सोणी त्वाडी, हिंदी-पंजाबी लगदी सी, चल अज मैं वी भौत थक गया सी।’’
‘‘पिद्दी! तू भी चा पियेगा ना?’’ अवतारे ने चाय का बरतन चूल्हे में रखते हुए पूछा।
‘‘हाँ जी! अब तो मुझे भी चा की लत लग गई है।’’ पिद्दी बोला। सुनकर सरदार जी हा…हा…हा करके हँसे फिर बोले-‘‘तैनू भी चा चंगी लगण लग गई है पिद्दे।’’
‘‘जी उस्ताद जी! मुझे तो सब कुछ अच्छा लगता है-इतने रंग का खाना, तीन बेर की चा, बिस्कुट-सिरकुट सब!’’
‘‘अच्छा! और की अच्छा लगता त्वानू?’’
‘‘आप सबका पिद्दी, छोटू, फिरकनी कहना, मैं तो अपना असली नाम भोलू भी भूल गया उस्ताद जी।’’
‘‘चल वे भोलू दे भोला! मैं तो प्यार नाल तैनू पिद्दी कहंदा हाँ, चल चा दा गिलास ला छेती, फिर फिरकनी बन जाएगा साडा पिद्दी।’’
है…है…हँसता पिद्दी उस्ताद जी को चाय देने जा पहुंचा। चाय के साथ बिस्कुट थे। गुरुवचन सिंह ने दो बिस्कुट उसकी तरफ बढ़ाये, ‘‘लै फड़ छेती, खा ले।’’
‘‘आप लो उस्ताद जी! मैं दद्दा से मांग लूंगा।’’
‘‘ले ले पुत्तर! दद्दा वी दे देगा।’’ कहकर सरदार जी प्यार से छोटू की तरफ ताकते हुए फिर बोले-‘‘मैंनू आज वी ओ दिन याद सीगा जद तूं साडे ढाबे दे आग्गे रोंदा पया सीगा। मैं पुचकारा तो बोला-यहां कोई नहीं है मेरा, कहां जाऊंगा मैं? चाचा के साथ आया था इटावा से वो किधर गया कुछ पता नहीं। तद मैं बोल्या सी-जे तू एत्थे आ गया ते ऐत्थे ही रह ले, घबराण दी लोड़ नी। सतबीरे, एनां नू चा ते बंद दे दे यारा, भूखा प्यासा सीगा बेचारा।’’
‘‘हाँ जी! मुझे खूब याद है जी!’’
‘‘पर पिद्दी! साल गुजर गया हैगा! तू हुण वी पिद्दी ही रै गया।’’
‘‘जी उस्ताद जी बोलदा सीगा, दार जी बोल्या कर तू वी।’’
‘‘जी दार जी ही बोलूंगा, उस्ताद जी।’’ सुनकर सब हँस पड़े।
‘‘सांझ की गहमा गहमी शुरू हो गयी थी। बटोही आने-जाने लगे थे। सांझ की बेला की चाय पानी का जिम्मा अवतार सिंह के सिर होता। समोसे-पकोड़े से छोले भटूरे तक की तैयारी और परोसने तक में फिरकनी दौड़ता फिरता। हर मेज पर चाय पानी पहुंचाता। इस बीच सुबह की रोटी सेंक-सेंक कर थका शरीर सतबीर या तो सरदार जी के हिसाब-किताब में हाथ बंटाता या भंडारे में क्या है क्या नहीं, कल के लिए साग-भाजी, मसाले मिर्ची। बेसन-मैदा, चीनी-चावल की लिस्ट में उलझा रहता। तीन-चार बजे तक चाय-पानी का हंगामा चलता रहता। फिर रात की रसोई की खटर-पटर लगती।
रात का खाना खत्म हुआ ही था कि गुरुवचन सिंह ने आवाज दी-‘‘सतबीरे! दो थालियां होर ल्या पुत्तर। देख दोनों आ गए ने।’’ सुनकर पास आते हुए दोनों लड़के हंसे-‘‘क्या करें दार जी, आपके ढाबे की रोटी के बिना काम ही नहीं चलता।’’
‘‘काके! ताँ आ जाया करो रोज। पन्द्रह-वी दिन त्वाडी शकल नीं नजर औंदी। हर महीने ऐ ही गल…’’
‘‘दार जी, पन्द्रह-बीस दिन रहती है जेब गरम। घर से आये पैसे खनकते हैं जेब में तो मटरगश्ती सूझती है खूब। बाकी जितने दिन भारी पड़ते हैं वे आपके हवाले।’’
‘‘ऐंज ना किता करो पुत्तर।’’
‘‘दार जी! पर्स में पैसे हों तो ढाबे की कौन सोचता है। घूमना फिरना, हाट बाजार, दिन इन्हीं शोशों में निकल जाते हैं। जेब खाली हुई तो याद आता है आपका दस्तरखान।’’ भूपेन्द्र बोला।
‘‘ओए पुत्तर, ये चंगी गल कोनी।’’
‘‘हाँ जी! है तो ठीक नहीं, पर सब लड़के ऐसा ही करते हैं। हॉस्टल में हों या पेइंग गेस्ट! पैसे खत्म हुए तो नौबत समोसे-कचोड़ियों तक भी आ जाती है।’’
‘‘ना पुत्तर! ये गल ठीक नहीं, पढ़न-लिखन वास्ते आये हो होर खाण-पीण ठीक ना रखोग तो तुसी पढ़ोगे खाक!’’
‘‘बात तो सही है दार जी…पर इस उम्र में हुडदंग, हुल्लड़ नहीं करेंगे तो कब करेंगे। चलिये छोड़िये ये सब। आप तो पिछला हिसाब निबटा लो जी!’’ सतविन्दर ने रुपये बढ़ाते हुए कहा।
‘‘ठीक है पुत्तर! तुसी ऐंज करो ऐदर ही खाओ-पीओ, चाय-नाश्ता ते खना वी, इक-इक बंदे का ढाई-ढाई हजार दे देणा बस! त्वाडे वर्गे किन्ने मुंडे हैंगे ने इद्दर।’’
‘‘दार जी! अब चलने भी दीजिए जैसा चल रहा है, इसी साल की तो बात है। जाते-जाते सब निबटा जायेंगे हम।’’ सतविन्दर ने कहा।
‘‘त्वाडी मरजी।’’
‘‘हाँ जी, दार जी, इस साल फाईनल कर लिया तो समझो कहीं न कहीं नौकरी भी मिल जायेगी। तब नहीं आयेंगे हम आपको सताने यहाँ।’’ भूपेन्द्र बोला।
‘‘पुत्तर! वाहे गुरू दी सौं, ऐद्दा तो नहीं क्या सी मैं, तुसी आया करो जद मर्जी।’’
रुपये दराज में रखकर सरदार जी ने सतबीर की तरफ देखा और जोर से बोले-‘‘सतबीरे! हाली थाली नीं गाई तूं, लगा छेती।’’
‘‘अभी दार जी।’’ झट पिद्दी की तरफ सतबीर ने देखा तो पिद्दी ने फटाफट थाली कटोरी गिलास मेज पर सजा दिये।
जसबीर जानता था, दोनों तंदूरी परांठे और मक्खन के शौकीन हैं। वह परांठे सेंकने लगा, एक-दो-तीन-चार छः। सतबीर ने हाथ रोक दिया, ‘‘बाबू जी! और कि बस…’’
‘‘बस के बच्चे! पिछले तीन दिन से लटरम-पटरम खाकर ही गुजारा किया, ढाबे आने तक की फुरसत भी नहीं मिली। प्रैक्टिकल चल रहे थे न, चल बना परांठे।’’
उस दिन जो वे दोनों डटे तो सात-सात परांठे खाकर ही उठे। सतबीर माथे का पसीना पोंछता रहा और गुरुवचन सिंह हँसते रहे…‘‘खिला दे सतबीरे, पेट भर कर ऐनानू।’’ फिर मन ही मन बोले-‘‘मरभुक्खे न हों तो।’’
