श्रवणबेलगोला : इतिहास, संस्कृति एवं आध्यात्मिक विरासत – डॉ.एस.ए.मंजुनाथ

श्रवणबेलगोला भारत के प्रमुख जैन तीर्थों में से एक है। यह कर्नाटक के हासन जिले में स्थित विश्वविख्यात धार्मिक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक केंद्र है। यहाँ स्थित भगवान बाहुबली (गोम्मटेश्वर) की 57 फुट ऊँची एकाश्म प्रतिमा भारतीय शिल्पकला की अनुपम धरोहर है। श्रवणबेलगोला केवल जैन धर्म का आस्था-स्थल ही नहीं, बल्कि भारतीय स्थापत्य, दर्शन, कला एवं सांस्कृतिक विरासत का उत्कृष्ट उदाहरण भी है। प्रस्तुत शोधालेख में श्रवणबेलगोला के इतिहास, स्थापत्य, धार्मिक महत्व तथा सांस्कृतिक योगदान का विवेचन किया गया है।
भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं में जैन धर्म का विशिष्ट स्थान है। अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और आत्मसंयम इसके मूल सिद्धांत हैं। कर्नाटक स्थित श्रवणबेलगोला इन आदर्शों का जीवंत प्रतीक है। सदियों से यह तीर्थ साधकों, श्रद्धालुओं, इतिहासकारों एवं पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करता रहा है। ‘श्रवणबेलगोला’ शब्द दो कन्नड़ शब्दों से मिलकर बना है—’बेला’ अर्थात् श्वेत तथा ‘गोला’ अर्थात् सरोवर। यहाँ स्थित श्वेत जल वाले सरोवर के कारण इस स्थान का नाम श्रवणबेलगोला पड़ा। यह बेंगलुरु और मैसूर के मध्य स्थित एक महत्वपूर्ण तीर्थ है।
श्रवणबेलगोला का इतिहास लगभग 2300 वर्ष पुराना माना जाता है। जैन परंपरा के अनुसार, मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरु भद्रबाहु के साथ यहाँ आकर तपस्या की तथा यहीं संलेखना व्रत द्वारा देह त्याग किया। चंद्रगिरि पर्वत पर स्थित अनेक शिलालेख एवं मंदिर इस ऐतिहासिक परंपरा की पुष्टि करते हैं। श्रवणबेलगोला का सबसे बड़ा आकर्षण भगवान बाहुबली की लगभग 57 फुट ऊँची एकाश्म प्रतिमा है, जिसका निर्माण दसवीं शताब्दी में गंग वंश के मंत्री चामुंडराय ने कराया। यह प्रतिमा त्याग, तप, धैर्य एवं आत्मविजय का प्रतीक है। प्रतिमा की शांत मुद्रा और अद्भुत शिल्पकला भारतीय मूर्तिकला की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिनी जाती है।
प्रत्येक बारह वर्ष में आयोजित होने वाला महामस्तकाभिषेक विश्वप्रसिद्ध धार्मिक आयोजन है। इस अवसर पर बाहुबली की प्रतिमा का जल, दूध, चंदन, केसर, पुष्प एवं अन्य पवित्र द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है। इस महोत्सव में देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु एवं पर्यटक भाग लेते हैं। श्रवणबेलगोला में अनेक जैन मंदिर, बसदियाँ, शिलालेख तथा प्राचीन स्थापत्य संरचनाएँ स्थित हैं। यहाँ के शिलालेख कन्नड़, संस्कृत, प्राकृत और तमिल भाषाओं के इतिहास एवं साहित्य के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। यह क्षेत्र दक्षिण भारत में जैन संस्कृति के विकास का प्रमुख केंद्र रहा है।
श्रवणबेलगोला धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ सांस्कृतिक पर्यटन का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। यहाँ आने वाले पर्यटक भारतीय कला, इतिहास और आध्यात्मिक परंपरा का प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। इस विश्वविख्यात धरोहर के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सरकार तथा विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ निरंतर कार्यरत हैं।
श्रवणबेलगोला भारतीय सांस्कृतिक विरासत का अमूल्य रत्न है। यह केवल जैन धर्म का तीर्थ नहीं, बल्कि अहिंसा, आत्मसंयम, तप और मानवता के सार्वभौमिक मूल्यों का प्रेरणास्रोत है। बाहुबली की विराट प्रतिमा आज भी समस्त मानव समाज को आत्मविजय, शांति और सह-अस्तित्व का संदेश देती है। अतः इस पवित्र तीर्थ का संरक्षण तथा इसकी सांस्कृतिक विरासत का संवर्धन हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।
