इंदौर के साहित्यिक संस्मरणों की महक: ‘समय की रेत पर इंदौरी यादें’ – डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’

स्वर्गीय दादा पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत जी ने न केवल मेरी पुस्तक ‘समय की रेत पर इंदौरी यादें’ को आशीर्वाद दिया बल्कि पुस्तक की समीक्षा भी की। दुख इस बात का है कि वे अब हमारे बीच नहीं हैं। भगवान परमपूज्यनीय पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत जी की आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
इंदौर के साहित्यिक संस्मरणों की महक: ‘समय की रेत पर इंदौरी यादें’
(स्वर्गीय पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत के उद्गारों की कसौटी पर डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’ की कालजयी संस्मरणात्मक कृति)
किसी कृति की वास्तविक सार्थकता इस बात में निहित होती है कि वह पाठक को केवल शब्दों का संकलन न लगे, बल्कि एक संपूर्ण कालखंड से साक्षात् करा दे। लेखक डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’ की पुस्तक ‘समय की रेत पर इंदौरी यादें’ इसी साहित्यिक कसौटी पर पूर्णतः खरी उतरती है। पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत जी ने डॉ. ‘उरतृप्त’ की इस कृति का अत्यंत सूक्ष्म एवं मर्मस्पर्शी विश्लेषण करते हुए इसे केवल अतीत का नीरस विवरण मानने से इंकार किया है, बल्कि इसे एक संपूर्ण जीवंत युग की स्पंदनशील धड़कन स्वीकार किया है। समय की गति अनावृत और निरंतर है, जो अपने साथ कई दृश्यों, प्रसंगों और अनुभूतियों को धुंधला कर देती है। परंतु डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने अपनी विलक्षण दृष्टि, गहरी संवेदनशीलता और अनूठी लेखनी के बल पर उस रेत पर उकेरी गई स्मृतियों को अमर बना दिया है। यह समीक्षा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि जब डॉ. ‘उरतृप्त’ जैसी आत्मीयता से स्मृतियों को पन्नों पर पिरोया जाता है, तो वे इतिहास के सूखे पन्नों से निकलकर एक चेतन भाव-लोक का निर्माण करती हैं।
इंदौर केवल एक भौगोलिक शहर नहीं, बल्कि एक विशिष्ट सांस्कृतिक, साहित्यिक और आत्मीय जीवन-शैली का नाम है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’ की अनुपम भाषा-शैली और सहज अभिव्यक्ति है। डॉ. ‘उरतृप्त’ की सहज, प्रवाहपूर्ण और मर्मस्पर्शी भाषा ने इंदौर के इस अनूठे परिवेश को इतनी सजीवता के साथ पन्नों पर उतारा है कि पाठक स्वयं को उस अलौकिक भाव-लोक का हिस्सा महसूस करने लगता है। रचनाकार पाठक को केवल एक दृष्टा नहीं बनाती, बल्कि उसे उस वातावरण का जीवंत आस्वादन कराती है जहाँ इंदौर की साहित्यिक गोष्ठियों, आत्मीय गलियारों और पारिवारिक संबंधों की सोंधी महक बसी है। डॉ. ‘उरतृप्त’ की भाषा का यह निर्मल और स्वाभाविक प्रवाह हर पृष्ठ पर पाठक को बाँधकर रखता है और संस्मरण साहित्य की उत्कृष्टता का प्रामाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करता है।
संस्मरणों की सार्थकता तब और अधिक बढ़ जाती है जब उसमें केवल कोरी कल्पना नहीं, बल्कि जीवन का ठोस यथार्थ और लोक-संस्कृति का स्वाभाविक रंग घुला हो। डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ‘उरतृप्त’ की इस कृति में एक ओर जहाँ अपने अतीत के प्रति अगाध प्रेम और ममत्व की धारा बहती है, वहीं दूसरी ओर तत्कालीन समाज के यथार्थ, लोक-जीवन के विविध रंगों और मानवीय संबंधों की प्रगाढ़ता का प्रामाणिक चित्रण मिलता है। पंत जी ने इस बात पर विशेष बल दिया है कि डॉ. ‘उरतृप्त’ के शब्दों में समाहित यह ‘सोंधी सुगंध’ सीधे पाठक के हृदय को आंदोलित और आह्लादित करती है। यह कृति इस सत्य का उद्घाटन करती है कि रिश्ते, लोकाचार और सांस्कृतिक परंपराएँ किसी समाज की आत्मा होती हैं। लेखक डॉ. सुरेश कुमार मिश्र ने इंदौर के लोक-रंग और आत्मीय रिश्तों के ताने-बाने को अपनी उम्दा दृष्टि से इतनी बारीकी से उकेरा है कि वह हर पाठक के भीतर छिपे हुए उसके अपने अतीत और यादों को पुनर्जीवित कर देती है।
डॉ. ‘उरतृप्त’ की यह कृति “संस्मरण साहित्य के क्षेत्र में एक अमर और अनुपम छाप छोड़ती है”, इसके दूरगामी साहित्यिक मूल्य और लेखक की क्षमता को सिद्ध करती है। पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर इंदौरी जीवन-शैली का निर्मल प्रवाह और लेखक डॉ. सुरेश कुमार मिश्र की मानवीय संवेदना का अनुपम सौंदर्य निरंतर स्पंदित होता है। यह रचना पाठकों को अतीत के गलियारों में ले जाकर न केवल पुरानी मधुर स्मृतियों से तृप्त करती है, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित भी करती है। निःसंदेह, यह पुस्तक हर उस संवेदनशील पाठक के लिए एक अनिवार्य पठनीय कृति है जो साहित्य में जीवन का विशुद्ध आनंद और अपनी जड़ों की महक तलाशता है।
