दिन विशेष (प्रवासी रचना) में रश्मि त्रिवेदी की कविता “मेरे मन की सात परतें”

रश्मि त्रिवेदी मूलतः नागपुर, महाराष्ट्र की हैं और वर्तमान में वीज़बाडेन, जर्मनी में रहती हैं।

*कहानी और कविता लेखन में उनकी विशेष रुचि है। उनकी दो एकल पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं—‘एक समुंदर प्रेम का’(प्रेम कहानी संग्रह) और ‘लेडी डिटेक्टिव’(दो जासूसी कहानियों का संग्रह) ।

*उनकी रचनाएँ विभिन्न डिजिटल साहित्यिक मंचों पर भी प्रकाशित हुई हैं। जीवन के विविध अनुभवों और मानवीय संवेदनाओं को शब्द देना उनके लेखन का प्रमुख सरोकार है।

“मेरे मन की सात परतें”

मेरे मन की सात परतें
सात गहन कक्ष
जिनके द्वार समय की धूल से ढँक गए हैं,
किन्तु, भीतर अब भी
तुम्हारी स्मृतियों के दीप
अविराम जल रहे हैं
 
प्रथम परत में–
प्रेम का वह आदिम क्षण निवास करता है
जब तुम्हारा नाम
मेरे हृदय के निर्जन आकाश पर
प्रथम नक्षत्र की तरह उदित हुआ था;
उस समय संसार में
न ऋतुओं का भान था
न दिशाओं का,
केवल तुम्हारी उपस्थिति थी
और उसी में मेरा समूचा अस्तित्व
 
द्वितीय परत में–
तुम्हारी हँसी का संगीत सुरक्षित है
वह हँसी–
जो कभी वसंत का मृदुल समीर बनकर
मेरे एकांत वन में बहती थी
आज भी जब रात्रि
अपने समस्त शब्द समेट लेती है,
उस नीरवता के गर्भ से
तुम्हारी हँसी का कोई धुन
धीरे-धीरे जन्म लेता है
 
तृतीय परत में–
तुम्हारे स्पर्श की स्मृति है
एक ऐसी स्मृति
जिसे समय का कोई प्रवाह क्षीण नहीं कर पाया,
वह स्पर्श अब त्वचा पर नहीं
आत्मा की गहराइयों में अंकित है–
मानो किसी प्राचीन शिलालेख पर
उकेरी गई अमिट लिपि हो
 
चतुर्थ परत से–
विरह का साम्राज्य आरम्भ होता है
तुम्हारे प्रस्थान के पश्चात
समय ने अपनी गति नहीं खोई,
किन्तु मेरे भीतर की घड़ियाँ
उसी क्षण पर ठहर गईं
जब तुम्हारी दृष्टि ने
अंतिम बार मुझे स्पर्श किया था
तभी से हर संध्या
एक अधूरी विदाई का विस्तार है
 
पंचम परत–
अश्रुओं की एक मौन नदी है
यहाँ अनगिनत रातें
अपनी थकी हुई पलकों सहित सोई पड़ी हैं,
यहाँ वे सभी शब्द भी विश्राम कर रहे हैं
जो तुम्हें कहे जाने की प्रतीक्षा में
मेरे अधरों तक आकर लौट गए थे,
इस परत में दुःख भी
तुम्हारी स्मृति का आभूषण धारण करता है
 
षष्ठम परत में–
प्रेम और पीड़ा का अद्भुत संयोग है
यहाँ मैंने जाना–
सच्चा प्रेम प्राप्ति की आकांक्षा से बड़ा होता है,
वह किसी नदी की भाँति
अपने सागर तक पहुँचे बिना भी
बहता रहता है,
वह किसी दीपक की तरह
अपने ही क्षय में
प्रकाश रचता है
और फिर आती है सप्तम परत
मन की सबसे गहन,
सबसे रहस्यमयी परत
 
यहाँ न स्मृतियों का कोलाहल है
न विरह की व्यथा,
यहाँ केवल एक निर्विकार शांति है
जिसके केंद्र में
तुम्हारा नाम एक मंत्र की भाँति स्पंदित होता है
 
यह वही स्थान है–
जहाँ प्रेम अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग कर
प्रार्थना बन जाता है;
जहाँ बिछोह
वेदना नहीं, साधना हो जाता है
और जहाँ तुम्हारा अभाव भी
तुम्हारी उपस्थिति का ही दूसरा रूप प्रतीत होता है
 
मेरे मन की इन सात परतों में
तुम कहीं दिखाई नहीं देते,
किन्तु तुम्हारे अतिरिक्त
कुछ और भी नहीं है
 
तुम उस चंद्रमा की तरह हो
जो आकाश में दूर रहकर भी
समुद्र की प्रत्येक लहर को आंदोलित करता है
और मैं
एक प्राचीन मंदिर के अंतिम दीप-सी
अब भी उसी आलोक में जल रही हूँ,
जिसे तुम वर्षों पहले
मेरी आत्मा में छोड़ गए थे।

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