‘ओणम और भारतीय कालगणना’ : श्रेयस गोखले

‘ओणम’ अथवा ‘तिरुवोणम्’ अर्थात् ‘श्रवण नक्षत्र’ का त्योहार। भारत में प्रत्येक पर्व किसी न किसी खगोलीय घटना से अवश्य जुड़ा होता है। इन्हीं खगोलीय घटनाओं पर आधारित हमारी भारतीय कालगणना पद्धति है।
ओणम पर्व प्रत्येक वर्ष 17 अगस्त (सिंह संक्रांति) से 17 सितंबर (कन्या संक्रांति) के बीच दस दिनों तक मनाया जाता है। चंद्र हस्त नक्षत्र में आने पर इसका प्रारंभ होता है और श्रवण नक्षत्र में आने पर इसकी पूर्णता होती है। श्रवण नक्षत्र भगवान महाविष्णु से संबंधित होने से इस पर्व पर भगवान विष्णु के पूजन का विशेष महत्त्व है। यह अवधि भगवान वामन और चिरंजीव राजा महाबली की पौराणिक कथा से भी जुड़ी है। भगवान वामन द्वारा राजा महाबली को पाताल में भेजने के बाद उन्हें अपनी प्रजा से मिलने हेतु वर्ष में एक दिवस पृथ्वी पर आने व चिरंजीव होने का वरदान दिया गया था। राजा महाबली के आगमन की प्रसन्नता में यह पर्व भारत के केरलम् प्रांत में विशेष रूप से मनाया जाता है।
केरल में मानसून का आगमन शेष भारत की तुलना में शीघ्र होता है अतः यहाँ का फसल चक्र भी उसी अनुसार शेष भारत के थोड़ा पहले चलता है। इस समय तक धान की फसल पकने लगती है अतः धान कटाई की शुरुआत होती है। एक प्रकार से पूरे भारत में धान कटाई का प्रारंभ केरल में ओणम से होता है जो आगे पूरे भारत में दीपावली तक चलता है। फसल कटाई से जुड़ा होने से भी इस पर्व का केरलम् के ग्रामीण एवं कृषिप्रधान जीवन में विशेष महत्त्व है। इसी दौरान नारियल की भी बहुतायत होती है अतः भोजन में भी चावल और नारियल का अधिक प्रयोग मिलता है।
किसी समय क्षेत्र विशेष का ये पर्व आज पूरे भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है व सभी जगह केरल के पारंपरिक सफेद परिधान में सजे लोग, पूक्कलम् (फूलों की रंगोली) से सजे परिवेश में ओणम पर बनने वाली विशेष थाली ‘सद्या’ का आनंद लेते दिखते है। केले के पत्ते पर परोसे गये ‘सद्या’ के ये पारंपरिक व्यंजन एक अलग ही अनुभव देते हैं जो वर्ष की इस अवधि में और विशेष बन जाता है।

भारतीय कालगणना में नक्षत्रों, ग्रहों और राशियों के आकाश में बनने वाले संयोगो से तिथि-दिनों का निर्धारण किया जाता रहा है। साधारण यंत्रों और गणितीय सूत्रों द्वारा होने वाली अचूक गणना से और अनेक बार आकाश के प्रत्यक्ष दर्शन से भी तिथि काल का ज्ञान हमारे पूर्वज सहजता से कर लेते थे, और हम में से कई आज भी कर लेते हैं। पूरे ३६० डिग्री के आकाश को सत्ताईस भागों में बांटकर उस भाग में रहने वाले तारों को नक्षत्र के रूप में चिह्नित कर, उनके समूहों को १२ राशियों में विभाजित कर मानो आकाश में आड़ी रेखाओं की ग्रिड निर्मित की जाती है। सूर्य प्रत्येक माह में एक राशि को पार कर जहाँ एक वर्ष में १२ राशियों में से भ्रमण करता है, वहीं चंद्रमा एक माह में ही सभी २७ नक्षत्रों व १२ राशियो में भ्रमण कर लेता है। जिस महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी नक्षत्र से महीने का नाम बनता है। यथा- चित्रा से चैत्र, कृतिका से कार्तिक, श्रवण से श्रावण आदि। श्रवण नक्षत्र प्रत्येक मास में एक बार किसी न किसी तिथि को आता है, जिसमें श्रावण मास में पूर्णिमा तिथि को(अथवा एक-दो दिवस आगे पीछे) आता है। भाद्रपद मास में श्रवण नक्षत्र अमूमन शुक्ल पक्ष की द्वादशी-त्रयोदशी को आता है। सामान्यतः भारतीय पर्व चंद्र के मासों के आधार पर निर्धारित होते हैं इसलिये निर्धारित मास की निर्धारित तिथि को ही (जैसे रक्षाबंधन सदैव श्रावण की पूर्णिमा को, होली सदैव फाल्गुन की पूर्णिमा को आदि) आते हैं।
केरलम् प्रांत का कैलेंडर थोड़ा विशेष हैं। यहाँ सूर्य के अनुसार मासों की गणना होती है। जनवरी 15 से सूर्य मकर में जाते ही केरलम् में मकर मास प्रारंभ होता है। इसकी प्रकार अन्य राशियों की संक्रांति पर कुंभ, मेष, सिंह आदि मास प्रारंभ होते हैं। भारतीय कालगणना पद्धति की विविधता तथापि एकरूपता अत्यंत रोचक है। पाश्चात्य कालगणना के विपरीत भारतीय कालगणना प्रत्यक्ष है। जानने वाले द्वारा प्रत्येक दिन, तिथि और मास आँखों के सामने परखा जा सकता है। ‘ओणम’ पर आकाश में आँखों के सामने श्रवण नक्षत्र की पृष्ठभूमि पर सजा हुआ चंद्रमा और सिंह राशि की पृष्ठभूमि पर सजा हुआ सूर्य, वातावरण में वर्षा की फुहारें और हरी-भरी पृथ्वी मानो धरती से लेकर आकाश तक ‘श्रवण नक्षत्र’ के पर्व और भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवंतता का उल्लास अभिव्यक्त करते दिखते हैं।
