जंग लगी चाबी (व्यंग्य) : डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

कस्बे की सबसे पुरानी जिला सहकारी बैंक की शाखा में प्रवेश करते ही सीढ़ियों के ठीक नीचे बने लॉकर रूम के भारी लोहे के दरवाजे पर नजर पड़ जाती थी जिसकी पॉलिश वक्त के साथ उखड़ चुकी थी। उसी दरवाजे के बगल में रखी लकड़ी की एक पुरानी बेंच पर हर महीने की पहली तारीख को दीनदयाल बाबू आकर बैठ जाते थे। सफेद खद्दर का धोती कुर्ता पहने और अपने कांपते हाथों में पीतल की एक पुरानी जंग लगी चाबी थामे दीनदयाल बाबू दिन भर उस लोहे के दरवाजे को एकटक निहारते रहते थे। बैंक में सुबह से शाम तक किसानों का कर्ज चुकाने, पासबुक में एंट्री कराने और पेंशन निकालने का भारी तांता लगा रहता था लेकिन दीनदयाल बाबू को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं था। जब भी कोई नया कैशियर या क्लर्क वहाँ तैनात होकर आता तो वह इस बूढ़े इंसान को उस जंग लगी चाबी को बार बार अपने अँगूठे से सहलाते देखकर अचरज में पड़ जाता था। बैंक का पुराना चपरासी रामसेवक जब भी चाय की ट्रे लेकर मैनेजर के केबिन में जाता तो दीनदयाल बाबू बहुत ही सहेज कर उससे पूछते “क्यों रे रामसेवक आज उस कोने वाले बावन नंबर लॉकर का कोई बुलावा आया क्या या आज भी साहब ने चाबी घुमाने की इजाजत नहीं दी?” रामसेवक बस अपनी नजरें झुका लेता और एक लंबी गहरी साँस भरकर चुपचाप आगे बढ़ जाता था।

गाँव के लोग जब भी अपनी गाढ़ी कमाई जमा करने बैंक आते तो दीनदयाल बाबू को उसी निश्चल मुद्रा में बैठा देखकर आपस में तरह तरह की कानाफूसी करने लगते थे। लोगों का मानना था कि दीनदयाल बाबू के पास उस बावन नंबर लॉकर में कोई बहुत बड़ी पैतृक संपत्ति, सोने के जेवरात या कोई गुप्त खजाना बंद है जिसे वे दुनिया की नजरों से छुपाकर रखे हुए हैं। दीनदयाल बाबू के इकलौते बेटे सुमित को शहर की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट बने पूरे दस साल बीत चुके थे। सुमित जब छोटा था तो दीनदयाल बाबू ने अपनी सारी उपजाऊ जमीनें बेचकर उसकी महंगी इंजीनियरिंग की फीस भरी थी। कस्बे के कपड़े व्यापारी छगनलाल जब भी बैंक में गड्डी जमा करने आते तो दीनदयाल बाबू से चुटकी लेते हुए कहते “दीनदयाल जी अब उस बावन नंबर लॉकर को खाली करवाकर उस खजाने को अपने बेटे के नए बंगले में शिफ्ट क्यों नहीं कर देते, अब तो आपका सुमित करोड़ों का पैकेज उठाता है और उसके पास हर आधुनिक सुख सुविधा है।” दीनदयाल बाबू छगनलाल की बात सुनकर बुरा मानने के बजाय केवल एक धीमी सी रहस्यमयी मुस्कान बिखेर देते और अपनी लाठी को जमीन पर टेकते हुए कहते “छगन भाई यह दौलत तिजोरियों में बंद सोने चाँदी की नहीं है, इस चाबी के दाँतों में उस रिश्ते की सांसें अटकी हुई हैं जो मुझे हर महीने यहाँ खींच लाती हैं।”

बैंक में हाल ही में नए शाखा प्रबंधक के रूप में आए प्रकाश नारायण जी बहुत ही व्यावहारिक, पढ़े लिखे और कायदे कानून के पक्के अफसर माने जाते थे। प्रकाश साहब को बैंक के कामकाज में किसी भी तरह की फालतू भीड़ या गैरजरूरी औपचारिकताएं बिल्कुल पसंद नहीं थीं। जब उन्होंने लगातार तीन महीनों तक हर तारीख को दीनदयाल बाबू को उसी बेंच पर केवल एक चाबी घुमाते हुए देखा तो उनका माथा ठनक गया। एक दिन दोपहर के वक्त जब बैंक में ग्राहकों की आवाजाही थोड़ी कम हुई तो प्रकाश साहब अपने केबिन से बाहर निकले और सीधे दीनदयाल बाबू के पास आकर खड़े हो गए। प्रकाश साहब ने अपनी रौबदार आवाज में सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा “दीनदयाल जी आप हर महीने यहाँ आकर पूरा दिन क्यों बर्बाद करते हैं, अगर आपके लॉकर का सालाना किराया बाकी है तो उसे जमा कीजिए या फिर अपना सामान निकालकर इस खाते को हमेशा के लिए बंद करवा दीजिए, इस तरह यहाँ बैठे रहने से बैंक के नियमों का उल्लंघन होता है।” दीनदयाल बाबू ने बहुत ही आत्मीयता से अपने दोनों हाथ जोड़े और कांपते होंठों से बोले “मैनेजर साहब मैं तो यहाँ बस अपनी उस अमानत की सलामती देखने आता हूँ जिसके लिए मैंने अपना पूरा जीवन गिरवी रख दिया था, मुझे किसी नियम की परवाह नहीं बस एक बार उस बक्से को अपनी आँखों से छू लेने दीजिए।”

प्रकाश साहब ने कड़क लहजे में कहा “दीनदयाल जी बैंक के नियम जज्बातों से नहीं चलते, अगर आपके पास लॉकर की मास्टर चाबी और अलॉटमेंट का असली कागज है तो चलिए मेरे साथ अंदर और आज ही इस लॉकर का फैसला कर लीजिए ताकि रोज का यह नाटक हमेशा के लिए समाप्त हो सके।” दीनदयाल बाबू लाठी के सहारे धीरे धीरे खड़े हुए और उनके चेहरे पर एक अजीब सा डर और कंपन तैरने लगा। प्रकाश साहब ने चपरासी रामसेवक को बुलाया और उसे लॉकर रूम की बत्ती जलाने का आदेश दिया। बैंक के कई कर्मचारी और बाहर खड़े कुछ किसान भी उत्सुकतावश दरवाजे के पास जमा हो गए क्योंकि सबको लग रहा था कि आज बरसों से बंद उस बावन नंबर लॉकर का रहस्य सबके सामने खुलने वाला है। भारी लोहे की जाली को पार करके जब वे दोनों उस संकरे और ठंडे कमरे में पहुँचे तो दीवार पर बावन नंबर की लोहे की दराज दिखाई दी जिस पर धूल की एक हल्की सी परत जमी हुई थी। प्रकाश साहब ने अपनी मास्टर चाबी लगाई और दीनदयाल बाबू से कहा “लीजिए काका, अपनी चाबी इस दूसरे छेद में लगाइए और खुद अपनी आँखों से अपनी अमानत को देख लीजिए।”

दीनदयाल बाबू के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे और उन्होंने बहुत ही मशक्कत के बाद उस जंग लगी चाबी को सांचे में बिठाया। एक भारी खटखटाहट की आवाज के साथ वह लोहे की दराज बाहर निकल आई। प्रकाश साहब और बाहर खड़े तमाम लोग सांस रोके उस दराज के अंदर झांकने लगे कि उसमें से कौन से सोने के सिक्के या पुश्तैनी गहने बाहर निकलेंगे। लेकिन जैसे ही दराज पूरी तरह खुली, अंदर का नजारा देखकर प्रकाश साहब की आँखें फटी की फटी रह गईं। उस बड़े से लोहे के लॉकर के अंदर कोई जेवर, नगदी या सोने की ईंट नहीं रखी थी बल्कि केवल एक पुराना और मटमैला सरकारी स्कूल का बस्ता और उसके ऊपर रखी एक टूटी हुई स्लेट पड़ी थी। प्रकाश साहब ने अविश्वास से उस खाली लॉकर को देखा और हैरान होकर पूछा “दीनदयाल जी क्या आप पिछले बीस सालों से इस फटे हुए बस्ते और टूटी स्लेट की रखवाली करने के लिए हर महीने इस बैंक के चक्कर काट रहे थे, क्या इसी कचरे के लिए आपने अपने जीवन भर की जमापूंजी का किराया इस लॉकर में फूँक दिया?”

दीनदयाल बाबू की आँखों से अश्रुओं की अविरल धारा बह निकली और वे उस लोहे की दराज के सामने घुटनों के बल बैठ गए। उन्होंने उस टूटी हुई स्लेट को अपनी छाती से चिपका लिया जिस पर चाक से धुंधले अक्षरों में लिखा था कि बाबूजी मैं बड़ा अफसर बनकर आपका सारा कर्ज चुका दूँगा। दीनदयाल बाबू ने बिलख बिलख कर रोते हुए रुँधे गले से कहा “साहब बीस साल पहले जब मेरा बेटा शहर की बड़ी नौकरी में गया था तो उसने मुझसे कहा था कि बापू मैं अपनी पुरानी गरीबी की इस आखिरी निशानी को इस बैंक के लॉकर में बंद करके जा रहा हूँ और जिस दिन मैं तुम्हें लेने आऊँगा उसी दिन अपने हाथों से इस लॉकर को खोलूँगा।” काका ने अपने कांपते हाथों से अपनी जेब से एक पुराना कानूनी नोटिस निकाला और प्रकाश साहब की तरफ बढ़ाते हुए कहा “आज सुबह ही शहर से मेरे बेटे के वकील का नोटिस आया है जिसमें उसने लिखा है कि उसके आधुनिक समाज में एक अनपढ़ और देहाती बाप के लिए कोई जगह नहीं है इसलिए वह मुझे हमेशा के लिए बेदखल कर रहा है।” दीनदयाल बाबू ने उस जंग लगी चाबी को फर्श पर फेंक दिया और रोते हुए बोले “मैं तो बीस सालों से रोज यहाँ सिर्फ यह देखने आता था कि कहीं मेरे बेटे का वह बचपन और उसका वह भोला वादा इस लोहे के बक्से में सुरक्षित बचा है या वह भी उस शहर की चकाचौंध में पूरी तरह मर चुका है।” प्रकाश साहब सुन्न होकर उस टूटी स्लेट को ताकते रह गए और पूरा बैंक परिसर उस बेबस बाप की सिसकियों के बोझ तले दहल उठा।

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