“वो पीला लिफाफा” : कीर्ति राणा

“मुन्ना जा बेटा, पोस्ट ऑफिस से लिफाफा लिया, नाना को राखी भेजना है। चार-पाँच दिन तो लिफाफा पहुँचने में लग जाएंगे। राखी के पहले नाना को लिफाफा मिल जाएगा तो वो राखी बँधवा लेगा।”
नानी की इस मीठी फटकार का असर ऐसा होता था कि मैं पहुँच जाता था पोस्ट ऑफिस।
यशवंतराव रोड (इंदौर) में आज जहाँ बाटा शूज का स्टोर खुल गया है, पहले वहाँ पोस्ट ऑफिस हुआ करता था। इस पोस्ट ऑफिस से पोस्टकार्ड तो लाते रहते थे, लेकिन नीले कलर वाले अंतर्देशीय (इनलैंड लेटर) पत्र जैसा पीले रंग वाला लिफाफा साल में एक बार तो लाना ही पड़ता था।
राखी वाले दिनों में पोस्ट ऑफिस में इस लिफाफे की डिमांड बढ़ जाती थी। अब तो कोरियर है, स्पीड पोस्ट सहित लंबी दूरी वाली निजी यात्री बसों से भी पार्सल भेजने की सुविधा है। डाक-तार विभाग भी राखी स्पेशल वाले वॉटरप्रूफ (अधिकतम कीमत 10 रु.) लिफाफे जारी करने लग गया है। तीन-चार दशक पहले वही पीला लिफाफा राखी भेजने का एकमात्र सस्ता साधन हुआ करता था। तब शायद उस लिफाफे की कीमत 50 पैसे थी। अब तो वह लिफाफा है नहीं, मनीऑर्डर की जगह यूपीआई ने ले ली है।
डाकघर से वो लिफाफा लाने से लेकर लिफाफे में राखी रखकर पोस्ट करना एक टारगेट रहता था। लिफाफा लाने के बाद मेरा काम होता था लिफाफे पर ऊपर “राखी” लिखकर अंडरलाइन करना, फिर पते की जगह—प्रति, रामसिंह बाबू सिंह ठाकुर, पोस्ट विहिद गाँव, जिला नासिक, महाराष्ट्र—लिखकर इस सारे पते पर डबल से पेन फेरकर उसे बोल्ड लेटर में कर देता था। तब पिनकोड लिखना कहाँ अनिवार्य था, हमें अपने क्षेत्र का पिनकोड पता भी नहीं था।
लिफाफे के पिछले हिस्से में पता—कौशल्या देवी गौतम, 43 सालवी बाखल, बक्षी गली के पास, इंदौर, म.प्र.—लिखकर दोनों पते पर कई बार मोमबत्ती रगड़ देते थे। तब इस तरह पते को वॉटरप्रूफ किया जाता था। बाद में सेलो ह्वाइट टेप भी चिपकाने लगे थे।

फिर नानी व्यवस्थित तरीके से उसमें देव राखी के साथ फुंदा राखी रखवातीं। हमारी माँ, जिन्हें हम कमाजी कहते थे, वो दवाई फैक्टरी में काम करती थीं। वे पुड़िया बाँधने में माहिर थीं। कमाजी अखबार के एक पन्ने के आठ टुकड़े करतीं। नानी पूजाघर वाली कुंकू कोयरी लेकर बैठ जातीं और ले, कमा, थोड़ा कुंकुम बाँध, थोड़ी-सी हल्दी बाँध। चावल, मिठाई के प्रतीक के रूप में शकर के दाने, नारियल के बदले में दो रुपये, कमर में बाँधने का कंदोरा—उन कागज के टुकड़ों में बाँधती जातीं।
लिफाफा चिपकाने से पहले ठंडे दिमाग से तस्दीक की जाती—कुछ सामान रखना भूल तो नहीं गए। फिर भगवान का नाम लेकर लिफाफा गोंद से चिपकाया जाता। कमाजी उस गोंद से चिपके लिफाफे वाली जगह को हथेली से ठोक भी देतीं कि कहीं खुल न जाए।
तब भी डाक विभाग में लिफाफे से लेकर पार्सल आदि का वजन तो होता था, लेकिन नानी की यह सलाह ज्यादा सही लगती थी कि भले ही लिफाफे में रखी सामग्री निर्धारित वजन से अधिक हो, तुलवाने मत जाना। ऐसे ही डाक डिब्बे में डालकर आ जाना। वजन ज्यादा और टिकट कम लगे होने से तेरे नाना तक डाक पहुँच जाएगी, जो दो-पाँच रु. भरना भी पड़े तो वो भर देगा।
लिफाफा पोस्ट करने वाले दिन से ही चिंता भी शुरू हो जाती थी—नाना को लिफाफा मिला कि नहीं, तीन-चार दिन में तो पहुँच ही जाना चाहिए। हमारी यह चिंता तब खुशी में बदल जाती, जब डाक बाँटने वाले सत्यनारायण मामाजी किसी दिन आवाज लगाते—“कौशल्या बाई, तुम्हारा मनीऑर्डर आया है।”
सौ-दो सौ रु. वाले उस मनीऑर्डर पर नानी तब अंगूठा लगाती थीं। बाद में निर्मला रानी पोद्दार द्वारा गांधी हॉल के ठीक सामने संचालित किए जाने वाले प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में वे और बई दोनों नियमित जाने लगीं, तो आड़े-टेढ़े अक्षरों में अपना नाम लिखना भी सीख गई थीं। इस केंद्र में जाने का एक लालच वहाँ से साड़ी मिलना भी था।
मनीऑर्डर वाला जो हिस्सा डाक बाबू फाड़कर देते, उसकी खाली जगह में हमारे नाना का संदेश रहता—“मैं यहाँ ठीक हूँ। राखी समय से मिल गई थी, बँधवा भी ली थी।”
इस छोटी चिट्ठी के जवाब में फिर नाना को पारंपरिक भाषा वाला पोस्टकार्ड लिखा जाता था—“ईश्वर की कृपा से यहाँ सब कुशल-मंगल है। आप भी वहाँ ठीक होंगे। मनीऑर्डर मिल गया है…”
राखी वाले उन दिनों में नानी को अपने भाई को, जो पहले भुसावल में रहते थे, राखी भेजने की जितनी चिंता रहती थी, तो उनकी बेटी—हमारी माँ—की आँखें उन दिनों में सावन के सेरे की तरह चाहे जब बरसती रहती थीं। कारण यही कि वो अपनी माँ की एकमात्र पुत्री थीं, कोई भाई था ही नहीं।
जैसे 26 जनवरी, 15 अगस्त नजदीक होने पर आकाशवाणी से राष्ट्रीय गीत बजना शुरू हो जाते हैं, वैसे ही राखी से पहले तब “भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना…” जैसे बजने वाले गीत सुनकर कमाजी उदास हो जाती थीं। राखी का उनका सबसे प्रिय गीत था, बंदिनी में शैलेंद्र का लिखा—“अब के बरस भेजो भैया को बाबुल, सावन ने लीजो बुलाय रे, लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियाँ, देजो संदेशा भिजाय रे, अब के बरस भेजो भैया को बाबुल…”
रेडियो पर यह गीत बजता और कमाजी के उदास चेहरे के साथ उनकी आँखें यह गीत गुनगुनाने लगतीं। उनके आँसू उनके जैसी अभागी बहनों की पीड़ा सुनाने लगते थे। कई बार तो हम लपककर रेडियो का स्टेशन बदल देते या बंद कर देते थे।
कमाजी का रोना देखकर बचपन के उन दिनों में कई बार झुंझलाहट भी होती थी, क्योंकि तब इतनी समझ नहीं थी। अब समझ आता है कि भाई-बहन का रिश्ता क्या होता है। जिन बहनों का कोई भाई नहीं होता या पारिवारिक विवाद के चलते वे राखी नहीं बाँध पातीं, वे बहनें इस दिन कैसे अपने मन को समझाती होंगी? बहन होते हुए भी अपनी सूनी कलाई देखकर वो भाई भी कितने पछताते होंगे।
