मेरे भैया से आभासी राखी तक – विवेक सावरीकर मृदुल

मेरे बचपन में हम आचार्य नगर,कानपुर में जिस भव्य गुप्ता बिल्डिंग में रहते थे ,वहाँ अड़ोस-पड़ोस में उत्तर भारतीय रहन-सहन का ही वातावरण था।रक्षाबंधन के समय इसकी नुमाईश ज्यादा हो जाती थी, जो मुझे नागवार गुजरती।मेरे पड़ोस की लल्ली दीदी अपने भाईयों को बड़े -बड़े आकार वाली स्पंज के गोल टुकड़े पर जतन से बनाई गई प्लास्टिक घड़ी,शुभ चिन्हों,फूल- पत्तियों वाली राखियां खरीद कर लाती।ज्यादातर राखियों में एक बात एकसमान रहती।उन सब पर लाल-पीले रंगों में मेरेभैया लिखा होता।मेरे घर में इस सबके विपरीत रेशमी धागों वाली बीच में नाजुक से गठाननुमा रूपाकार वाली सौम्य राखियों का चलन था।बहन तो बहुत कम ही राखी पर मायके आ पाती थी।चुनांचे वो झांसी की अपनी ससुराल से ही प्रायः डाक से राखियां भेजा करती थी। उन दिनों यह सामान्य धारणा थी कि महंगी राखियां मत भेजो वरना डाकिये लोग निकाल लेंगे।खैर, कानपुर के ही मोहल्ले में मेरी मुँहबोली बहन कुंदा जीजी राखी बांधती थी और मेरे बालहठ का मान रखने के लिए जरा सुंदर -सी और तनिक बड़ी राखी लाती थी।मगर पड़ोसी दोस्तों के फूल के कुप्पा कलाईयों की बराबरी करने में वह राखी नितांत असमर्थ रहती।एक साल मैंने इस विषय पर स्वतः संज्ञान लेते हुए आई से जिद कर अपनी पसंद की राखी खरीदवा कर दम लिया।ओहोहो! क्या तो सजीली राखी थी वो।लाल रेशमी धागे में बीचोबीच अंडाकार सुनहरे स्पंज पर चमकदार झालर।उस पर चारों ओर बारीक चमकी और मोतियों की नक्काशी और बीचोंबीच प्लास्टिक के गहरे हरे रूपाकार पर सुर्ख लाल रंग से लिखा मेरेभैया ।रक्षाबंधन के दिन मेरे निर्देशानुसार जीजी ने वही राखी बांधी।तिलक होते ही मैं पड़ोस के घरों में जाकर अपना सजा हुआ हाथ दिखा आया।लेकिन यह क्या!उस राखी का धागा न जाने कब खुल गया और दुबारा बांधने की कशमकश में उसका फूल धागा छोड़ ज़मींदोस्त हो गया।अगले दिन शाला में अपनी शान बघारने का मेरा सपना अकाल मृत्यु को प्राप्त होता देख मैंने हमेशा की तरह कोहराम मचाया,लेकिन उसका कोई फायदा नहीं था,यह बात मुझे समझ में आ गई थी। दोनों बड़े भाईयों ने मेरा भरपूर मजाक बनाया वो अलग। आखिर सुबह आई ने ही मेरी भावना का खयाल कर किसी जुगाड़ से उस राखी की अस्थाई मरहमपट्टी कर दी।”मेरे भैया ” कलाई पर पुनः प्रतिष्ठित हो गये और शाला में मुझे भी दर्प से हाथ लहराते हुए घूमने का सुख हासिल हो गया।वैसे,उस दिन के बाद मैंने कभी भी बड़ी राखी के लिए हठ नहीं किया और रेशम की डोरियों से ही प्रसन्न होता रहा।…इस बात को कितने दशक बीत गए हैं।लेकिन आज भी रक्षाबंधन के अवसर पर जब कभी बाजार से गुजरता हूं तो दुकानों में सजी बड़ी -बड़ी और खूबसूरत राखियों को आँख भर के निहारना नहीं भूलता।मन में अपने तब के बालहठ पर हँसी भी आती है।पर सच..हमारे समय के भाईयों के लिए मेरे भैया का स्टीकर अपने तमाम भदेसपन के बावजूद मात्र संबोधन नहीं था।वो अपनी बहनों के भ्रातृ प्रेम का वैश्विक ऐलान था।आज जब कि न सगी बहन इस दुनिया में है और न ही वो मुहल्ले की मानी हुई बहन जीजी ,जिसका स्नेह उसके गुजरने तक कम न हुआ,अपने बचपन की ये स्मृतियां मेरे मानसपटल पर और भी गहरा चुकी हैं।यह भी लगता है कि आज के हमारे नाना प्रकार के पोकेमान,ड्रैकुला,शक्तिमान से लेकर आभासी राखियों के दौर में नयी पीढ़ी के लोग ऐसे मासूम बालहठ को जानकर न जाने मेरी कितनी खिल्ली उड़ाएंगे।पर क्या कीजिए।ऐसी मीठी यादें ही तो साठ की उमर में भी दिल के भीतर एक बच्चा जिलाए रखती हैं।
-विवेक सावरीकर “मृदुल”

