दिन विशेष कहानी में सविता चड्ढा की कहानी “सावित्री”

कथाकार सविता चड्ढा की यह कहानी अभावों से जूझते एक परिवार की विवशता और गहन संवेदनाओं को उकेरती है। यह हमें प्रेरित करती है कि हम अपने मानवीय दृष्टिकोण को इस प्रकार भी बनाए रखें जिससे वह अप्रत्यक्ष रूप से किसी को जीवनी शक्ति प्रदान करने में अपनी भूमिका निभा सके ।
कथाकार का यह कथन- कहीं पटरी पर आपको चाय वाला दिखे तो उससे चाय जरूर पी लीजिएगा और हां, चाय पीकर उस पर कोई एहसान मत दिखाएगा बल्कि एक नेकी करने की संतुष्टि अवश्य लीजिएगा, कहानी में छिपा एक गहरा मानवीय संदेश है । – मनोज अबोध

श्रीमती सविता चड्ढा एक संवेदनशील और जागरूक लेखिका हैं जिन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं में लिखकर अपने विशिष्ट पहचान बनाई है। 28 अगस्त, 1953 को जन्मी सविता जी ने एम. ए. अंग्रेजी,हिंदी, के साथ-साथ पत्रकारिता, विज्ञापन और जनसंपर्क में डिप्लोमा और दो वर्षीय कमर्शियल प्रैक्टिस डिप्लोमा किया है। सविता जी ने 1984 से लेखन कार्य कर अपनी अलग पहचान बनाई हैं। उनकी 54 पुस्तकें (जिनमें 18 कहानी संग्रह, 10 लेख संग्रह, 2 उपन्यास, 11 काव्य संग्रह तथा 13 पत्रकारिता पर पुस्तकें) प्रकाशित हो चुकी हैं । तीन कहानियों पर टेलीफिल्म निर्माण और कई कहानियों पर नाटक मंचन हो चुका है। हिंदी अकादमी, दिल्ली के साहित्यिक कृति पुरस्कार, हरियाणा साहित्य अकादमी के हरियाणा गौरव सम्मान सहित 70 से भी अधिक संस्थाओं से सम्मानित ।

“सावित्री”

जिस मदन चाय वाले की कहानी मैं आपको कहने जा रही हूं उसकी लाश जब उसके घर पहुंची तो उसकी घरवाली का कहीं अता-पता नहीं था । वह बच्चों को लेकर उस दिन सुबह-सुबह ही कहीं निकल गई थी। इधर उसके पीछे मदन चाय वाला एक दूसरी ही दुनिया के लिए निकल गया था और अपने साथ ले गया था एक नितांत निजी दुनिया । शायद हर व्यक्ति की अपनी एक निजी दुनिया हुआ करती है जिसका पता उसके निकटतम व्यक्ति को भी नहीं होता और व्यक्ति के इस दुनिया से जाने के बाद ही उसकी निजी दुनिया भी हमेशा – हमेशा के लिए खत्म हो जाती है…. ।

हां, तो मैं मदन चाय वाले की बात कर रही थी….हालांकि मदन चाय वाले की कहानी में कुछ ऐसा भी नहीं है जिसे सुनकर आप सकते में आ जायें अथवा चटकारे लेकर औरों को सुनाएं बल्कि एक निहायत सीधे-साधे निम्न मध्यवर्गीय जीवन की कथा है. जैसे प्रत्येक व्यक्ति के अंगूठे की छाप या हथेलियों की रेखाएं एक दूसरे से भिन्न होती हैं और प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक खास व्यक्तित्व होता है, मदन चाय वाले का जीवन भी सामान्य होते हुए भी कहीं कुछ ऐसा था जो अलग से रेखांकित किया जा सके; साथ ही उसके मरने के साथ ही खो गई उसकी निजी दुनिया भी. हम सब की अपनी-अपनी दुनियाओं से निश्चय ही भिन्न रही होगी उसकी दुनिया जो इस कहानी को पढ़ते हुए आपको यह एहसास दिलाएगी कि भिन्न होने के बावजूद हम सब की दुनिया में बहुत हद तक समानताएं भी हुआ करती हैं जिनकी वजह से ही हम तादातम्य स्थापित करने और बर्तोल बेख्त के नि:संगतावाद के सिद्धांत के तहत अपने को एलिनियट करते जाने की दोहरी प्रक्रिया से गुजरने को बाध्य होते हैं…..तो आंगन में पड़ी मदन की लाश के पास ही छाती पीट-पीट कर रोती मदन की बूढ़ी माँ पुन: छाती पीट-पीट कर स्यापा करने लगी….. फिर भी यह चिंता उसके दिमाग को परेशान किये जा रही थी कि बहू और बच्चों के आने में काफी देर कहां हो गई हैI हालांकि कहां तिलक नगर और कहां कालकाजी, आने-जाने में समय तो लगेगा ही… तथापि वह खीज रही थी कि उसे आज ही जाना था और वह भी बिना बताए। ऐसी क्या खास बात थी कि मुंह अंधेरे बच्चों को लेकर चुपचाप निकल गई और अब दस बज गए हैं अभी तक नहीं लौटी ।

मदन चाय वाला तिलक नगर के बस स्टैंड के आगे अपनी चाय के खोखे पर ही सोता था । हालांकि सामान नहीं के बराबर ही था, दो केतली, एक भगोना, चार छ: शीशे के गिलास, एक छन्नी तथा एक कोयले की बोरी और चिमटा ….। फिर भी इनकी रखवाली जरूरी थी खास कर आसपास घूमने वाले आवारा कुत्तों के कारण उसकी नाक में दम रहता था जो उसके लिपे-पुते माटी के दो अंचिया चूल्हे की ऐसी – तैसी कर जाते थे । शुरू-शुरू में तो उसकी घरवाली भी वहीं फुटपाथ पर ही सो जाया करती थी परंतु यह चल नहीं पाया । पुलिस वालों ने डंडा फटकार कर समझा दिया था कि कल को कुछ ऊंच नीच हो गया तो खाली-पीली पुलिस की खाट खड़ी हो जाएगी।

आज भी मदन रोज की तरह मुंह अंधेरे ही डिब्बा उठाए दिशा मैदान को निकल गया था और पीछे धोखे की रखवाली का जिम्मा रामू रिक्शा वाले को सौंप गया था किंतु जब मदन को गए घंटे भर से भी ज्यादा हो गया तो रामू का माथा ठनका। पिछले 15 मिनट में कम से कम 10 बार उसका मन हुआ कि भी गढ़ी वाले मैदान की झाड़ियों के पीछे एक चक्कर लगाकर देखे कि आखिर आज इतनी देर क्यों हो गई , कहीं ऐसा तो नहीं कि…. किंतु दुकान किसके भरोसे छोड़कर जाए वह ।….. इसी उधेड़बुन में जब सुबह का उजाला पूरी तरह फैल गया और आसपास की दुकानें एक-एक करके खुलने लगीं तो उसने राहत की सांस ली । बस, कुछ देर की बात है …. साथ के मंगतराम मोची के आते ही वह निकल जाएगा मदन को देखने।

अभी वह सोच ही रहा था कि एक सेठ उसके पास आया और उसने पूछा भैया चलोगे क्या । उसने पलट कर पूछ लिया “कहां जाओगे साहब ।”

उसने एक स्कूल का नाम बताया जो गढ़ी वाले मैदान से होकर ही जाता था। उसने हामी भरी और उसकी किस्मत भी कि इसी समय मंगतराम मोची भी आ गया था। रामू का ध्यान सवारी में कम और मदन चाय वाले की ओर ज्यादा था। एक साल पहले जब रामू गांव से शहर आया था तो मदन ने ही उसकी सहायता की थी । उसे किराए पर रिक्शा ले दिया था जिससे वह अपना गुजारा भी करता रहा और गांव में भी कुछ ना कुछ भेज देता ….हालांकि उसकी कमाई से ना तो आज तक गांव में उसका घर बन सका है, ना ही माँ अपने घर में गाय बांधने की साध पूरी कर सकी, पर मदन का एहसान रामू आज भी मानता है । पैडल पर पांव तेजी से चल रहे थे और उससे भी तेजी से काम कर रहा था उसका दिमाग….. आखिर मदन ने इतनी देर क्यों कर दी ।

गढ़ी वाले मैदान के आते ही रामू अभी आया कहकर मैदान में कूद गया। उसने देखा एक जगह पांच सात लोग घेरा बनाए खड़े हैं । रामू तेजी से उधर ही गया और गिरे हुए आदमी को देख चिल्लाने लगा ” उठो मदन भैया, रामू उसे झकझोर रहा था लेकिन अपने मुंह से खून की कै से धरती का सीना लाल कर उसने अपनी पत्नी की मांग सूनी कर दी थी । रामू ने मदन की लाश उठाई और उसके घर ले आया….. घर आया तो सावित्री भाभी गायब…… यह तो शुक्र है कि किसी ने मदन की मां को बता दिया था कि सावित्री भाभी मंदिर गई है।

मदन की लाश देख मां का रुदन…… लग रहा था इससे ज्यादा जोर से वह रो ही नहीं सकती । सच कहूं तो उसके रुदन को और दुख को मैं शब्दों में व्यक्त करने में असमर्थ महसूस कर रही हूं । मदन की बहू सावित्री अभी तक नहीं लौटी । घर के बाहर दरी बिछा दी गई है। मोहल्ले की औरतें वहां एकत्र हो रोने में मदन की मां का साथ दे रही हैं । लोग आते रहे, रोने की आवाज़ कभी कम कभी ज्यादा होती रही । किसी बच्चे ने लाश के पास आकर कहा- भाभी आ गई है। ये सुनकर रोने की आवाज बहुत तेज हो गई। सावित्री सचमुच आ गई थी और उसके हाथ में कपड़े के पुराने किस्म का थैला था जिसमें प्रसाद के कुछ फूल थे जो उसने मदन की लाश के ऊपर गुस्से से फेंक दिए और खुद पत्थर-सी चुपचाप बैठ थी। गली में उसे मदन की मौत की खबर मिल गई थी लेकिन उसे विश्वास नहीं हुआ था । उसे ईश्वर पर भरोसा था जिसके पास आज सुबह वह होकर आई थी। लोगों ने देखा वह गुस्से से उठी उसने मदन की लाश को जोर-जोर ही झकझोरना शुरु किया “उठकर बैठ, अरे तेरे लिए ही तो मन्नत मांगने गई थी भगवान के घर , पुजारी तो कहता था तेरे दिन फिर जाएंगे, फिर यह सब क्या हो गया। भगवान पर गुस्से का स्थान आंसुओं और चीखों ने ले लिया था । जोर-जोर से रो रही थी सावित्री। इतने ऊंचे ऊंचे-ऊंचे स्वर में रो रही थी जितना कोई साधारण मनुष्य रो सकता था । लोगों ने उसे चुप कराने का प्रयास नहीं किया । ऐसे में प्रयास करना निरर्थक ही रहता है । वह चीख रही थी। लगातार रोने के बाद हिम्मत ने जवाब दे दिया था । रोने की आवाज क्रमशः कम हो रही थी । कोई भला कितना और कब तक रो सकता है ? सभी चुप होने लगे थे । मदन की मां तो कई बार बेहोश हो चुकी थी । कोई बेहोश होता क्यों है ? मुझे लगता है जब किसी के गम को सहने की सामर्थ्य बिल्कुल खत्म हो जाती है और वह होश खो बैठता है। शायद मदन की मां इससे ज्यादा चीखती – चिल्लाती तो शायद मर जाती । मदन की बहु की रोने की आवाज अभी भी आ रही थी । अभी उसकी शक्ति शेष थी ।

अब लोगों ने उसे समझाना चाहा ” चुप कर जा, सारी उम्र पड़ी है रोने को ।” इस जुमले से वातावरण और गमगीन हो गया। रोने की आवाज अचानक बढ़ गई ।

कोई कितना भी नजदीकी हो, प्यारा हो , जिसके बिना ना रहने की कसमें खाई हो , जिससे एक दिन भी दूर नहीं होने के वादे किये हों उसे ही अग्नि के सुपुर्द कर देना असहनीय होता है पर इसे करने की हिम्मत भगवान ने सब में बचा के रखी होती है ।

दाह संस्कार के बाद चाय-पानी का दौर था । चाय पीकर लोग झुंडों में बतिया रहे थे । दूर दराज के लोग, घर के नातेदार, सभी ने चाय पी ली थी। मदन की माँ और सावित्री के पास मिलने वालों की भीड़ थी।

औरतें पूछ रही थी ” तेरी कोई बात तो नहीं हुई उससे, अरे बता दे, गम कम होता है ।”

मदन की बहू ने कहा “मैंने क्या कहना था उसे, मैं तो गुजर कर ही रही थी, वही मुझे छोड़ कर चला गया । मैं तो गरीबी में भी खुश थी उसके साथ। मैं तो उसका साथ कभी ना छोड़ती…. पता नहीं उसने क्यों दिल को लगा ली थी ।”

मदन की मां ने सुना तो क्या ” क्या दिल को लगा ली थी उसने, क्या हुआ था….।”

सावित्री रोते हुए बोलते जा रही थी । मैं तो रात 12 बजे तक उसके साथ ही थी । बाद में पुलिस वालों ने मुझे घर भेज दिया । ये कहकर ” पटरी पर औरतों का सोना खतरनाक है।” मैं घर आ गई थी। “वह रोती जा रही थी।

” आखिरी बात उसने तुझे क्या की थी, अरे बोल …” मदन की मां को मानो बहुत जल्दी थी ।

“मां” वह सास के गले लग कर फिर रोने लगी । मैं उनको बचा न सकी, काश मेरा कोई जानकार दो पैसे वाला होता तो मैं उन्हें कभी ना मरने देती।”

” आखिर हुआ क्या था, मदन तो ठीक था…” मदन की मां ने बहू को कंधे से अलग हटाते हुए पूछा ।

“बाहर से तो सभी ठीक ही लगते हैं पर कोई भीतर तक तक देखना वाला तो हो ।”

पिछली रात का दृश्य सावित्री की आंखों के सामने घूम गया। मदन पटरी पर चटाई बिछाकर लेटा है। सावित्री उसके बालों में उंगलियां फिरा रही है । मदन खामोश है। उसे चुप देखकर सावित्री पूछती है ” क्या हुआ, क्या सोच रहे हो।”

“कुछ नहीं” मदन ने छोटा-सा जवाब दिया था ।

“कुछ तो मुझे बताओ” सावित्री ने पूछा था।

मदन ने उसकी उंगलियों को अपनी उंगलियों में जकड़ लिया और बोला ” जब से जून का महीना आया है आमदनी कम हो गई है। पहले दिन भर में 6 किलो दूध लगता था अब कम होते होते 1 किलो दूध की चाय बिकती है, उसकी आवाज भर्रा गई ।”

“तो क्या हुआ, दिसंबर भी तो आएगा । फिर 3 महीने तक खूब चाय बिकेगी। इस बार मैं कुछ पैसे अवश्य बचा लूंगी।” सावित्री ने अपना धैर्य बनाए रखा।

” तुम कैसे पिंजर हो गए हो दो वक्त दूध भी पी लिया करो ,शरीर रहेगा तो काम करोगे।” सावित्री ने उसके सीने पर हाथ फेरते हुए कहा ” तुम्हें कितनी बार कहा है, मनुष्य जैसा अन्न खाता है, पानी पीता है, वैसे ही हमारा शरीर बनता है।” मदन हैरान हो रहा था सावित्री की बातें सुनकर। मदन का मन रखने को सावित्री ने कई मनभावन बातें की पर मदन को यही चिंता थी अब घर कैसे चलेगा। उसने गुस्से से सावित्री को इतना ही कहा” बच्चों को दूध मिले नहीं और मैं दूध पी लूं , यह मेरे से ना हुआ है ना कभी होगा…।”

विचारों से निकल कर वह यथार्थ में आई तो लोगों की आंखों में आश्चर्य के साथ आंसू भी थे । वह बोलती जा रही थी ” मैंने तो बहुत समझाया था “शुक्र करो 1 किलो दूध की चाय तो बिक रही है , अगर यह भी न बिके तो हम क्या जबरदस्ती कर सकते हैं, किसी के साथ…. पता नहीं लोग जून में चाय पीना कम क्यों कर देते हैँ। मैं कहती हूं चाय गरम नहीं होती, चाय सबको पीनी चाहिए, चाहे बहुत गर्मी गई, चाहे लू चले, कड़क धूप हो …पर आप चाय जरूर पियो…. एक जान को बचाने का सुख भोगो …..” लोग मदन की बहू को चुप कराने का प्रयास कर रहे थे मदन की बहू सोच रही थी, मैं दिसंबर की प्रतीक्षा में थी और अब दिसंबर में मेरा क्या होगा। काश मैं सावित्री हो सकती अपने पति को महंगाई रूपी यम से बचा सकती। अचानक उसे मंदिर में चल रहे संकीर्तन के वाक्य याद आ गए ….किसी श्लोक का भावार्थ बताते हुए कोई कह रहा था…” सेनापति के बिना सेना, बिना ज्ञान के मनुष्य , बिना आचरण के ज्ञान जैसे समाप्त हो जाता है, नष्ट हो जाता है, वैसे ही पति रहित पत्नी भी नष्ट हो जाती है ।” वह इस विचार को फौरन ही झटक देती है । स्त्रियां जैसे ही हौसला खो बैठेंगी, हाहाकार फैल जाएगा, प्रलय से पहले प्रलय हो जाएगी, सब नष्ट हो जाएगा ….घर परिवार …बच्चे …मुझे जिंदा रहना है अपने बच्चों के लिए । “

उसे हमेशा याद रहा है कि वह पुरुष नहीं औरत है । औरतों को धीरज खोना शोभा नहीं देता ।”

लोगों ने देखा वह अपने आप से बातें करने लगी है । शायद मदन की अनुपस्थिति में किसी महत्वपूर्ण फैसले पर पहुंचना चाहती है ।शायद वह चाय की दुकान चला कर मदन का गम भुलाने का सपना देखने लगी थी।

व्यक्तिगत स्थिति में फैसले खुद ही करने पड़ते हैं । मदन ने फैसला किया केवल अपने हक में, वह भूल गया था चिंता से समस्याओं का हल नहीं होता ,लेकिन सावित्री के चेहरे से लग रहा है उसने फैसला सबके हित में किया है।

मदन की मौत ने कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं …आज भी हमारे देश में साहूकारों से कर्ज लेने और फसल नष्ट हो जाने पर कर्ज अदा ना करने पर, कंगाल हो जाने के भय से किसान और कई लोग आत्महत्या कर रहे हैं। अपने ही देश में, अपने ही लोग इतने अजनबी से क्यों? कैसी डरावनी बातें हैं। क्या गरीबों का जीवन इतना सस्ता होता है? कौन सुध लेगा इनकी?

लोग सोच रहे हैं सावित्री की चाय की दुकान चलेगी ? बच्चों का क्या होगा?भगवान का इंसाफ तो देखो कोई पैसे की कमी से मर रहा है और कहीं पैसे की अति ने लोगों को मार रखा है।

मैं बहुत परेशान हो गई थी मदन की मौत का कारण जानकर …. सिर्फ इसलिए की उसकी चाय नहीं बिकती… बच्चे भूखे हैं ….घर कैसे चलेगा । चलते-चलते आप सब से निवेदन भी करना चाहती हूं कि कहीं पटरी पर आपको चाय वाला दिखे तो उससे चाय जरूर पी लीजिएगा और हां, चाय पीकर उस पर कोई एहसान मत दिखाएगा बल्कि एक नेकी करने की संतुष्टि अवश्य लीजिएगा।

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