फिल्मी गीतों में रक्षाबंधन की स्वर-गाथा : डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
डॉ. गिरीश कुमार वर्मा (‘डंडा लखनवी’) हिंदी के सुप्रतिष्ठित साहित्यकार, शोधकर्ता, नाटककार, बाल साहित्यकार एवं संपादक हैं। पाँच दशकों से अधिक समय से वे साहित्य, शिक्षा, संस्कृति तथा सामाजिक जागरण के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी साहित्य-साधना में राष्ट्रीय चेतना, संवैधानिक मूल्य, मानवीय संवेदनाएँ, लोकमंगल तथा नैतिक जीवन-दृष्टि का सशक्त समन्वय परिलक्षित होता है।
हिंदी में पी-एच.डी. उपाधि प्राप्त डॉ. वर्मा ने साहित्य, संस्कृति और समाज से जुड़े विविध विषयों पर अनेक पुस्तकें, शोध-पत्र और लेख लिखे हैं। उनकी रचनाएँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं तथा आकाशवाणी, दूरदर्शन और राष्ट्रीय साहित्यिक मंचों पर उनका नियमित काव्य-पाठ हुआ है। उन्हें कबीर पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय एवं साहित्यिक सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है।
सृजन, शोध, संपादन और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उनकी सतत प्रतिबद्धता उनकी साहित्यिक पहचान का आधार है। मोबाइल नं. 9140624202

रक्षाबंधन केवल भाई की कलाई पर बँधने वाला एक रेशमी धागा नहीं है। यह बचपन की शरारतों, भाई-बहन की नोकझोंक, स्नेह, विश्वास, दूरी और जीवनभर साथ रहने वाली स्मृतियों का पर्व है। राखी का धागा दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर बँधा भाव दिखाई नहीं देता। भारतीय सिनेमा ने इसी अदृश्य भाव को गीतों का स्वर दिया है।
फिल्मी संसार में भाई-बहन के प्रेम पर अनेक गीत रचे गए हैं। उनमें कुछ सीधे रक्षाबंधन और राखी की रस्म से जुड़े हैं, जबकि कुछ भाई-बहन के व्यापक प्रेम को स्वर देते हैं। इन दोनों को मिलाकर देखें तो हिंदी सिनेमा में रक्षाबंधन की एक ऐसी स्वर-गाथा दिखाई देती है, जिसमें उत्सव भी है, लाड़ भी, विश्वास भी और विरह भी।
1. “भैया मेरे, राखी के बंधन को निभाना”
फिल्म : छोटी बहन (1959) | गायिका : लता मंगेशकर | गीतकार : शैलेन्द्र | संगीत : शंकर-जयकिशन
रक्षाबंधन के फिल्मी गीतों की चर्चा इस गीत के बिना अधूरी है। बहन की सरल पुकार—भाई इस रिश्ते को निभाना—पूरे गीत की आत्मा है। राखी यहाँ केवल धागा नहीं, जीवनभर निभाए जाने वाले रिश्ते का प्रतीक बन जाती है। गीत में बहन की श्रद्धा है, विश्वास है और भविष्य को लेकर एक मासूम-सी आशा भी।
शैलेन्द्र के शब्दों और लता मंगेशकर की करुण-मधुर आवाज ने इस गीत को त्योहार का गीत भर नहीं रहने दिया; यह भाई-बहन के संबंध की भावनात्मक पहचान बन गया।
2. “बहना ने भाई की कलाई से प्यार बाँधा है”
फिल्म : रेशम की डोरी (1974) | गायिका : सुमन कल्याणपुर | गीतकार : इंदीवर | संगीत : शंकर-जयकिशन
इस गीत में राखी का अर्थ एक वाक्य में सिमट जाता है—कलाई पर धागा बँधा है, लेकिन वास्तव में संसार बँधा है। सुमन कल्याणपुर की आवाज में बहन का स्नेह और विश्वास सहज रूप से उतरता है।
गीत भाई को केवल रक्षा करने वाला नहीं, बल्कि बहन के पूरे संसार का हिस्सा मानता है। इसीलिए यह गीत रक्षाबंधन के अवसर पर आज भी आत्मीय लगता है।
3. “मेरे भैया, मेरे चंदा, मेरे अनमोल रतन”
फिल्म : काजल (1965) | गायिका : आशा भोंसले | गीतकार : साहिर लुधियानवी | संगीत : रवि
यहाँ बहन का प्रेम अपने सबसे कोमल रूप में दिखाई देता है। भाई उसके लिए चंदा है, अनमोल रतन है और ऐसा अपना है जिसके बदले दुनिया की कोई वस्तु स्वीकार नहीं।
गीत में बहन की ममता के साथ भाई के भविष्य के लिए शुभकामनाएँ भी हैं। आशा भोंसले की आवाज इस स्नेह में मिठास और आत्मीयता भर देती है।
4. “फूलों का तारों का सबका कहना है”
फिल्म : हरे रामा हरे कृष्णा (1971) | गायक : किशोर कुमार | गीतकार : आनंद बख्शी | संगीत : राहुल देव बर्मन
यह गीत सीधे रक्षाबंधन पर आधारित नहीं है, लेकिन भाई-बहन के प्रेम की व्यापकत संवेदना के कारण राखी के अवसर पर विशेष रूप से याद किया जाता है। “एक हजारों में मेरी बहना है” जैसी भावना बहन को परिवार में उसके अनूठे स्थान का एहसास कराती है।
गीत में प्रेम के साथ बिछोह की पीड़ा भी है। भाई-बहन दूर हों तो त्योहार का उल्लास स्मृति में बदल जाता है। यही कारण है कि यह गीत राखी के भावलोक में सहज ही शामिल हो जाता है।

5. “चंदा रे, मेरे भैया से कहना”
फिल्म : चंबल की कसम (1980) | गायिका : लता मंगेशकर | गीतकार : साहिर लुधियानवी | संगीत : खय्याम
जब भाई दूर हो और उससे सीधे संवाद का कोई रास्ता न हो, तब बहन चाँद को संदेशवाहक बना लेती है। इस गीत में राखी केवल उत्सव नहीं, प्रतीक्षा बन जाती है।
बहन चाँद से अपने भाई को संदेश भेजती है। राखी के धागे, माँ की कसमें और घर लौट आने की पुकार—सब मिलकर गीत को करुण और मार्मिक बना देते हैं। यहाँ दूरी भौगोलिक है, लेकिन मन की दूरी स्वीकार्य नहीं।
6. “अब के बरस भेज भैया को बाबुल”
फिल्म : बंदिनी (1963) | गायिका : आशा भोंसले | गीतकार : शैलेन्द्र | संगीत : सचिन देव बर्मन
यह गीत रक्षाबंधन के भाव को वियोग की भूमि पर ले जाता है। बहन को अपने बचपन, मायके और भाई की याद सताती है। सावन आता है, झूले पड़ते हैं, लेकिन मन में बचपन की स्मृतियाँ ही उमड़ती हैं।
इस गीत में राखी का उत्सव एक मार्मिक प्रतीक्षा बन जाता है। बहन का मन मानो कह रहा हो कि त्योहार तभी पूरा होगा, जब मायके का अपना संसार फिर सामने होगा। आशा भोंसले की आवाज इस विरह को अत्यंत आत्मीय बना देती है।
धागा एक, भाव अनेक
इन गीतों को ध्यान से देखें तो रक्षाबंधन की एक सुंदर भाव-यात्रा सामने आती है। कहीं बहन भाई से बंधन निभाने का आग्रह करती है, कहीं कलाई पर प्रेम बाँधती है, कहीं भाई को अनमोल रतन कहती है, कहीं दूर बैठे भाई को चाँद के माध्यम से संदेश भेजती है और कहीं सावन की फुहारों के बीच मायके की स्मृतियों में लौट जाती है।
यानी राखी का धागा भले एक हो, लेकिन उससे जुड़े भाव अनेक हैं—स्नेह, विश्वास, ममता, सुरक्षा, प्रतीक्षा, स्मृति और विरह।
भारतीय सिनेमा की विशेषता यही है कि उसने त्योहार को केवल दृश्य नहीं रहने दिया, उसे स्वर दे दिया। राखी की थाली, रोली, मिठाई और कलाई के साथ जब कोई पुराना गीत बजता है, तो घर में केवल संगीत नहीं गूँजता; बीता हुआ बचपन भी लौट आता है।
गीतों में बसी रिश्तों की स्मृति
समय बदल गया है। भाई-बहन अलग-अलग शहरों और देशों में रहने लगे हैं। राखी कभी डाक से जाती है, कभी कुरियर से और कभी डिजिटल माध्यम से शुभकामनाओं के साथ पहुँचती है। दूरी बढ़ी है, लेकिन रिश्ते की भावनात्मक जरूरत कम नहीं हुई।
ऐसे समय में ये फिल्मी गीत और भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि भाई-बहन का संबंध किसी एक दिन का आयोजन नहीं, जीवनभर की स्मृति है।
राखी की कलाई पर बँधा धागा कुछ दिनों में पुराना पड़ सकता है, पर उससे जुड़ा गीत वर्षों तक मन में ताजा रहता है। यही कारण है कि लता, आशा, सुमन कल्याणपुर और किशोर कुमार की आवाजें आज भी रक्षाबंधन के आते ही घर-घर सुनाई पड़ती हैं।
राखी का धागा कलाई पर बँधता है, गीत उस रिश्ते को हृदय में बाँध देता है।
इसलिए रक्षाबंधन पर बजते ये फिल्मी गीत केवल गीत नहीं हैं—वे हमारी सामूहिक स्मृति के सुरक्षित रखे हुए स्वर-सूत्र हैं। राखी की थाली सजती है, कलाई पर रेशमी धागा बँधता है और कहीं पृष्ठभूमि में कोई पुराना गीत बज उठता है। उस क्षण लगता है कि संगीत ने भी भाई-बहन के रिश्ते की कलाई पर अपनी एक राखी बाँध दी है।
